नमक-रोटी कांड और भुखमरी पर लिखने वाले पत्रकारों को कमलापति त्रिपाठी पुरस्कार


पंडित कमलापति त्रिपाठी फाउंडेशन के तत्वावधान में वाराणसी के जनसंदेश टाइम्स के समाचार संपादक विजय विनीत को साहसिक पत्रकारिता के लिए पंडित कमलापति त्रिपाठी राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। जनसंदेश टाइम्स से अहरौरा (मिर्जापुर) के संवादसूत्र रहे पवन जायसवाल तथा जनमुख की महिला पत्रकार सुश्री सरोज सिन्हा को भी सम्मानित करने के साथ ही उनके उज्जवल भविष्य और सतत मूल्यवादी पत्रकारिता की कामना की गई।

पिछले दिनों विजय विनीत ने लॉकडाउन में मुसहरों के बच्चों के जंगली घास खाने पर रिपोर्ट की थी जिस पर देश भर में काफी बवाल हुआ था। उससे पहले इसी अखबार के पवन जायसवाल ने मिड-डे मील में बच्चों को नमक-रोटी परोसे जाने पर मशहूर रिपोर्ट की थी।

उल्लेखनीय है कि मीरजापुर के नमक रोटी कांड की रिपोर्ट पवन जायसवाल ने जनसंदेश टाइम्स में ही छपी थी और समूचे मुहीम को जनसंदेश के समाचार संपादक विजय विनीत ने ही अंजाम तक पहुंचाया था। इस साल कोरोना काल में बनारस में कोईरीपुर में भूख से बेहाल मुसहरों के खास खाने के रिपोर्ट की लाइव रिपोर्टिंग की थी, जिससे तहलका मच गया था। फाउण्डेशन की ओर चेन्नई की साहित्य सेविका डॉ. श्रावणी भट्टाचार्य तथा वाराणसी की पत्रकार सुश्री सरोज सिन्हा को विशेष पं. कमलापति त्रिपाठी सम्मान से सम्मानित किया गया है।

पंडित कमलापति त्रिपाठी की पत्रकारीय परंपरा को कायम रखने के उद्देश्य से उनकी जयंती के अवसर पर पंडित कमलापति त्रिपाठी फाउंडेशन की ओर से प्रत्येक वर्ष राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार दिया जाता है. हालांंकि इस वर्ष कोरोना महामारी के चलते विगत 3 सितंबर को जयंती समारोह डिजिटल माध्यम से संपन्न हुआ एवं वेबीनार में ही पुरस्कारोंं की घोषणा हुई थी।

पंडित कमलापति त्रिपाठी जी का नियमित पत्रकारिता जीवन सन् 1932 में “आज” में सहायक सम्पादक के रूप में आरंभ हुआ था और शीघ्र ही वे आज के प्रधान संपादक बने। पंडित जी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान “आज” में काफी प्रभावपूर्ण सम्पादकीय लेख लिखे जो एक ओर विदेशी शासन के खिलाफ़ अग्निवर्षा करते थे तो दूसरी ओर जनमानस में स्वाधीनता के लिए सर्वस्व अर्पण करने की भावना भरते थे।

पंडित जी ने “आज” एवं “संसार” के साथ “ग्राम संसार” “आंधी” और “युगधारा” का भी सम्पादन किया था. सन् 1946 में पंडित जी जब संसार में सम्पादक ये तो उस वर्ष आजमगढ में संपन्न प्रदेश कांग्रेस के सम्मेलन में भाग लेने गये थे। जिस दिन त्रिपाठी जी आजमगढ़ के सम्मेलन में थे उस दिन संसार के अग्रलेख में नवस्थापित कांग्रेस शासन की कड़ी आलोचना छपी थी। जब अखबार आजमगढ़ पहुँच तो एक वरिष्ठ नेता ने वह अखबार पंडित जी की ओर फेंक कर कहा- तुम्हारे अखबार में यह सब क्या छपता है? तब पंडित जी ने जबाव दिया- मेरा अखबार कांग्रेस का नहीं जनता का अखबार है, इसमें जो कुछ भी लिखा गया है सोच समझकर लिखा गया है।

एक दूसरी घटना में पंडित जी ने अपने साथ के एक सहयोगी को बुलाकर पूछा कि क्या यह सत्य है कि हमारे अखबार में नगर की एक मिल के मजदूरों की हड़ताल का समाचार नहीं छापा जा सका? उनका उत्तर था- क्या आप नहीं जानते कि उस मिल के मालिक का काफी रुपया “संसार” के प्रकाशन में लगा है? यह सुनकर क्रुद्ध पंडित जी ने कहा कि उनका रुपया लगा है तो हमारा भी दिमाग लगा है। अखबार स्वतंत्र है और किसी की नाराजगी के भय से समाचार नहीं रुक सकता है।

ये दोनों घटनाएं संकेत करती हैं पंडित जी ने पत्रकारिता के मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया। पंडित जी ने कभी किसी ख़ास धर्म, जाति, समुदाय को ध्यान में रखकर लेखन नहीं किया। वे ऐसे पत्रकार थे, जो अपनी शर्तों पर कार्य करते थे और दबाव तो उन्हें छू भी नहीं सकता था।

इससे पहले यह पुरस्कार दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी को दिया जा चुका है।

इस मौके पर प्रो. उमेश चंद्र, पूर्व विभागाध्यक्ष, बीएचयू एवं संचालन उ.प्र. कांग्रेस कमेटी आरटीआई सेल के पूर्व चेयरमैन श्री बैजनाथ सिंह उपस्थित थे। समारोह में प्रमुख रूप से उ.प्र. कांग्रेस कमेटी के पूर्व उपाध्यक्ष विजयशंकर पाण्डेय, जिला कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष प्रजानाथ शर्मा, श्री दिग्विजय सिंह, अशोक पाण्डेय, शैलेंद्र सिंह, राकेश चंद्र शर्मा, प्रमोद श्रीवास्तव, विजय कृष्ण राय अनु, पुनीत मिश्रा, ऋषि त्रिपाठी, अतुल यादव, कमलाकांत पाण्डेय, शुभम राय एवं रवि पाठक आदि उपस्थित रहे। मीडिया प्रबंधन की जिम्मेदारी जिला कांग्रेस कमेटी के पूर्व प्रवक्ता रविशंकर पाठक ने निभाई।


About जनपथ

जनपथ हिंदी जगत के शुरुआती ब्लॉगों में है जिसे 2006 में शुरू किया गया था। शुरुआत में निजी ब्लॉग के रूप में इसकी शक्ल थी, जिसे बाद में चुनिंदा लेखों, ख़बरों, संस्मरणों और साक्षात्कारों तक विस्तृत किया गया। अपने दस साल इस ब्लॉग ने 2016 में पूरे किए, लेकिन संयोग से कुछ तकनीकी दिक्कत के चलते इसके डोमेन का नवीनीकरण नहीं हो सका। जनपथ को मौजूदा पता दोबारा 2019 में मिला, जिसके बाद कुछ समानधर्मा लेखकों और पत्रकारों के सुझाव से इसे एक वेबसाइट में तब्दील करने की दिशा में प्रयास किया गया। इसके पीछे सोच वही रही जो बरसों पहले ब्लॉग शुरू करते वक्त थी, कि स्वतंत्र रूप से लिखने वालों के लिए अखबारों में स्पेस कम हो रही है। ऐसी सूरत में जनपथ की कोशिश है कि वैचारिक टिप्पणियों, संस्मरणों, विश्लेषणों, अनूदित लेखों और साक्षात्कारों के माध्यम से एक दबावमुक्त सामुदायिक मंच का निर्माण किया जाए जहां किसी के छपने पर, कुछ भी छपने पर, पाबंदी न हो। शर्त बस एक हैः जो भी छपे, वह जन-हित में हो। व्यापक जन-सरोकारों से प्रेरित हो। व्यावसायिक लालसा से मुक्त हो क्योंकि जनपथ विशुद्ध अव्यावसायिक मंच है और कहीं किसी भी रूप में किसी संस्थान के तौर पर पंजीकृत नहीं है।

View all posts by जनपथ →