हिमालयी राज्यों के लिए केन्द्रीय बजट निराशाजनक: हिमालय नीति अभियान


यह बजट कॉरपोरेट हितेषी है जो इंफ्रास्ट्रक्चर और अर्बन डेवलपमेंट केंद्रित है l केंद्र और राज्य संबंधों पर भी दरारें पढ़ने की संभवना है l शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण के संदर्भ में कोई भी विशेष प्रावधान नहीं दिखते l पुरे भाषण में किसान शब्द का उच्चारण नहीं किया गया तथा ग्रामीण विकास पर कोई खास चर्चा नहीं थी, खेती पर एग्रोनॉमी और कृषि वाणिज्य संबंधित चर्चा ही की गई l इस तरह यह जनता विरोधी कॉरपोरेट हितपोषक बजट ही लगता है l

हिमाचल, जम्मू कश्मीर और उत्तराखंड में जो सस्टेनेबल माउंटेन टूरिज्म ट्रेल्स की बात की है, यह असल में क्या है तथा इसका पर्यावरणीय और दूसरे क्या प्रभाव होंगे, उस पर पूरी जानकारी होने के बाद विचार किया जा सकता है l दूसरी घोषणा हिमालय क्षेत्र में अखरोट, बादाम और चिलगोजे की खेती को बढ़ाने की बात की, जो एक बड़ा मजाक के अतिरिक्त कुच्छ भी नहीं है l क्या यह बजट पहाड़ी राज्यों की भूमि का टूरिज्म व अन्य बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण के लिए उपयोग किए जाने की पहल की शुरुआत है?

भारत -न्यूजीलैंड टैरिफ समझौते के बाद सेब की फसल की कीमतें गिरेंगी l यूरोपीय यूनियन के साथ समझौते के बाद खेती और कृषि बीज संबंधी कानून आ रहे हैं l ऐसे में हिमाचल के सेब व अन्य फल उत्पड़कों और किसानों के हितों की रक्षा कैसे होगी?

हिमाचल प्रदेश के लिए यह बजट निराशाजनक रहा l बजट डिफिसिट ग्रांट (BDG) के जो प्रावधान 75 वर्षों से थे उसे 16वें वित्त आयोग ने समाप्त कर दिया है, जिससे हर वर्ष लगभग 10000 करोड़ रुपए का राज्य को नुकसान होगा l

हिमालय नीति अभियान की ओर से केंद्रीय वित्त मंत्री को पत्र लिखकर हिमालय क्षेत्र के लिए विशेष बजट प्रावधान करने के लिए अनुरोध किया गया था ताकि प्राकृतिक आपदाओं से हो रहे नुकसान से निपटा जा सके, जो जलवायु परिवर्तन के इस दौर में हिमालय झेल रहा है l परन्तु आपदाओं से निपटाने के लिए इस बजट में कुछ भी विशेष प्रावधान नहीं किया गया है, जबकि इस वर्ष हुए आपदा से नुकसान के लिए प्रधानमंत्री द्वारा घोषित राहत का भी उल्लेख नहीं हुआ l


गुमान सिंह,
संयोजक हिमालय नीति अभियान


About जनपथ

जनपथ हिंदी जगत के शुरुआती ब्लॉगों में है जिसे 2006 में शुरू किया गया था। शुरुआत में निजी ब्लॉग के रूप में इसकी शक्ल थी, जिसे बाद में चुनिंदा लेखों, ख़बरों, संस्मरणों और साक्षात्कारों तक विस्तृत किया गया। अपने दस साल इस ब्लॉग ने 2016 में पूरे किए, लेकिन संयोग से कुछ तकनीकी दिक्कत के चलते इसके डोमेन का नवीनीकरण नहीं हो सका। जनपथ को मौजूदा पता दोबारा 2019 में मिला, जिसके बाद कुछ समानधर्मा लेखकों और पत्रकारों के सुझाव से इसे एक वेबसाइट में तब्दील करने की दिशा में प्रयास किया गया। इसके पीछे सोच वही रही जो बरसों पहले ब्लॉग शुरू करते वक्त थी, कि स्वतंत्र रूप से लिखने वालों के लिए अखबारों में स्पेस कम हो रही है। ऐसी सूरत में जनपथ की कोशिश है कि वैचारिक टिप्पणियों, संस्मरणों, विश्लेषणों, अनूदित लेखों और साक्षात्कारों के माध्यम से एक दबावमुक्त सामुदायिक मंच का निर्माण किया जाए जहां किसी के छपने पर, कुछ भी छपने पर, पाबंदी न हो। शर्त बस एक हैः जो भी छपे, वह जन-हित में हो। व्यापक जन-सरोकारों से प्रेरित हो। व्यावसायिक लालसा से मुक्त हो क्योंकि जनपथ विशुद्ध अव्यावसायिक मंच है और कहीं किसी भी रूप में किसी संस्थान के तौर पर पंजीकृत नहीं है।

View all posts by जनपथ →