भारत जोड़ो यात्रा: बौद्धिकों के समझने के लिए तीन जरूरी पहलू

धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने साम्प्रदायिकता, जातिवाद आदि के विरुद्ध राष्ट्र्वादी परिप्रेक्ष्य से संघर्ष नहीं किया। भारत जोड़ो यात्रा वह जरूरी व ऐतिहासिक कार्य कर रही है।

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बदलाव की बाट जोहता गाबो का देश और हालिया राष्ट्रपति चुनावों के कुछ संदेश

उम्मीद तो यही है कि शकीरा और गाब्रिएल गार्सिया मार्केस की चमकीली, आकर्षक और सम्मोहक दुनिया रहा यह देश, जो हाल-फिलहाल सिर्फ नार्कोस के खूंखार पात्रों के नामों से जाना गया, अपने लाखों नाउम्मीद लोगों के लिए बदलाव के नये रास्ते तलाशेगा।

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देशभक्ति का शासनादेश और एम्मा गोल्डमैन से निकलते कुछ सबक

जैसे पावस ऋतु में दादुर बोल रहे हैं और कोयल चुप्पी मारे किसी पेड़ पर इनके शोर से अपनी मिठास को बचाते हुए लुकी-छुपी बैठी हो। हमें दादुरों का शोर सुनने की आदत हो चुकी है। हम अब दादुरों के कोलाहल में संगीत की स्वर लहरियां खोज चुके हैं। हम राग-रागि‍नियों में मस्त हैं। इनकी धुन पर नाचते-झूमते हम एक-दूसरे को देशभक्ति का सर्टिफिकेट बाँट रहे हैं।

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बिहार: कुर्सी बचाने की एक सामान्य घटना और दर्शकों की असामान्य उत्तेजना

नीतीश की राजनीतिक यात्रा को देखते हुए कोई सामान्य व्यक्ति भी यह बड़ी आसानी से कह सकता है कि वे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को सर्वोपरि रखने वाले राजनेता हैं और इसकी पूर्ति के लिए वे बड़ी आसानी से विचारधारा और नैतिकता के साथ समझौते कर सकते हैं।

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शामली चीनी मिल को कब्जे में ले सरकार वरना किसान उसे शहीदों को करेंगे समर्पित: PM को पत्र

इस क्षेत्र के पीड़ित किसान एवं अन्य तमाम जनता का माननीय प्रधानमंत्री जी से सादर अनुरोध है कि सरकार तुरंत इस चीनी मिल को अपने कब्जे में लेकर खुद संचालन करे और आजादी के दौरान इनके द्वारा जबरन फांसी पर चढ़ाए गए शहीद भगत सिंह, सुखदेव सिंह और राजगुरु के नाम से मिल प्रांगण में स्मारक स्थल बनाये।

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आदिवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय के लिए राज्य की क्षमायाचना का वक्त कब आएगा?

आने वाले वर्षों में जब संकीर्ण राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के पैरोकार इन मासूम आदिवासियों के मन में ईसाई और मुस्लिम अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत का जहर भरने में कामयाब हो जाएंगे तब हम साम्प्रदायिकता और हिंसा के नये ठिकानों को रूपाकार लेता देखेंगे

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क्या नये भारत में राज्य की इच्छा ही न्याय है?

अंतरराष्ट्रीय संधियों की बाध्यता को आधार बनाकर अपनी सुविधानुसार सत्ता नागरिक अधिकारों में कटौती कर रही है जबकि अंतरराष्ट्रीय कानून के उन उदार अंशों को रद्दी की टोकरी में डाला जा रहा है जो शरणार्थियों एवं अल्पसंख्यकों के अधिकारों से संबंधित हैं। ऐसे समय में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद लगाये आम आदमी की हताशा स्वाभाविक ही है।

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अशोक स्तम्भ विवाद: इन हिंसक शेरों का गुस्सा आखिर किस पर टूटेगा?

सेंट्रल विस्टा पर स्थापित प्रतिकृति के शेरों के पिचके हुए टेढ़े जबड़े, अधिक खुले हुए मुख, निकले हुए दांत, भयानक नेत्र, हिंसक चेहरा एवं पैरों और नाखूनों की बदली हुई बनावट तथा शेरों के शरीर एवं अयाल में केशों का विन्यास इन्हें एक रौद्र रूप प्रदान करते हैं। अशोक स्तंभ के शेरों की उपस्थिति आश्वासनदायी है जबकि सेंट्रल विस्टा के शेर भयोत्पादक हैं।

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फारवर्ड प्रेस के नाम को और कितना गंदा करोगे प्रधान संपादक?

जुन्हाई ने जो ईमेल मुझे भेजा है उसमें उन्होंने अपनी व्यथा को विस्तार से बताया है कि किस प्रकार से पिछले एक साल से आप लोगों ने उनका और उनके परिवार का जीवन नरक बना रखा है। उनके कुछ मित्रों ने भी इस सम्बन्ध में मुझसे सम्पर्क कर हस्तक्षेप करने का आग्रह किया है। पिछले एक सप्ताह में इस सम्बन्ध में जो बातें मेरे सामने आयी हैं, उनसे बहुत आश्चर्यचकित तो नहीं हूं, सिर्फ़ यह सोच रहा हूं कि आप लोग कितना नीचे गिरेंगे?

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स्वास्थ्य सेवाओं के राष्ट्रीयकरण की ज़रूरत और प्रासंगिक मांगें

आमतौर पर जो अनुभव कोविड काल का रहा, उसमें देखा गया कि न केवल ग़रीब लोगों के लिए निजी स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध नहीं थीं बल्कि जो पैसे खर्च करने में सक्षम थे, उन्हें भी निजी स्वास्थ्य सेवाओं से वो सेवाएँ नहीं मिल सकीं जिनके लिए वो बरसों-बरस भारी रकम लुटाते रहे हैं। ज़्यादातर काम वही सरकारी अस्पताल और सरकारी डॉक्टर और स्टाफ आया जिसे निजीकरण के युग में हाशिये पर धकेला जा रहा था, जिनकी ज़मीनें बेचीं जा रहीं थी, जिनके स्टाफ को ठेके पर रखा जा रहा था, जहाँ से दवाइयाँ मुफ़्त देना बंद किया जा रहा था।

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