हमरा के जगरनथवा बो क देले बीया। जगरनथवा बो हाकिन-डाइन बा ए भाई। टोला पर क लोग जे-जे बा आपन बाल-बच्चा के बचा के राखि जगरनथवा बो से। गोरखपुर में जगरनथवा बो क एगो बेटी बीया। दूनों डाइन बाड़ी सन।
बिहार के गोपालगंज जिले की एक महिला ने यह वीडियो सोशल मीडिया पर 10 फरवरी के आसपास अपलोड किया। यह इस कदर वायरल हुआ कि हफ्ते भर में ही सैकड़ों मीम्स बन गए। इसके जारी होने के तीन-चार दिन के भीतर 14 फरवरी को तूफानी लाल यादव ने एक गाना जारी कर दिया। उसके बाद तो इस मुद्दे पर लोकगीत गाने की होड़ सी लग गई।
रितेश पांडेय, बिरजू बिहारी, कृष्णा निदार, रागिनी यादव, रामबाबू रसिया, खुशी सिंह, खेसारी लाल यादव, गुड्डू रंगीला, समेत दस से ज्यादा गायकों ने एक सप्ताह के भीतर इस पर अलग-अलग संगीत और बोल के साथ गाना जारी कर दिया।
आमतौर पर होली के महीने भर पहले से भोजपुरी लोकगायक होली के गीतों का एलबम तैयार करना शुरू कर देते हैं लेकिन इस बार ‘जगरनथवा बो’ थीम के गाने की होड़ लगी रही। हालांकि यह होली में चौराहों पर नहीं बजा लेकिन हर किसी को ऑनलाइन लाखों व्यू मिले। मीम्स भी जारी हुए।
गोपालगंज से जारी पहले वीडियो के पीछे पैसे के लेनदेन का मामला था। जब वीडियो वायरल होने लगा तो इसकी कहानी भी सामने आने लगी। एक तरफ इस मामले को हास्य की चाशनी में लपेट कर मीम्स को गीत बनाने वाले परोसते रहे जबकि गोपालगंज में इस मसले पर महाभारत छिड़ गई थी। चरित्रहनन का यह मामला थाना-पुलिस तक पहुंच गया।
डायन हिंसा की समस्या बेहद गंभीर है। इसके पीछे सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों से मुकाबले आर्थिक कारण ज्यादा मजबूत हैं। सोशल मीडिया इस तरह की कूढ़मगजी को हवा देने में पीछे नहीं है। बीमारी, आर्थिक नुकसान, असमय मौत की जिम्मेदारी लोग अपने पास-पड़ोस के किसी कमजोर व्यक्ति पर आसानी से डाल देते हैं। विधवा, बुजुर्ग और आत्मनिर्भर महिलाओं को ज्यादातर मामलों में निशाना बनाया जाता है। पैतृक संपत्ति हड़पने के लिए डायन का आरोप लगाकर किसी को समाज से बहिष्कृत करने से ज्यादा आसान कोई तरीका नहीं हो सकता है। जातिगत भेदभाव भी डायन प्रथा के कायम रहने के पीछे के कारणों में से एक है।
झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, असम आदि राज्यों में डायन हिंसा निरोधक कानून होने के बावजूद हर साल सैकड़ों मामले सामने आते हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2000 से 2016 तक 2500 से अधिक महिलाओं की डायन घोषित करके हत्या कर दी गई। वर्ष 2020 में 88, 2022 में 85, 2023 में ऐसी हत्याओं के 74 मामले दर्ज हुए। अकेले झारखंड में 20 वर्षों में 1800 से ज्यादा मामले दर्ज हुए। अलबत्ता ओडिशा में 2020-24 को बीच में मामले घटकर 62 रह गए।
उत्पीड़न के मामले इससे कई गुना ज्यादा हैं। यह तब है जब उत्पीड़न के मामले में अलग-अलग राज्यों में एक से सात साल तक की कैद और 50 हजार से पांच लाख तक के जुर्माने का प्रावधान है। किसी की मौत होने पर तो आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है, परंतु लगता है कि दूसरों की संपत्ति हड़पने वालों के लिए यह जोखिम ज्यादा नहीं है।
वैसे भी जिन महिलाओं को डायन घोषित किया जाता है वे आमतौर पर बेसहारा होती हैं। उनकी ओर से पुलिस थाने की दौड़ लगाने वाला कोई होता नहीं। पुलिस की व्यवस्था भी ऐसी ही है कि जल्दी कमजोर की सुनती नहीं है।
पिछले कुछ वर्षों में समाज में अंधविश्वास की जड़े भी ज्यादा गहरी हुई हैं। भीड़ हत्या (मॉब लिंचिंग) के मामलों में पुलिस की शिथिलता और राजनीतिक संरक्षण के चलते तमाम अपराधी बेखौफ घूमते हैं। ‘जगरनथवा बो’ का मामला भी लेनदेन के विवाद से ही जुड़ा है लेकिन उसने जादू-टोना, तंत्र-मंत्र का तड़का लगाकर इसे अलग ही तरीके से परोस दिया है। इससे पीछे मीडिया के जरिये पाखंडी धर्माचार्यों और ज्योतिषियों का दुष्प्रचार भी है, जो लोगों को मानसिक रूप से घेरे हुए है।
कोई रचना लोकप्रिय तभी होती है जब मन की बात को शब्दों में पिरोकर पेश करे। ‘जगरनथवा बो’ के मीम्स और गानों की लोकप्रियता ने मन की बात उजागर कर दी है।


