निगमों और राज्य द्वारा जल, जंगल, ज़मीन, पहाड़ जैसे कुदरती संसाधनों का दोहन और लूट इन संसाधनों पर निर्भर औरतों की जिंदगी को छिन्न-भिन्न कर रहा है। नवउदारवादी अर्थव्यवस्था ने ‘विकास’ और औद्योगीकरण के इतिहास में निरंतर चलने वाली सर्वहाराकरण और वंचितीकरण की प्रक्रिया को तेज़ कर दिया है। जाति, जातीयता, वर्ग के पदानुक्रम और राज्य के प्रभुत्व सहित कलंकीकरण के सभी औज़ारों के साथ मिलकर पितृसत्ता औरतों के श्रम का शोषण करती है, उनकी आवाजाही व मेहनत पर नियंत्रण कायम करती है। नतीजतन, साधनों-संसाधनों तक उनकी पहुंच को और कम कर देती है। प्रतिरोध को दबाने के लिए भूमिहीन खेतिहरों और ठेका श्रमिकों पर झूठे मुकदमे डालकर उन्हें अपराधी करार दिया जाना अब भारत में पुलिस के द्वारा आम बात हो चली है। समूचे समुदाय को ही अपराधी ठहराया औपनिवेशिक काल से चला आ रहा है, जो लोगों को कलंकित और वंचित करता है। अनधिसूचित जनजातियों (डीएनटी, बंजारा समुदाय) की औरतों के मामले में औपनिवेशिक दौर से ही जड़ा गया कलंक उन्हें आज भी कमज़ोर बनाये हुए है, जबकि उनके श्रम का लगातार दोहन हो रहा है।
हाशिये के इन समुदायों की औरतों की जिंदगी में नवउदारवादी राज्य दोहरी षडयंत्रकारी भूमिका निभाता है- अपनी उपस्थिति और अनुपस्थिति दोनों के माध्यम से। जब शिक्षा, प्रशिक्षण, पोषण, स्वास्थ्य सेवा इत्यादि के माध्यम से आत्मनिर्भर बनने या तरक्की करने की बात आती है तो राज्य उनकी जिंदगी से नदारद रहता है। राज्य इन मामलों में कोई जिम्मेदारी अपने सिर नहीं लेना चाहता और नागरिकों को उनके ही संसाधनों के भरोसे छोड़ देता है। अपना घर चलाने, पेट भरने, बच्चों को पालने और अपनी जिंदगी बसर करने के लिए औरतें कड़ी मेहनत करती हैं। जैसे ही उन्हें अपनी जिंदगी में थोड़ी सी भी प्रतिष्ठा और सुरक्षा का इल्म होता है, राज्य या तो प्रत्यक्ष या फिर पूंजी के माध्यम से तत्काल परोक्ष दखल दे देता है।
जो राज्य अब तक निष्क्रिय था वह अचानक सक्रिय हो जाता है। इस सक्रियता को लक्षित कार्रवाइयों के रूप में देखा जा सकता है जिसका नतीजा होता है विस्थापन, ज़मीन, पेड़, मवेशी, रिहाइश इत्यादि मामूली संसाधनों की लूट और अंतत: पूर्ण वंचितीकरण, जहां समुदाय उसी बिंदु पर पहुंच जाता है जहां से उसने अपनी जिंदगी की शुरुआत की थी। लोगों और राज्य के बीच जो अदृश्य दीवार थी वह अचानक पिघल जाती है और राजसत्ता व उससे सम्बद्ध इकाइयों की ताकत खुलकर सामने आ जाती है।
अकसर हाशिये के इन समुदायों को इससे भी बुरी स्थिति में लाकर छोड़ दिया जाता है, चूंकि उनकी रिहाइश को ऐसा नुकसान पहुंचा दिया जाता है जिसकी भरपाई संभव नहीं होती। यह नुकसान स्थायी होता है। पीढि़यों से लोग अपने जल, जंगल, ज़मीन, पहाड़ को बचाने के लिए जो कमरतोड़ मेहनत कर रहे हैं वह मोटे तौर पर समाज से छुपा हुआ है जबकि इसके उलट निगमों ने उनके पीने के पानी में ज़हर मिला दिया है और जिस हवा में वे सांस लेते हैं उसे दूषित कर दिया है। इससे बड़े पैमाने पर रोग हो रहे हैं और लोग मर रहे हैं। निर्बाध पूंजीवादी विस्तार का एक विशिष्ट लक्षण है साझा पारिस्थितिकीय संसाधनों का विनाश, जिसे हम दोहनकारी पूंजीवाद कहते हैं। पूंजी दैनंदिन जो जुल्म लोगों पर करती है, उसके कारण निगमों के द्वारा उत्पादन कार्य शुरू किए जाने के काफी बाद तक भी प्रतिरोध की चिंगारी भड़कती रहती है, लेकिन कॉरपोरेट मीडिया इसे रिपोर्ट नहीं करता। यहां हम ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखण्ड और मध्य प्रदेश में संसाधनों की लूट के संदर्भ में विकसित होती हुई ऐसी प्रक्रियाओं को रेखांकित करेंगे।
ओडिशा में प्रतिरोध की कीमत

जाजपुर जिले के स्टील उत्पादन केंद्र कलिंगनगर में अंगुल-सुकिंडा रेलवे लाइन बनायी जा रही है। टाटा और अन्य कंपनियों ने यहां जबरन भूमि अधिग्रहण करने की कोशिश की जिसके खिलाफ एक सशक्त जन आंदोलन खड़ा हुआ था, जिसके चलते 2 जनवरी, 2006 को पुलिस की गोलीबारी में 13 आदिवासियों की जान चली गयी थी। इसके बावजूद आज भी विस्तार और भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया जारी है। कोई पचास से ज्यादा औरतों ने 7 जनवरी, 2020 को चेतावनी दी थी कि अगर उनकी ज़मीन से रेलवे लाइन गुज़री तो वे विरोध में खुदकुशी कर लेंगी। इसके अलावा कलिंगनगर के रंगाहुड़ी, बाघरायसाही और डाबुरी के ग्रामीणों ने रेलवे लाइन का निर्माण कार्य रोकने की कोशिश की। निर्माण कार्य के लिए पांच प्लाटून पुलिस की तैनाती की गयी और आठ व्यक्तियों को हिरासत में ले लिया गया।
यहां के गांव वाले भूमि अधिग्रहण के खिलाफ 2019 से ही कई धरने और रैलियां कर चुके हैं। एक बार जब गांव वालों ने निर्माण कार्य रोकने की कोशिश की तो गुरुबाड़ी महंतो नाम की एक महिला टकराव के दौरान ड्रेजर की चोट से घायल हो गयी। बाघरायसाही गांव के 46 वर्षीय साइबू महंतो 19 जनवरी, 2019 को अपनी जमीन पर गए थे। उन्होंने पाया कि रेलवे लाइन बना रही कंपनी ने ज़मीन को मलबे में तब्दील कर डाला था। वे वहीं सदमे में झटका खाकर गिर गए। दानागाडी के अस्पताल उन्हें ले जाया गया। सैकड़ों ग्रामीण खबर सुनते ही क्षेत्र में पहुंचे और उन्होंने काम रुकवाने की कोशिश की। साइबू महंतो उधर कोमा में चले गए और पैंतालीस दिन बाद उनकी मौत हो गयी।
23 जनवरी, 2019 को ग्रामीणों ने अपने किस्म का एक अनूठा विरोध प्रदर्शन किया जिसमें डुबुरी चौक पर बीजू पटनायक की प्रतिमा के पास उन्होंने थाली बजायी। भूमि अधिग्रहण के विरोध में यह ‘’भीख हड़ताल’’ थी। इन विरोध प्रदर्शनों के बाद दो बुजुर्ग औरतों की मौत हुई। जाहिर है, इनके धान के खेतों से रेलवे लाइन ले जाने के काम ने इनकी शारीरिक और मानसिक सेहत पर बहुत बुरा असर डाला था। पीढि़यों से यह जमीन उनकी जीवनरेखा थी और इनके परिवारों की आजीविका का इकलौता साधन थी। इन किसानों ने इंसाफ की गुहार लगाते हुए अदालत में याचिका दायर की है। कोर्ट ने ज़मीन अधिग्रहण पर रोक लगा दी है। इसीलिए जब ठेकेदार कंपनी पांच पुलिस प्लाटूनों के साथ ज़मीन समतल करने 7 जनवरी, 2020 को वहां पहुंची, तो महिलाओं ने मिट्टी के तेल और माचिस के साथ उन्हें चुनौती दी। वे खाली हाथ लड़ीं।
चार एकड़ जमीन की मालिक गुरबाड़ी महंतो ने अपने पति को खो दिया। वे कहती हैं:
पुलिस जब 7 जनवरी को पहुंची, तो मैंने पुलिसवाली को गिरेबान से पकड़ लिया और उसके पेट में मारा। उसने मेरी बांह पकड़ कर मोड़ दी। इस झड़प के अंत में मैं मजबूरन तालाब में कूद गयी। लोगों को लगा कि मैं मर गयी, लेकिन मैं वापस आयी। अपने हाथ के इलाज में मैंने 1000 रुपये खर्च किए। उस दिन वे मुझे मार ही डालते। मैं मरने को तैयार भी थी। मेरी जमीन वे ले लेंगे तो मैं खाऊंगी क्या? मेरे पास कुछ नहीं है, कोई नहीं, जो मेरा पेट भर सके। वृद्धावस्था पेंशन के हर महीने केवल 500 रुपये मिलते हैं। मेरी बहू मुझे एकाध किलो चावल दे सकती है। उसे भी तो अपने बच्चों का पेट भरना है। निर्माण मजदूरी कर के वो कुछ कमा लेती है। उन्हें 100 रुपये रोज़ मिलते हैं जबकि आदमी को 200 रुपये। हम बूढ़ों को कोई काम नहीं मिलता। दूसरी ओर जाने के लिए कोई मार्ग नहीं है। हम लोग यहीं पर अटके हुए हैं। अब तो हमें एक दूसरे के घर पहुंचने के लिए भी रेंगना पड़ता है। जब हम जमीन जोतते थे, हम सब के लिए पर्याप्त भोजन मिलता है। बचा हुआ चावल बेचकर मैं सालाना 20,000 कमा लेती थी। हमारे पास 15 महुआ के पेड़ भी थे। सब काट डाले गए। हम महंतों के लिए महुआ बहुत ज़रूरी है। कहा जाता है कि जहां महंतो होते हैं, वहां महुआ के पेड़ होते हैं। इसकी पत्तियां, फूल, फल सब हमारी जिंदगी का हिस्सा हैं।
जमीन गंवाने के बाद इनके पास केवल दिहाड़ी मजदूरी कर के कमाने का रास्ता बचा है। सबके पास बकरियां हैं, गायें हैं, कुक्कुट भी लेकिन केवल खाने के लिए। ज्यादातर पुरुष रोज़ निर्माण या ऐसे ही दिहाड़ी कामों पर जाते हैं। हमें बताया गया कि जब परिवार में कमाने वाला कोई और नहीं होता, औरतें तभी दिहाड़ी करती हैं।
ग्रामीणों का दावा है कि उनके पास जमीन के काग़ज़ात हैं और वे डुबुरी में राजस्व कार्याल में नियमित कर चुकाते हैं, लेकिन औरतों के नाम पर कोई पट्टा नहीं है। इस कारण से अगर से घर के पुरुष की मौत हो जाए या कोई और आपदा या जाए तो इन पितृसत्तात्मक समाजों में औरतों की स्थिति और नाजुक हो जाती है।
एक बुजुर्ग किसान ने बताया:
यहां हर कोई जमीन के आसरे था। हम लोगों ने कोई और काम किया ही नहीं है। या तो हम अपनी जमीन पर या दूसरे की जमीन पर काम करते थे, सत्तर से अस्सी साल से। हम लोग खुद पर निर्भर थे, आज़ाद थे। किसी की नौकरी या किसी साहूकार के भरोसे हम नहीं होते थे। हम लोग किसी की प्रजा नहीं थे। हम ये नहीं कह रहे कि अपनी जमीन नहीं देंगे। हमें तो बस बाजार के भाव से मुआवजा चाहिए। वे जमीन बेशक ले सकते हैं, लेकिन उसके बदले हमें जो मिलेगा क्या उसका कोई मतलब नहीं है? बाजार भाव इस समय 45 लाख एकड़ चल रहा है। फिर गरीब आदमी की ज़मीन पर सरकार लेती है तो जमीन सस्ती या मुफ्त क्यों हो जाती है? वे लोग जब खेतों को समतल करने आए तो उन्होंने पहले से कोई नोटिस नहीं दिया था। न नोटिस, न मुआवजा।
एक और विरोध प्रदर्शन उसी हफ्ते रायगढ़ा जिले में हुआ। 3 जनवरी, 2020 को पैकाकुपखल गांव की आदिवासी औरतों ने चंद्रागिरि में हाइवे जाम कर दिया। करीब 41 औरतों और आठ बच्चों को गिरफ्तार कर लिया गया। इनमें तीन गर्भवती औरतें थीं। रायगढ़ा के काशीपुर ब्लॉक में बॉक्साइट खनन करने वाली कंपनी उत्कल अलुमिना इंटरनेशनल लिमिटेड के खिलाफ पहले भी आंदोलन हो चुके हैं। यह कंपनी खनन के साथ बॉक्साइट का प्रसंस्करण भी करती है। खनन से होने वाले पर्यावरणीय खतरे के खिलाफ ग्रामीण इसके अलुमिना प्लांट का विरोध कर रहे हैं। वे लगातार उन नौकरियों और पारिश्रमिक की मांग कर रहे हैं जिसका वादा किया गया था लेकिन आज तक उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं। पैकाकुपखल गांव बाफलीमाली पहाडि़यों की शुरुआत में स्थित है जो बॉक्साइट का स्रोत है। इस गांव से खोदा गया बॉक्साइट ले जाया जाता है। इसके कारण यहां के लोगों को बहुत कष्ट झेलना पड़ा है। 25 अगस्त, 2014 को केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल गांव में पहुंचा और उसने ग्रामीणों से मारपीट की। ग्रामीणों को गंभीर चोटें आयीं। 3 जनवरी, 2019 को महिलाओं ने कंपनी का ध्यान खींचने के लिए चंद्रागिरि चौक पर हाइवे जाम कर दिया। कंपनी ने 17 अक्टूबर, 2019 को एक समझौता किया और 25 महिलाओं को 4500 रुपये प्रतिमाह देने का वादा किया। इस समझौते पर तहसीलदार और काशीपुर पुलिस दोनों ने दस्तखत किए, इसके बावजूद इन महिलाओं को उसी पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया।
नियमगिरि पहाड़ की तलहटी में रहने वाले आदिवासियों और दलितों को भी अपराधी बताने का काम हो रहा है। भूमिहीन दलितों का ये समुदाय लांजीगढ़ स्थित वेदांता की रिफाइनरी से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को लंबे समय से बरदाश्त कर रहा है। कंपनी के साथ इनका टकराव 2000 के मध्य से शुरू हुआ जब जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा था। वेदांता अलुमिनियम लिमिटेड में उत्पादन क्षमता जैसे जैसे बढ़ती गयी, भूमिहीन परिवारों की दिक्कतों में भी इजाफा हुआ। इनमें ज्यादातर ठेका मजदूर हैं।
- वजूद की जंग: पहली किस्त
- वजूद की जंग: दूसरी किस्त
- वजूद की जंग: तीसरी किस्त
- वजूद की जंग: चौथी किस्त
- वजूद की जंग: आखिरी किस्त
कंपनियां जब अपने किए रोजगार और मुआवजे के वादे से मुकरती हैं तब संघर्ष अचानक गंभीर मोड़ ले लेता है। कुछ ठेका मजदूरों की मौत भी हुई है। ऐसे में औरतों को रोज़मर्रा घर चलाने की जिम्मेदारी निभाने में दोहरा संकट आन पड़ता है। पहला, प्रशासन द्वारा लगाए जाने वाले झूठे मुकदमे झेलना, दूसरा समुदाय और कंपनी के संघर्ष में मारे गए किसी अपने के बाद का संकट। एक आदिवासी और दो दलित ठेका मजदूरों की मौत के इर्द गिर्द इन कारकों को समझा जा सकता है।
हरिजन पटनायक की मौत 23 अगस्त, 2019 को भवानीपटना जिला जेल में हुई। यह खबर जब उसकी पत्नी मनोरमा हरिजन तक पहुंची, तो वह सदमे से बेहोश हो गयी। उसे लांजीगढ़ के अस्पताल में भर्ती कराया गया। उसके बच्चे तबाह हो गए। उनका बाप परिवार का इकलौता कमाने वाला शख्स था।उसे 2 मई को पुलिस कुछ और ग्रामीणों के साथ उठाकर ले गयी थी। ज्यादातर इनमें भूमिहीन दलित थे। इन पर फर्जी आरोप लगाए गए। जब उसकी लाश गांव लायी जा रही थी तब प्रशासन ने वेदांता अलुमिनियम के रिफाइनरी प्लांट के आसपास के इलाके में धारा 144 लगा दी।
जेल के अधिकारियों ने उसकी बीमारी की खबर या उसे बुरला के विमसर अस्पताल ले जाए जाने की सूचना परिवार को नहीं दी। हिरात में हुई मौत की जांच का आदेश देने के बजाय सरकारी अधिकारियों ने वेदांता से परिवार को मुआवजा दिलवा दिया। चूंकि मृतक और अन्य की गिरफ्ताारी कंपनी के हित में प्रशासन द्वरा की गयी थी, तो कंपनी को हिरासत में हुई मौत की भरपाई करनी पड़ी ताकि परिवार को संतुष्ट किया जा सके और गांव में पनपते असंतोष को थामा जा सके। इस सौदे ने जिला प्रशासन के अफसरों को जेल में हुई एक मौत से मुक्त कर दिया।

दानी बत्रा नाम के एक ठेका मजदूर की मौत के बाद वेदांता अलुमिनियम की रिफाइनरी के आसपास बसे गांवों में लोगों की गिरफ्तारी और दमन की जांच के लिए कोऑर्डिनेशन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स ऑर्गनाइजेशन और गणतांत्रिक अधिकार सुरक्षा संगठन ने एक तथ्यान्वेषक दल गठित किया। उसकी मौत प्लांट के मुख्यद्वार पर 18 मार्च, 2019 को ओडिशा औद्योगिक सुरक्षा बल के लाठीचार्ज के कारण हुई थी। इस घटना के दौरान बल के एक सिपाही सुजित मिंज़ ने भी अपनी जान गंवा दी थी, जो उरांव आदिवासी था और सुंदरगढ़ जिले का रहने वाला था। उसकी लाश परिसर के भीतर जली हुई पायी गयी और उसके पैर बंधे हुए थे। समूचे घटनाक्रम की व्यवस्थित जांच करने के बजाय पुलिस प्रशासन ने सिपाही की मौत के नाम पर कथित जिम्मेदार लोगों की गिरफ्तारी कर के आतंक बरपा दिया। इससे संबंधित एफआइआर में 22 नामजद लोगों के अलावा 300 अन्य को शामिल किया गया। गिरफ्तारी के भय से लोग पहाड़ों में भाग गए और हफ्तों-महीनों वहीं रहे। इन्हीं 29 गिरफ्तार लोगों में एक था हरजिन पटनायक। इन सब पर आइपीसी की धाराओं 147, 148, 149, 323, 325, 436, 302 और 506 के अलावा आर्म्स एक्ट में मुकदमा कायम किया गया।
क्या हुआ था उस सुबह रिफाइनरी संयंत्र के गेट पर? दानी बत्रा, जो अपनी सुबह की पाली शुरू करने के लिए परिसर में प्रवेश कर रहा था, प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई झड़प में फंस गया था। वह भी उसी समुदाय और क्षेत्र से आता है जहां से प्रदर्शनकारी थे। रेंगोपल्ली, चतरापुर और बंधागुड़ा के लोग स्थायी रोजगार, अपने बच्चों के लिए शिक्षा और बाकी लोगों के लिए भी रोजगार की मांग कर रहे थे। वहां मौजूद ओडिशा औद्योगिक सुरक्षा बल ने कानून अपने हाथ में ले लिया।
लांजीगढ़ के आसपास रहने वाले ग्रामीण भी पारिस्थितिकी के विनाश के असर से प्रभावित हैं। वंशधारा नदी में उत्सर्जित किए जाने वाले प्रदूषक तत्व के कारण उस नदी पर निर्भर कई लोगों की मौत हुई है और कई बीमार हो चुके है। नियमगिरि क्षेत्र में ऐश पॉन्ड बनने का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है जो अपनी जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है। बॉक्साइट के लोभ में कंपनी ने सभी पर्यावरणीय मानकों को ताक पर रख दिया है और नागरिकों के असहमत स्वरों को दबाने के लिए राज्य ने कंपनी की मदद के लिए सुरक्षा बल तैनात किया हुआ है।
उस दिन दानी बत्रा को भी लाठीधारी सुरक्षा बल ने दौड़ा लिया। वह खुद को बचाने के लिए एक तालाब में कूद गया। चूंकि उसे पहले पीटा जा चुका था (और शायद उसके हाथ और कंधे टूट चुके थे), तो वह तैर नहीं सका और डूबकर मर गया। उसकी पत्नी सैंद्री बत्रा ने बताया कि वह परिवार चलाने के लिए कड़ी मेहनत करता था। वह अंबेडकरवादी था और बौद्ध पंथ को मानता था। उसके ऊपर अपने बेरोजगार भाई और उसके दो बच्चों के परिवार का भी भार था।

आदिवासी और दलित समुदाय के मजदूर परिवार जो ठेके पर काम करते हैं, कॉरपोरेट और राजकीय हिंसा के भय के साये में जीते हैं। उनके ऊपर झूठे मुकदमे लादे जा सकते हैं, जैसा कि गांव वालों के साथ किया गया, ताकि ओडिशा औद्योगिक सुरक्षा बल द्वारा की गयी हिंसा को छुपाया जा सके। इसी के चलते दानी बत्रा की मौत हुई। मौत न होती तो वह हरिजन पटनायक की तरह फर्जी आरोप में जेल में सड़ता और अंत में वहीं मर जाता।
यहां शुरुआत से ही स्थानीय लोगों की गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू हो चुका था। वेदांता का निर्माण कार्य एक बार पूरा हो गया तो कंपनी रोजगार के अपने वादे में टालमटोल करने लगी। महिलाओं ने नौकरी के लिए बहुत संघर्ष किया, जिनमें ज्यादातर दलित थीं। जब उत्पादन का परीक्षण किया जा रहा था उस दौरान एक व्यक्ति एक मवेशी के साथ मारा गया क्योंकि नदी प्रदूषित हो चुकी थी। इससे उपजे सामूहिक सदमे ने लोगों में आक्रोश को जन्म दिया। विरोध में लोग प्लांट से निकल रही पाइपलाइन को तोड़ दिए और अगले ही दिन उन्होंने कंपनी के गेट पर ताला जड़ दिया। बदले की कार्रवाई में प्रशासन और कंपनी ने दस औरतों पर चोरी का मुकदमा कर दिया। पांच को लांजीगढ़ थाने ले जाया गया। अन्य पांच को भवानीपटना थाने ले जाया गया। इनमें उनके दो बच्चे भी थे जिन्हें गिरफ्तार किया गया। 22 फरवरी, 2010 को दर्ज की गयी एफआइआर में आरोप है कि इन औरतों ने रिफाइनरी के परिसर में घुसकर तीन घंटे तक हिंसा की और कुछ हजार टन स्टील का सामान चुरा ले गयीं।
जयन्ती डाकरी, पुर्नमी बिभर और तुलसा बिभर ने बताया:
कमला बिभर तीन माह पहले गुज़र गयीं। वे अदालती मुकदमे को लेकर लगातार चिंतित रहती थीं। अब तो आठ साल गुज़र गए और बाहरी लोग हमें अब भी चोर डकैत समझते हैं। जिस दिन हमें गिरफ्तार किया गया, हम अपने खेतों में काम कर रहे थे, कंपनी के आसपास भी नहीं थे। हमें केवल इसलिए सजा दी गयी क्योंकि हम कंपनी द्वारा किए नौकरी के वादे को पूरा करने की जिद पर अड़े थे। हमने देखा था कि दूसरे राज्यों से यहां सैकड़ों मजदूर काम करने के लिए लाए गए थे। हमें अब भी नौकरी की जरूरत है। क्या यह उम्मीद जायज नहीं? कंपनी के आने से पहले हम खेतों में मजदूरी कर के कमा लेते थे। अब तो यहां कोई जमीन ही नहीं बची और प्रदूषण सबको बीमार कर रहा है। हमने आखिर कौन सा जुर्म किया है? हम तो अभी जवान हैं, पूरी जिंदगी हमारे सामने पड़ी है।
खासकर जमीन ले लिए जाने के बाद औरतों को आपराधीकरण का एक अदृश्य कलंक और दर्द झेलना पड़ता है जबकि कंपनी के ऊपर प्रशासन का साया बना रहता है।
छत्तीसगढ़ में खनिज का अभिशाप
छत्तीसगढ़ मध्य भारत का एक और खनिज संपन्न राज्य है, जिसे 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से अलग किया गया था। यहां खनन कंपनियां और अन्य औद्योगिक परियोजनाएं उसके बाद बड़ी संख्या में उग आयी हैं। यहां के गांवों में कंपनी और सरकार से मिले धोखे की बातें आम हैं। कभी भी नौकरी और मुआवजे का वादा यहां पूरा नहीं होता। खनन की सनक ने पारिस्थितिकी को एक सिलसिलेवार दु:स्वप्न में तब्दील कर डाला है।
व्यापक स्तर पर किए जा रहे खनन से पर्यावास को हो रहे नुकसान और विनाश को इफ शी बिल्ट ए कंट्री नामक वृत्तचित्र में बहुत सशक्त तरीके से चित्रित किया गया है। इस क्षेत्र में रह रही औरतों की आवाज़ें साझा संसाधनों की लूट खसोट की कथाएं कहती हैं।
रायगढ़ जिले के नगरामुड़ा गांव की जानकी सिदर कहती हैं, ‘’हम लोग यहां कुछ जगहों पर दाल और गेहूं उगाते थे, धान उगाते थे, आलू प्याज भी।‘’
यहां 2013 में हुई एक जनसुनवाई में गांव वालों को कोयला खनन के लिए एक कंपनी को जमीन दिए जाने पर अपनी बात रखनी थी। गारे गांव की रेवती ने उस वक्त घोषणा की थी, ‘’मैं कयेला नहीं खाती, अनाज खाती हूं। मैं कंपनी का विरोध करती हूं।‘’ फिल्म के मुताबिक उसी गांव की रविता सिदर ने कहा था, ‘’मैं पांच साल से कंपनी का विरोध कर रही हूं। इस जनसुनवाई को रद्द करो।‘’
रायगढ़ की ये औरतें जंगल और जमीन से अपने रिश्ते पर कहती हैं:
हम लोग अपने कुदरती संसाधन बचाने में लगे हुए हैं। हम लोग तेंदू, चार, आम, इमली आदि पर निर्भर हैं। हम लोग बीमारी ठीक करने के लिए हर्रा भून कर खाते हैं, लेकिन अब हम लगातार बीमार पड़ जाते हैं। खनन के कारण जंगल तक जाने वाला रास्ता 10 किलोमीटर लंबा हो गया है, इसलिए जाने में दिक्कत होती है। फिर वहां के गार्ड हमें खदान के रास्ते जंगल में घुसने से रोकते हैं। हम लोग उनकी नहीं सुनते। ये जंगल हमारा है।
हमारे पास जमीन नहीं है। अब मैं अपने परिवार का पेट भरने के लिए यहां जंगल में धान जौ उगाती हूं। हमारे पास और कोई रास्ता नहीं है। इस जमीन से झाड़ी पत्थर हटाकर इसे जोतने लायक बनाने के लिए मैं कई दिन महुआ खाकर जिंदा रही हूं।
किसी के पास अगर जमीन नहीं है तो वह जंगल से जलावन लकड़ी लेकर बेच सकता है। हम लोग महुआ बीन कर अपना जीवन चलाते हैं। जंगल हमारे लिए बहुत जरूरी है।
जितनी भी जमीन बची है हमारे पास, उसे बचे रहने दो। हम उसे न सरकार को देंगे, न कंपनी को।
जमीन अगर औरतों के नाम पर होती, तो वे उसे नहीं बेचतीं। हम लोग कभी इसके लिए तैयार ही नहीं होते। अधिकतर औरतों ने ऐसा नहीं किया होता। जमीन हमारी जिंदगी है। लड़ाई भविष्य की है ताकि हम अच्छे से जी सकें।
भगवती भगत
इन्हीं में एक जानकी सिदर हैं जिन्होंने चौदह साल संघर्ष किया और अपनी जमीन वापस ली।
ओडिशा की ही तरह छत्तीसगढ़ में भी एक बुजुर्ग अपनी जमीन पर एक दिन अचानक विशाल गड्ढा देखकर सदमे में गिर गया था।
ओडिशा, छत्तीसगढ़ और झारखंड में खेतीबाड़ी और वनोत्पाद पर निर्भर औरतों के सामने सबसे बड़ी समस्या सुरक्षा बलों की भारी तैनाती है, जो माओवादियों से निपटने के नाम पर की जाती है। राज्य और पूंजी के गठजोड़ से पैदा किया गया यह विशुद्ध दमन है जो पीढि़यों से इन क्षेत्रों में रह रहे लोगों के कुदरती संसाधनों और जमीनों को इनसे छीन लेते हैं। छत्तीसगढ़ में तो सीआरपीएफ और अर्धसैन्य बल स्थायी रूप से तैनात हैं। जंगलों और खेतों में दिहाड़ी खेतिहरों को रोजाना इनसे दो चार होना पड़ता है। कभी कभार इन बलों के छापे में खेती के सामान और मवेशी नष्ट या जब्त कर लिए जाते हैं। बचायी हुई मामूली कमायी भी लूट ली जाती है। आदिवासी पुरुषों और स्त्रियों को जहां राज्य का अत्याचार सहना पड़ता है, वहीं औरतें खासकर सुरक्षा बलों द्वारा की गयी यौन हिंसा का बर्बर शिकार बनती हैं। इसके बावजूद वे अपनी आवाज उठाना नहीं छोड़ती हैं और अपनी जिंदगी को तबाह करने वाले खनन पर लगातार सवाल करती हैं।
झारखंड में विस्थापित जिंदगियां
बिहार का हिस्सा रहा झारखंड सन 2000 में बिहार पुनर्गठन कानून के तहत स्वतंत्र राज्य बना। यहां अलग राज्य बनाने की मांग इसलिए उठी थी क्योंकि दशकों से इस क्षेत्र की उपेक्षा जारी थी जिसके चलते यहां के सामाजिक आर्थिक विकास के संकेतकों की स्थिति बुरी थी। स्वतंत्र राज्य बनने के बाद यहां विकास तो आया, लेकिन लौह अयस्क, कोयला, ताम्बा, माइका, बॉक्साइट, ग्रेफाइट, चूना पत्थर और यूरेनियम की लूट के रास्ते। इसके चलते यहां के लोगों को बडे पैमाने पर विस्थापित होना पड़ा और सुदूर जगहों पर जाकर उन्हें मामूली पारिश्रमिक में अपना श्रम बेचना पड़ा। आज झारखंड यानी जंगलों की भूमि नंगी खड़ी है, यहां से जंगल खत्म हो चुके हैं।
सरकारी क्षेत्र की कंपनी यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (यूसीआइएल) यहां के जादूगोड़ा में 1967 से यूरेनियम का खनन और प्रसंस्करण करते आ रही है। नरवापहाड़, भाटिन, तुरमडीह और बांधुरंग में भी यूरेनियम खनन होता है। तुरमडीह प्रोसेसिंग प्लांट को 2003 में मंजूरी मिली जहां तुरमडीह, बांधुरंग और मोहुलदीन खदानों के यूरेनियम अयस्क को प्रसंस्करित किया जाना था। नरवापहाड़ में खनन अधिकतम सीमा तक पहुंचने के बाद यह सक्रिय हुआ। हमने तुरमडीह और आसपास के कुछ गांवों के टेलिंग तालाबों को देखा। निश्चिंतपुर गांव के लोगों ने बताया कि कैसे वहां के तमाम जल स्रोत पूरी तरह दूषित हो चुके हैं। एक व्यक्ति ने बताया:
इस पानी के पीने से बंदरों और साही की मौत हो चुकी है। इसमें न मेंढक हैं, न केकड़े, न मछली। इस पानी में अगर आप सोना या चांदी डुबा दें तो वो काला हो जाता है और चमड़ी सफेद हो जाती है। मवेशी इस पानी को पी ले तो मर जाता है। कंपनी ने किसी को भी इस पानी का नमूना लेने से रोक रखा है। ट्यूबवेल का पानी कभी हरा-पीला होता है, तो कभी लाल काला।
पीढि़यों से अपने जीवनयापन के लिए खेती पर निर्भर इन लोगों का गुज़र बसर अब मुश्किल हो चला है। वे कहते हैं:
ज़मीन पूरी तरह चौपट हो चुकी है इसलिए खेती अब नहीं हो सकती। पहले हम लोग रबी और खरीफ़ दोनों उगाते थे। ज्यादातर दिन एक ही फसल होती थी क्योंकि यहां सिंचाई के लिए बहुत पानी नहीं है, फिर भी उतनी ही फसल हमारा पेट भरने और बेचने भर के लिए काफी होती थी।
इन लोगों ने अस्सी और नब्बे के दशक से ही लगातार खनन से होने वाले रेडियोधर्मी उत्सर्जन और दूषण को चुनौती दी है लेकिन आज भी उनका घातक असर ये झेल रहे हैं। रोगों की कोई कमी नहीं है, खासकर औरतों से जुड़ी बीमारियों की। एक गांव वाले कहते हैं:
यहां कई स्वास्थ्य समस्याएं हैं, जैसे समय से पहले प्रसव होना, गर्भपात होता, नपुंसकता, अनुर्वरता, त्वचा के संक्रमण और रिएक्शन। अंधता, पोलियो और तपेदिक भी होता है यहां, लेकिन हम लोगों के स्वास्थ्य संकट पर कोई सर्वे या शोध अब तक नहीं हुआ है। नांदुप गांव में तो तपेदिक के कई रोगी हैं। पहाड़ के दूसरी तरफ के गांवों की हालत और खराब है। कर्मचारी कंपनी के अस्पताल में जा सकते हैं लेकिन गांव के प्रभावित लोग नहीं। उन्हें सरकारी अस्पतालों में ही जाना पड़ता है। कोई आकस्मिक स्थिति आए तो परिवहन की सुविधा ही उपलब्ध नहीं है।
यहां बीटेक की पढ़ाई किए नौजवान बेरोजगारी से तनाव में हैं। उनका कहना है कि यूसीआइएल में ‘’बाहरी’’ लोगों को नौकरी मिलती है, उन परिवारों को नहीं जिनकी जमीनें यूसीआइएल ने ली हैं। जेमा गुरिया बंगलुरु की एक आइटी कंपनी में काम करती थीं। उन्होंने बताया कि आवेदन के बावजूद यूसीआइएल का उन्हें कोई जवाब नहीं मिला।
इंजीनियरिंग की डिग्री होने के बावजूद लोकल लोगों को यूसीआइएल में काम नहीं मिलता। यहां इंजीनियर और अफसर सब उत्तर बिहार से हैं। मुश्किल से एक चौथाई नौकरियां विस्थापित परिवारों को मिली हैं। हमें लंबी अवधि में विकास पर सोचना होगा।
राजू नाम के एक नौजवान इंजीनियर बताते हैं:
जब हमारी जमीन ली गयी थी तो हमें लिखित में नौकरियों का आश्वासन दिया गया था। जिन लोगों को आश्वासन दिया गया था उनमें से ज्यादातर लोग अब घर बैठे हैं। हमें बताया गया था कि प्राथमिकता के आधार पर उन लोगों को नौकरी दी जाएगी जिनकी ज्यादा जमीन ली गयी है। जंगल में रहने वाले कुछ लोगों को थोड़ी बहुत नौकरी मिली है। हमें काफी कम मुआवजा मिला। अब यहां से लोग मजदूरी करने पंजाब और चेन्नई जाते हैं।
यहां की जमीन और जंगल यूरेनियम खनन से नष्ट हो चुके हैं। स्थानीय लोगों के असंतोष को देखते हुए यूसीआइएल निगरानी और लोगों का मूड भांपने पर पैसा खर्च कर रहा है ताकि किसी आसन्न संकट को टाला जा सके। इसके लिए उसके पास मुखबिर होते हैं जिन्हें फ्री हाजिरी कहा जाता है। उनका काम है लोगों पर नजर रखना और इसके बदले में उन्हें वेतन मिलता है। हमें बताया गया कि गांव में कंपनी के दलाल भी मौजूद हैं।
झारखंड की दास्तान इस तथ्य की गवाही देती है कि विस्थापन का असर पीढियों को झेलना पड़ता है। नुआमुंडी ब्लॉक के 62 से ज्यादा गांवों में हो जनजाति की आबादी की बहुलता है। ये लोग तीन चार पीढ़ी पहले टिस्को यानी टाटा स्टील से विस्थापित हुए थे। इन्हें इनकी जमीन से उखाड़कर जंगलों में भेज दिया गया था जब सरकार ने जमीन टाटा को सौंपी। इनके पास जमीन के पट्टे नहीं थे। जंगल में स्थानीय मुंडाओं या ग्राम प्रधानों ने इन्हें बसाया। ओमान महिला संगठन की एक कार्यकर्ता रमतिया हमें अपने पिता के घर गिटिलोर लेकर गयीं। वहां करीब 65 परिवार रहे होंगे। वह एक छोटी सी बस्ती है।

उनके पिता याद करते हुए बताते हैं कि कैसे उनका समूचा बचपन अपने बुजुर्गों को हाड़तोड़ मेहनत करते देखते गुजरा ताकि धान के लिए जमीन को उपजाऊ बनाया जा सके लेकिन आज इस जमीन से उनका गुजारा नहीं हो पा रहा। न ही कंपनी उन्हें कोई काम देती है। आज यहां के नौजवान जीवनयापन के लिए सूरत, अमदाबाद, चेन्नई या भुवनेश्वर जैसी जगहों पर पलायन कर रहे हैं। एक मजदूर गुजरात से कुछ कड़वे अनुभव लेकर तभी लौटा था। उसने बताया कि वो और उसके तीन साथी कैसै बारह घंटे रोजाना काम करने के बावजूद खाली हाथ घर लौटे हैं। उनके साथ धोखा हुआ। उनके पूर्वजों के पास जमीन थी इसलिए वे स्वावलम्बी थे। वे तो बस साफ हवा, साफ पानी, शिकार और धान की खेती की कहानियां सुनते हैं। नकदी के आने से पीढि़यां तबाह हो गयी हैं। आज तक वे ईंधन, भोजन और दवाओं के लिए जंगलों पर ही निर्भर हैं। जंगलों के काम में ज्यादा औरतें ही जुड़ी होती हैं।
औरतें घंटों समय लगाकर वन उत्पाद बटोरती हैं। इस कड़ी मेहनत को वे खुद अपनी नजर में श्रम नहीं मानतीं। ओमान महिला संगठन द्वारा नुआमुंडी के पास आयोजित एक कार्यशाला में कइ औरतों ने कहा, ‘’मैं कुछ नहीं करती।‘’ थोड़ा और पूछने पर उन्होंने अपना मुंह खोला। एक ने बताया, ‘’मैं सुबह 4.30 पर उठती हूं। बरतन साफ करती हूं, पानी लेने जाती हूं, जंगल जाकर जलावन ले आती हूं, फिर खाना बनाती हूं, कपड़े धोती हूं, बच्चों की देखभाल करती हूं, उन्हें स्कूल भेजती हूं और फिर खेत में काम पर चली जाती हूं।‘’ कई औरतों की दिनचर्या यही थी। स्कूल कॉलेज जाने वाली छोटी लड़कियां भी अपनी जिम्मेदारियां निभाती हैं। ‘’मैं पांच बजे उठती हूं, बरतन मांजती हूं, घर के लिए खाना पकाती हूं, फिर अपनी साइकिल से स्कूल कॉलेज जाती हूं। शाम को 4 बजे वापस आती हूं, पानी भरती हूं और फिर अगर मेरी मां या बहन जंगल नहीं गयी हो तो वहां जाकर जलावन ले आती हूं।‘’ कुछ और लड़कियों ने बताया कि वे हर इतवार वन उत्पाद ले आती हैं और बाकी दिन उनकी मांएं ये काम करती हैं।
यहां जंगल के बिना जिंदगी की कल्पना ही नहीं की जा सकती। जंगल इनकी जीवनरेखा है। खदानों के विस्तार की बात से ये डर जाते हैं कि कहीं फिर से विस्थापित न होना पड़े, लेकिन वे प्रतिरोध के लिए दृढ़ संकल्प हैं। झारखंड के खनन विरोधी आंदोलन का नारा है:
एक इंच जमीन नहीं देंगे
एक सामुदायिक कार्यकर्ता अम्बिका दास ने बताया कि नुआमुंडी की जमीन टाटा के पास पहले से ही है और वो जो चाहे कर सकती है, लेकिन अबकी विस्तार की किसी भी योजना का विरोध होगा। वे कहती हैं:
हमारे संगठन ओमान महिला संगठन ने टाटा की एक जनसुनवाई का विरोध किया था जो उसके परिसर के भीतर डीएवी स्कूल में 12 मार्च 2012 को होनी थी। कंपनी अपने पट्टे को विस्तारित करना चाह रही थी। 2005 में भी इसका विरोध हुआ था इसीलिए वे किसी भी विरोध को कुचलने के लिए तैयार बैठे थे। जोड्डा के टाटा माइंस अस्पताल में मेरी चचेरी बहन नर्स है, उन्होंने उस पर दबाव डाला। उन्होंने उसे धमकी दी कि अगर मैंने विरोध जारी रखा तो उसकी नौकरी चली जाएगी। उसके परिवार और दूसरे परिजनों ने भी मुझे रोका। फिर टाटा के महाप्रबंधक ने अपने दफ्तर में मुझे बुलवाया और विरोध प्रदर्शन नहीं करने का दबाव डाला। उसने मेरी बहन को नौकरी से निकालने की धमकी दी। हम अपनी जमीन और जंगल को खनन के लिए छीने जाने और नष्ट किए जाने पर जो सवाल उठाते हैं, उसका उनके पास कभी कोई जवाब नहीं होता। वे अब भी अपनी खनन गतिविधियों को फैलाए जा रहे हैं।
लौह अयस्क से लदी ट्रकों की सर्पीली कतारें जमशेदपुर और हल्दिया पोर्ट के लिए रवाना हो रही हैं जहां से वे सुदूर जगहों पर भेजा जाएगा। चइबासा में एक नौजवान महिला कार्यकर्ता सिस्टर कीटा कहती हैं:
हमारी जमीनों और साझा संसाधनों को जिस कदर लगातार लूटा जा रहा है, इस नाइंसाफी को दिखाने के लिए कम से कम एक रेल रोको अभियान जैसी कार्रवाई होनी चाहिए। सोचिए, एक ओर हमारे यहां की महिलाएं इतनी कमजोर हो गयी हैं, उनके शरीर में खून कम हो गया है और दूसरी तरफ यहां से लौह अयस्क भर-भर के रोज ट्रेनें रवाना हो रही हैं!
मध्य प्रदेश में पारधियों का उत्पीड़न
पारधी समुदाय उन 150 जनजातियों में एक है जिसे अनधिसूचित जनजाति (या डीएनटी, बंजारे) कहते हैं। ये मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़ से लेकर कर्नाटक तक पाये जाते हैं और हाशिये पर जीवन बसर करते हैं। भारत सरकार ने भले इन्हें अधिसूचित से हटाकर अनधिसूचित कर दिया हो लेकिन इनके लिए सरकार ने एक और कानून बना दिया जिसे हैबिचुअल ऑफेन्डर्स कानून कहते हैं। यानी पुलिस के लिए डीएनटी समुदाय ज़रायमपेशा हैं। इसीलिए जब कभी पुलिस को नियमित वसूली करनी होती है या किसी को बलि का बकरा बनाना होता है, पहले से ही कलंकित किए गए ये लोग आसान शिकार होते हैं। वन्यजीवन (संरक्षण) कानून 1972 और अन्य पर्यावरणीय कानूनों ने जहां इनके संरक्षित वनक्षेत्र में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी, वहीं इस समुदाय को बसाने के लिए कुछ भी नहीं किया गया।
नतीजतन, पारधी अब भी सामाजिक कल्याण योजनाओं से दूर हैं। 2017 में भोपाल की 30 वर्षीया इंदरमल बाई पारधी ने कथित तौर पर पुलिस उत्पीड़न और वसूली के चलते आत्मदाह कर लिया था। हिरासत में रखे जाने से लेकर पारधी औरतों के खिलाफ यौन हमलों और यहां तक कि मारपीट कर गांव से निकाल दिए जाने की घटनाएं आम हैं।

सरकार या निजी उद्योगपतियों द्वारा वन भूमि छीने जाने और बढ़ते औद्योगीकरण ने जंगल में रहने वालों को बड़े पैमाने पर विस्थापित किया है। इसके चलते वे अपने कुदरती रिहाइशों की परिधि पर सिमट गए हैं। शिक्षा, कौशल और रोजगार तक पहुंच के अभाव तथा भयंकर भेदभाव व गरीबी ने अपने नए रहवासों के सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक जीवन में इनकी भागीदारी को रोके रखा है।
1972 के वन कानून से पहले पारधी शिकार करते थे। उसी से वे भोजन करते और बेच कर कमाते भी थे। जैसा कि वे बताते हैं, ‘’अपनी आजीविका के लिए हम लोग बड़े जंगली जानवर मारते जबकि खाने के लिए चिडिया, जंगली भालू और खरगोश का शिकार करते थे।‘’ पारधी औरतें तमाम किस्म के काम करती थीं, जैसे मनिहार यानी कस्तूरी बेचना, जंगली बेर बेचना और पशुओं की खाल से बने आभूषण और मनके बेचना। कुछ औरतें खेती भी करती थीं, औषधीय पौधे और अन्य छिटपुट सामान बेचती थीं।
इनकी जिंदगी तब भी कठिन थी, लेकिन इनके इकलौते कौशल और पेशे को आपराधिक या जरायम ठहरा दिए जाने के बाद सब कुछ बदल गया। इससे इन्हें कलंकित किया गया, जिसने राज्य से लेकर पुलिस और समूचे समाज की नजरों में इनकी स्थिति को बहुत नाजुक बना दिया। इनके लिए राज्य केवल उत्पीड़न और वंचितीकरण का बायस है- राज्य का होना भी और गैर मौजूदगी भी।

राज्य और समाज इन समुदायों के संदर्भ में मिलकर काम करता है और इन्हें कलंकित करता है। साथ ही श्रम बाजार में किसी प्रतिद्वंद्विता को नियंत्रित करने में भी इनका इस्तेमाल करता है। इसका समुदाय के कई लोगों की जिंदगी पर असर पड़ा है। खासकर औरतों के मामले में उनके श्रम, संसाधनों तक उनकी पहुंच, अपनी देह पर स्वामित्व, रिश्तों और तकरीबन समूची जिंदगी के संदर्भ में वे प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुई हैं। रोजाना का राजकीय उत्पीड़न और समाज की घोर उपेक्षा ने पारधियों को एक बंद समुदाय में तब्दील कर के परस्पर और निकट ला दिया है। इसीलिए जब समुदाय के भीतर कोई सदस्य, युवा चाहे महिला, नियम कायदों को तोड़ती है तो उसके बदले में उसे अपनी जान तक गंवानी पड़ सकती है।
भोपाल के 221 परिवारों के बीच किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि केवल पांच परिवार ऐसे थे जिनका विस्थापन या पलायन का कोई इतिहास नहीं था। अपने घर और कभी कभार जमीन से उखड़ने के इनके कई कारण रहे हैं। इनमें आजीविका चलाने में आने वाली दिक्कत से लेकर रोजगार का न होना और जंगल तक बाधित पहुंच से लेकर भेदभावकारी व्यवहार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव व गुंडों से टकराव आदि कारण रहे हैं। एक बार वे गांव छोड़कर शहर आ जाते हैं तो शहरों में चलाए जाने वाले बेदखली अभियान के कारण ये लगातार विस्थापित होते रहते हैं। भोपाल के राजीव नगर में रहने वाली संगीता कहती हैं:
हम जब विस्थापित होकर किसी दूसरी जगह पर भेज दिए जाते हैं, तो आम तौर से वह जगह दलदली होती है जो रहने के लायक नहीं होती। हम लोग ही उसे रहने के काबिल बनाते हैं कि उसका भी रियल एस्टेट बाजार में एक भाव बन जाता है। एक बार जब चह जगह रहने लायक हो गयी तो हमें फिर से वैसी ही किसी दूसरी जगह फेंक दिया जाता है। सब कुछ नए सिरे से वहां करना पड़ता है जिसमें काफी मेहनत लगती है। कई दिन ऐसे होते हैं जब हम बाहर कूड़ा बीनने नहीं जा पाते और खाना नहीं पका पाते हैं।
एक बार पहचान जाहिर हो जाने पर शहर में रोजगार पाना मुश्किल हो जाता है क्योंकि आम धारणा यह है कि पारधी तो चोर होते हैं। काम पर वे आते हैं तो दरअसल डकैती के लिए टोह ले रहे होते हैं। शहर में कोई अपराध होता है तो पुलिस पारधी समुदाय के पुरुषों को ही निशाना बनाती है। अकसर आधी रात को पुलिस उनके घरों में जबरन घुसकर बिना वारंट लोगों को गिरफ्तार कर ले जाती है। उनकी औरतें आक्रोश भरे स्वर में बिना थके अपने आत्मसम्मान की धज्जियां उड़ाने वाली ऐसी दास्तानें सुनाती हैं।
पारधी कूड़ा बीन कर अपनी आजीविका चलाते हैं क्योंकि उनके मामले में राज्य अनुपस्थित रहता है। उनके ऊपर राज्य अपना कोई संसाधन खर्च नहीं करता, न ही उनकी शिक्षा का कोई प्रावधान करता है। इनका मुफ्त श्रम हालांकि स्थानीय नगरपालिकाओं के काम आता है, जिसे अन्यथा सरकारी खजाने का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता। इसके अलावा, राज्य को एक लाभदात्री इकाई के रूप में भी देखा जाता है जो पारधी औरतों को सड़क पर पड़ी चीजों तक पहुंचने की रियायत देता है। नगर निगम के कर्मचारियों की हड़ताल जैसे मौकों पर ये एक आरक्षित फौज की तरह देखे जाते हैं। इस तरह श्रम बाजार में पारधी दोयम दरजे के श्रम के वाहक या श्रम के दायेम वाहक के रूप में उभरते हैं।
पारधी परिवारों में घरेलू हिंसा एक आम बात है। कोई भी समुदाय जो व्यवस्थागत उपेक्षा और नफ़रत का शिकार रहा हो, वह आंतरिक टकरावों में उसे प्रतिबिंबित करता है। अकसर इन परिवारों में हत्या से लेकर आत्मघात तक की घटनाएं सामने आती हैं। पारधी आम तौर से अपने ही समुदाय के भीतर झगड़ते हैं और चोट पहुंचाते हैं न कि उनको, जो उन पर अत्याचार करते हों, जैसे पुलिस या राज्य का कोई भी अंग।
इनकी जाति पंचायतों का समुदाय के लोगों की जिंदगी पर तकरीबन पूर्ण नियंत्रण होता है। इसमें शादियां भी शामिल हैं। इस तरह समूचा समुदाय स्वायत्तता से वंचित रहता है। समाज में इनके खिलाफ माहौल के चलते चूंकि कोई विकल्प नहीं है, तो पारधी औरतों को इसी के मुताबिक जीवन जीना पड़ता है। कभी ही ऐसा होता हो कि वे जाति पंचायत की अवहेलना करती हैं, वैसे में उसके गंभीर परिणाम भी होते हैं और अपने परिवार सहित जानने वालों तक उनकी पहुंच रोक दी जा सकती है।
लोकतंत्र में हिस्सेदारी और आज़ादी के अनुभव: घुमंतू और विमुक्त जन का संदर्भ
घरों की रीढ़ होने के बावजूद उनके श्रम पर घर के पुरुषों का नियंत्रण होता है, चाहे वह मुफ्त श्रम हो या उसके बदले पैसे आते हों। पहले कूड़ा बीनने के काम में कहीं कहीं पुरुष मदद करते थे लेकिन अब नगरपालिका के चलते कूड़ा ही कम रह गया है। इसके अलावा कृषि संकट के चलते ग्रामीण इलाकों से लगातार शहर आ रही आबादी जीने के लिए आखिरी काम के तौर पर कूड़ा छांटना-बीनना ही चुनती है। इसीलिए पारधी औरतें ही अब भी कूड़ा बीनने का काम करती हैं। यही इकलौता टिकाऊ काम है जो परिवार का पेट भर सकता है।
यहां लैंगिक भूमिकाएं इसी हिसाब से बदलती हैं कि वे पितृसत्ता को कहां तक फायदा पहुंचा रही हैं। कुछ पारधी औरतें बेशक हैं जिन्होंने पुरुषों की गुलामी से इनकार किया है। कुछ औरतों ने समुदाय से बाहर विवाह किया। उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी है। समुदाय के भीतर महिला होने के चलते होने वाले उत्पीड़न और शोषण से पार जाने का संघर्ष समाज और राज्य की निगाह में जरायमपेशा होने और हाशिये पर जीने के कारण और विकट होता जाता है।
निष्कर्ष के तौर पर कह सकते हैं कि दोहनकारी पूंजीवाद विभिन्न संदर्भों, समुदायों और परिदृश्यों में अपनी दो प्रक्रियाओं संग्रहण और विनियोजन के रास्ते वर्ग, जाति, जातीयता और लैंगिकता के साथ टकराता है तथा उनकी दरारों को और चौड़ा करता है। इसके बावजूद महिलाएं पूंजी, राज्य और पितृसत्ता की उन ताकतों के खिलाफ प्रतिरोध रच रही हैं जो स्वायत्त और संयुक्त होकर उनके श्रम और आवाजाही को तमाम तरीकों से नियंत्रित करने की कोशिश में हैं ताकि उन पर अपनी सत्ता कायम की जा सके। पूंजी के विस्तार के खिलाफ़ उभरते इन संघर्षों में हाशिये के समुदायों से आने वाली महिलाएं सामाजिक बदलाव और प्रतिरोध की नयी इबारत लिख रही हैं।

सुजाता गोठोस्कर मुंबई स्थित नारीवादी कार्यकर्ता और शोधकर्ता हैं जो कई दशक से महिला आंदोलन और श्रमिक आंदोलन में सक्रिय हैं।

रंजना पाढ़ी भुवनेश्वर स्थित नारीवादी कार्यकर्ता और लेखक हैं। इनकी लिखी किताब है दोज़ हू डिड नॉट डाइ: इम्पैक्ट ऑफ द एग्रेरियन क्राइसिस ऑन विमेन इन पंजाब (सेज, 2012) और वे रेजिस्टिंग डिस्पॉजेशन: द ओडिशा स्टोरी (पालग्रेव मैकमिलन, 2020) की सह-लेखिका हैं।
यह लेख समयान्तर मासिक के दिसम्बर, 2020 अंक में प्रकाशित है। मूल अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद अभिषेक श्रीवास्तव ने किया है