प्रदूषक कम्पनियों के खिलाफ जलवायु मुकदमे करना हुआ आसान, गुणारोपण विज्ञान पर नया शोध


नेचर क्लाइमेट चेंज जर्नल में प्रकाशित ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक शोध की मानें तो दुनिया की प्रमुख तेल, कोयला और गैस कंपनियों को उनके कार्बन उत्सर्जन के कारण होने वाले जलवायु परिवर्तन के नुकसान के लिए कानूनी रूप से अब जिम्मेदार ठहराया जाना आसान हो सकता है। पीयर-रिव्यूड एट्रिब्यूशन साइंस बिल्कुल ऐसे साक्ष्य प्रदान कर सकती है जिसकी मदद से मुक़दमों में कार्य-कारण सम्‍बंध को समझने में न सिर्फ मदद मिल सकती है बल्कि इससे वकीलों को मामलों के अदालत में पहुंचने से पहले ही मुक़दमेबाज़ी की संभावनाओं का पता लगाने में मदद मिल सकती है।

दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन तेज़ी से कानूनी कार्रवाई का विषय बन रहा है। अब तक दुनिया भर में जलवायु संबंधी 1500 मुक़दमे दायर हुए हैं, जिसमें पिछले महीने का एक मामला भी शामिल है जहां एक डच अदालत ने शेल कंपनी को अपने उत्सर्जन में कटौती करने का आदेश दिया था।

अब तक अभियोगियों ने यह प्रदर्शित नहीं किया है कि प्रदूषकों के कार्यों को विशिष्ट जलवायु घटनाओं से जोड़ा जा सकता है। अब एट्रिब्यूशन साइंस (गुणारोपण विज्ञान) वैज्ञानिकों को इसकी गणना करने का अवसर देगा कि तूफ़ान, सूखा, हीटवेव या बाढ़ जैसी विशिष्ट घटनाओं में उत्सर्जन ने कैसे योगदान दिया।

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उदाहरण के लिए, हाल के एक अनुसंधान शोध में पाया गया कि जब 2012 में तूफान सैंडी यूनाइटेड स्टेट्स ईस्ट कोस्ट पर आया तो मानवीय कारण से समुद्र के स्तर में हुई वृद्धि ने कुल नुकसान में 8.1 बिलियन डॉलर की बढ़ोतरी की। एक और अध्ययन में पाया गया कि 2017 में टेक्सास में आये तूफान हार्वी के कारण हुए 67 बिलियन डॉलर के नुकसान के लिए जलवायु परिवर्तन ज़िम्मेदार था।

इस वैज्ञानिक विश्लेषण को उत्सर्जन के डाटा के साथ मिलाकर अभियोगी अब संभावित रूप से अपने नुकसान के लिए जीवाश्म ईंधन कंपनियों की ज़िम्मेदारी का हिसाब लगा सकते हैं। उदाहरण के लिए, पिछले शोध ने तापमान में वृद्धि और समुद्र के स्तर में वृद्धि की समानुपातिक गणना की, जिसके लिए एक्‍जॉन मोबिल, शेवरॉन, शेल और सऊदी अरामको सहित अन्‍य कंपनियों से उत्सर्जन को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

शोधकर्ताओं के अनुसार अभियोगियों ने अब तक नवीनतम एट्रिब्यूशन साइंस का उपयोग नहीं किया है। अध्ययन ने 14 न्यायालयों में कार्बन प्रदूषकों के खिलाफ 73 मामलों की समीक्षा की जिसमें पाया गया कि “अभियोगियों ने कार्य-कारण संबंध पर अपर्याप्त सबूत  मुहैया कराए हैं” लेकिन “यदि अदालतों को भविष्य के मुक़दमों में करणीय तर्क स्वीकार करना है तो बेहतर वैज्ञानिक सबूत एक स्पष्ट भूमिका निभाएगा।”

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ऑक्सफोर्ड सस्टेनेबल लॉ प्रोग्रैम एंड एनवायर्नमेंटल चेंज इंस्टीट्यूट, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के इस नये अध्ययन के अनुसार जलवायु संबंधी मुकदमों की सफलता के लिए मौजूदा बाधाओं को वैज्ञानिक साक्ष्य के उपयोग से दूर किया जा सकता है। यह अध्ययन 14 न्यायालयों में 73 मुकदमों का आकलन करता है और पाता है कि अभियोगियों द्वारा प्रस्तुत किये गये सबूत जलवायु विज्ञान के नाम पर काफ़ी पिछड़े हैं, जिससे अभियोगियों के दावों- कि ग्रीनहाउस-गैस उत्सर्जन से पैदा हुए प्रभावों से वे पीड़ित हुए हैं- में बाधा आती है।

ऐसे 73 फीसद मुकदमों में में पीयर-रिव्यूड (सहकर्मी-समीक्षित) साक्ष्यों का उल्लेख नहीं था और 26 ने बिना कोई सबूत दिये दावा किया था कि मौसम की घटनाएं जलवायु परिवर्तन के कारण हुईं। किवालिना के नेटिव विलेज बनाम एक्सॉन मोबिल कॉर्प के मुकदमे- जिसे यूनाइटेड स्टेट्स कोर्ट ऑफ अपील्स में ख़ारिज कर दिया गया था- जैसे हाई-प्रोफाइल मामलों ने दिखाया है कि सफल मुक़दमेबाज़ी के लिए करणीय संबंध का मज़बूत सबूत कितना महत्वपूर्ण है।

अध्ययन के प्रमुख लेखक, रूपर्ट स्टुअर्ट-स्मिथ, कहते हैं, “हाल के हफ्तों में, नीदरलैंडजर्मनी और अन्य जगहों पर सफ़ल मुक़दमों ने अदालतों द्वारा देशों और कंपनियों को नाटकीय रूप से अपने जलवायु लक्ष्यों को मज़बूत करने की मांग करते हुए देखा है। जलवायु मुक़दमेबाज़ी की शक्ति तेज़ी से स्पष्ट हो रही है, पर कई जलवायु संबंधी मुक़दमे नाकामयाब रहे हैं। यदि जलवायु परिवर्तन के कारण हुए नुकसान के लिए मुआवज़े की मांग करने वाली मुक़दमेबाज़ी में सफलता का सबसे अच्छा मौका पाना है तो वकीलों को वैज्ञानिक साक्ष्य का अधिक प्रभावी उपयोग करना चाहिए। जलवायु विज्ञान पिछले मामलों में अदालतों द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब दे सकता है और इन मुक़दमों की सफ़लता में आने वाली बाधाओं को दूर कर सकता है।”


Climateकहानी के सौजन्य से


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