एटीएस के अधिकारियों ने 5 जनवरी को इलाहाबाद के गोविंदपुर इलाके से मनीष आजाद को उनके घर से गिरफ्तार कर लिया। 2019 में उन पर और उनकी पत्नी अमिता पर आइपीसी की धारा 419, 420, 467, 471 और 121A के तहत मामला दर्ज किया गया और उन्हें जेल में डाल दिया गया था, परंतु 3 महीने बाद प्रस्तुत किए गए चार्जशीट में 121A को सम्मिलित यह कह कर नहीं किया गया कि अभी जांच चल रही है। इसके 8 महीने बाद 2020 में दोनों को बेल मिल गई थी।
इस बार पुराने केस में ही नई धाराएं जोड़कर उन्हें वापस गिरफ्तार कर लिया गया है जो प्रथमदृष्टया संदेहजनक और गैरकानूनी है। मनीष आजाद अनुवादक, लेखक और राजनैतिक कार्यकर्ता है परंतु 2019 में उन पर राजद्रोह के साथ अन्य धाराएं लगा कर उन्हें हतोत्साहित करने की कोशिश की गई। जब दोनों को आठ महीने बाद बेल मिल गई और वे अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए केस की हर तारीख को कोर्ट में जाने लगे ऐसी स्थिति में अचानक नई धाराएं लगाना और इलाहाबाद की जगह लखनऊ में कोर्ट में पेशी करवाना यही इंगित करता है कि ये प्रकरण सिर्फ एक राजनैतिक कार्यकर्ता को परेशान करने के लिए किया गया है।
इसी के साथ एक ऐसे केस में जहां बेल पहले से मिल गई हो उसमें बिना उस कोर्ट की सहमति लिए जिसने बेल दिया हो, उसी केस में नई धाराएं लगा कर गिरफ्तार करना पूर्ण रूप से माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित प्रक्रिया की अवहेलना है।
पीयूसीएल ये मांग करता है कि ऐसे गलत ढंग से गिरफ्तार करने और कानून के दुरुपयोग पर माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान ले और जांच एजेंसियों पर ज़रूरी अंकुश लगाए और साथ ही कुछ कड़े दिशानिर्देश जारी करे जिससे इस प्रकार से मानवाधिकारों का हनन ना हो।
यूपी पीयूसीएल द्वारा जारी
अध्यक्ष, टीडी भास्कर
महासचिव, चित्तजीत मित्रा


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