पावर के प्रति हिकारत और आकर्षण के द्वैत में लटका बिहार

स्वप्न तो उस अब्सोल्यूट पावर का सभी देखते हैं क्योंकि सभी को पता है कि प्रशासन (एडमिनिस्ट्रेशन) में जाने पर आप निरंकुश हो सकते हैं; बिना जिम्मेदारी के भरपूर माल कूट सकते हैं; मजा काट सकते हैं और आपका रुतबा बढ़ सकता है। अंतर्मन में हालांकि, यही ऑब्सेशन घृणा बनकर बैठा हुआ है।

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क्या भारत सभ्यता के संकट से गुजर रहा है?

2014 में सिर्फ सत्ता नहीं बदली थी बल्कि तख्तापलट हुआ था। यह तख्तापलट आजादी के आन्दोलन के गर्भ से निकले भारत का था जहां धर्म, जाति, नस्ल, रंग, लिंग किसी भी भेदभाव के बगैर शासन चलाना सुनिश्चित किया गया था और एक राष्ट्र के रूप में भारत का बुनियादी विचार और ढांचा धर्मनिरपेक्ष था।

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इतनी आसानी से क्यों आहत हो जाती है ‘बिहारी गरिमा’?

बिहार की नेता-बिरादरी को चूंकि पता है कि जनता अपने मसायल में व्यस्त है, इसलिए उसे फिलहाल कोई चुनौती मिलने वाली नहीं है। यही वजह है उसकी शॉर्ट-साइटेडनेस (छोटी सोच की) और बिहार के बिहार बने रहने की।

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एक सौ दस साल पहले बहरों को सुनाने के लिए दिल्ली में फेंका गया था पहला बम

23 दिसंबर 1912 को, जब चांदनी चौक के एक मकान की छत से जोरावर सिंह, प्रताप सिंह और बसंत कुमार बिस्वास ने (जो कि एक महिला के वेष में थे) सरेआम हजारों लोगों की उपस्थिति में हार्डिंग के ऊपर बम फेंका। बम के धमाके से हार्डिंग के साथ हाथी पर सवार छत्रपाल मारा गया और स्वयं हार्डिंग और उसकी पत्नी को भी गंभीर चोट आयी।

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यहां चालीस मौतों पर हंसी-मज़ाक क्यों चल रहा है?

बिहार में किसी भी समस्या पर आप चर्चा करेंगे तो जवाब में बाहुबली विधायक अनंत सिंह का वह बहुचर्चित वीडियो-संवाद सुनने को मिल जाएगा, जिसमें वह पुरुषों के अंग विशेष से शासन की तुलना कर रहे होते हैं। कुल मिलाकर हाल बतर्जे जॉन एलिया हैः हाल ये है कि अपनी हालत पर / गौर करने से बच रहा हूं मैं…

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भारत में बाल अधिकार समझौते के तीन दशक: सफर, पड़ाव और चुनौतियां

भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ बाल संधि को स्वीकार किये जाने के 30 साल पूरे होने का यह मौका खास है। इस दौरान हुई उपलब्धियों का जश्न जरूर मनाया जाना चाहिए लेकिन इसके साथ यह मौका देश बाल अधिकारों को लेकर नये संकल्पों और उम्मीदों के साथ आगे बढ़ने का भी है।

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गुजरात चुनाव सत्ता को कांग्रेस द्वारा दिया गया ‘वाकओवर’ था! कुछ जरूरी बिन्दु

गुजरात चुनाव का कांग्रेस के लिए एक स्पष्ट सन्देश यही है कि वह मास पॉलिटिक्स के अपने सांगठनिक राजनैतिक तंत्र पर पुनः विचार करे। अन्यथा उसकी जगह आप पार्टी लेने को तैयार है।

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कल्याणकारी योजनाओं के प्रभाव से मातृ मृत्यु दर के मामले में तेलंगाना देश में तीसरे स्थान पर

आश्चर्य की बात नहीं है, जबकि अखिल भारतीय स्तर पर एमएमआर में केवल 25 फीसदी की कमी आई है, तेलंगाना ने 2014 में 92 से 2020 में 53 फीसदी (एमएमआर) की भारी कमी दर्ज की है।

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याराना पूंजीवाद की पराकाष्ठा: भाजपा की चुनावी कामयाबी और चुनावी बॉन्ड का रिश्ता

। 2020-21 के अंत तक सभी राष्ट्रीय दलों को चुनावी बांड से मिले चंदे का 80 प्रतिशत चंदा भाजपा को मिला और सभी राष्ट्रीय एवं राज्यस्तरीय दलों को मिलाकर मिले चंदे का 65 प्रतिशत भाजपा को मिला। जाहिर है कि भाजपा चुनावी बांड योजना की सबसे बड़ी लाभार्थी है और उसके कुल चंदे का लगभग दो-तिहाई अब चुनावी बांड के माध्यम से आ रहा है।

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आजमगढ़ में अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा: विकास के नाम पर लूट और विनाश का एक और खेल

लोग यह पूछ रहे हैं कि आजमगढ़ के आसपास वाराणसी, कुशीनगर, गोरखपुर, अयोध्या और अब तो लखनऊ (क्योंकि पूर्वांचल एक्सप्रेसवे बन जाने से दो-ढाई घंटे में लखनऊ पहुंचा जा सकता है) में भी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे होते हुए आखिर यहां हवाई अड्डे की क्या जरूरत है और दूसरा बनाना भी है, तो उपजाऊ जमीन पर क्यों बनाया जा रहा, कोई बंजर भूमि क्यों नहीं चुनी गई?

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