आज के तकनीकी युग में भी किताबों का महत्त्व कम क्यों नहीं हुआ है…


पुस्तकें विचारों व भावनाओं का मुकम्मल दस्तावेज होती हैं। पुस्तकें केवल मनोरंजन या समय बिताने का साधन नहीं हैं, बल्कि वे मनुष्य के बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक विकास की आधारशिला हैं। पढ़ने की प्रक्रिया व्यक्ति को सीमित अनुभवों की दुनिया से निकालकर व्यापक सामाजिक यथार्थ से जोड़ती है। जब मनुष्य पुस्तकों के माध्यम से विभिन्न विचारों, संस्कृतियों, संघर्षों और संभावनाओं से परिचित होता है, तब उसका दृष्टिकोण अधिक परिपक्व और संवेदनशील बनता है। यही संवेदनशीलता सामाजिक बदलाव की पहली शर्त है।

पुस्तकें हमें प्रश्न करना सिखाती हैं। समाज में व्याप्त रूढ़ियों, अन्याय, असमानता और शोषण को समझने के लिए आलोचनात्मक दृष्टि आवश्यक होती है और यह दृष्टि पढ़ने से विकसित होती है। इतिहास, समाजशास्त्र, साहित्य और दर्शन की पुस्तकें यह स्पष्ट करती हैं कि समाज स्थिर नहीं होता, बल्कि निरंतर परिवर्तनशील होता है। जब पाठक यह जानता है कि अतीत में किन विचारों और आंदोलनों ने समाज को बदला, तो वह वर्तमान की समस्याओं को भी नए सिरे से समझने लगता है।

साहित्य विशेष रूप से सामाजिक बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कहानी, उपन्यास, कविता और नाटक के माध्यम से लेखक समाज के हाशिये पर खड़े लोगों की पीड़ा, संघर्ष और आकांक्षाओं को स्वर देते हैं। प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ ‘रेणु’, महाश्वेता देवी, जैसे रचनाकारों की कृतियाँ केवल साहित्य नहीं हैं, बल्कि सामाजिक चेतना का दस्तावेज हैं। इन्हें पढ़कर पाठक केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व भी महसूस करता है।



पुस्तकें लोकतांत्रिक चेतना को भी मजबूत करती हैं। वास्तव में पढ़ा-लिखा समाज ही सवाल पूछ सकता है, तर्क कर सकता है और सत्ता को जवाबदेह बना सकता है। जब नागरिक पढ़ने की आदत विकसित करते हैं, तब वे अफवाह, अंधविश्वास और संकीर्णता से ऊपर उठकर विवेकपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम होते हैं। यह प्रक्रिया समाज को अधिक न्यायपूर्ण और समावेशी बनाने में सहायक होती है।

पुस्तकें पढ़ना और तर्कवादी होकर वैज्ञानिक ढंग से बात करना— ये दोनों प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं और आधुनिक, प्रगतिशील समाज की बुनियाद बनाती हैं। जहाँ पुस्तकें मनुष्य के विचार-जगत को विस्तृत करती हैं, वहीं तर्कवाद और वैज्ञानिक दृष्टि उन विचारों को विवेक, प्रमाण और तर्क की कसौटी पर कसने का साहस देती है। सामाजिक बदलाव की जो भूमिका पुस्तकों की है, वही भूमिका तर्कवादी चेतना की भी है। दोनों मिलकर अंधविश्वास, रूढ़ि और अवैज्ञानिक सोच को चुनौती देते हैं।

पुस्तकें हमें केवल सूचनाएँ नहीं देतीं, बल्कि सोचने की पद्धति सिखाती हैं। इतिहास, दर्शन, विज्ञान और साहित्य की पुस्तकों के माध्यम से पाठक यह समझ पाता है कि हर विचार प्रश्नों, प्रयोगों और बहसों से विकसित हुआ है। जब व्यक्ति पढ़ता है, तो वह यह सीखता है कि किसी भी बात को आँख मूँदकर स्वीकार करना आवश्यक नहीं है। यही पढ़ने की आदत धीरे-धीरे तर्कवादी दृष्टि को जन्म देती है, जहाँ “क्यों” और “कैसे” जैसे प्रश्न केंद्रीय हो जाते हैं।

तर्कवाद का अर्थ केवल विरोध करना नहीं, बल्कि प्रमाण, अनुभव और विवेक के आधार पर बात करना है। वैज्ञानिक सोच यह मानती है कि सत्य स्थिर नहीं होता, बल्कि नए तथ्यों और खोजों के साथ विकसित होता है। पुस्तकें इस सोच को मजबूत करती हैं क्योंकि वे हमें वैज्ञानिक खोजों, सामाजिक आंदोलनों और वैचारिक संघर्षों का इतिहास बताती हैं। डॉ. आंबेडकर, नेहरू, भगत सिंह, जैसे विचारकों की रचनाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि पढ़ना और तर्क करना सामाजिक अन्याय के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार है। भारतीय समाज के संदर्भ में पुस्तकें और वैज्ञानिक दृष्टि विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यहाँ लंबे समय तक अंधविश्वास, जाति-आधारित भेदभाव और रूढ़ परंपराएँ हावी रही हैं। जब व्यक्ति पढ़ता है और तर्क के आधार पर बात करना सीखता है, तब वह किसी चमत्कार, अफवाह या धार्मिक भय के बजाय कारण और परिणाम को समझने की कोशिश करता है। यही सोच समाज को अधिक लोकतांत्रिक, न्यायपूर्ण और मानवीय बनाती है।


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दूसरी ओर स्त्रियों, वंचित समुदायों, के लिए पुस्तकें केवल ज्ञान का साधन नहीं, बल्कि मुक्ति, आत्मसम्मान और सामाजिक परिवर्तन का औजार हैं। जिस समाज में संसाधन, सत्ता और अवसर कुछ वर्गों तक सीमित रहे हों, वहाँ पुस्तकों का महत्व और भी बढ़ जाता है। पढ़ना वंचित व्यक्ति को न सिर्फ़ जानकारी देता है, बल्कि उसे अपनी स्थिति को समझने, प्रश्न करने और बदलने की शक्ति भी देता है। वंचित समुदाय अक्सर इतिहास और मुख्यधारा के विमर्श से बाहर रखे गए हैं। पुस्तकें उन्हें अपना इतिहास जानने का अवसर देती हैं— यह समझने का कि उनके साथ क्या हुआ, क्यों हुआ और इसका प्रतिरोध कैसे किया गया। डॉ. आंबेडकर, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, पंडिता रमाबाई, तारा शिंदे, पेरियार, बिरसा मुंडा जैसे विचारकों की रचनाएँ वंचित समुदायों के लिए आत्मबोध की किताबें हैं। ये पुस्तकें यह विश्वास पैदा करती हैं कि गरीबी, जाति या हाशिये की पहचान किसी व्यक्ति की क्षमता का पैमाना नहीं है।

पुस्तकें चेतना का निर्माण करती हैं। जब कोई व्यक्ति पढ़ता है, तो वह अपने जीवन को केवल व्यक्तिगत संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक संरचना के हिस्से के रूप में देखने लगता है। इससे आत्मग्लानि की जगह सामाजिक समझ और सामूहिक संघर्ष की भावना पैदा होती है। यही चेतना वंचित समुदायों को संगठित होने, अपने अधिकारों की बात करने और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करती है। शिक्षा और पुस्तकों का संबंध वंचित समुदायों के लिए जीवन बदलने वाला होता है। पुस्तकों के माध्यम से विकसित तर्कवादी और वैज्ञानिक सोच अंधविश्वास, डर और परंपरागत दबावों को तोड़ती है जिनका उपयोग अक्सर वंचना को बनाए रखने के लिए किया जाता है। पढ़ा-लिखा व्यक्ति सवाल करता है, प्रमाण मांगता है और सत्ता को चुनौती देने का साहस जुटाता है।

आज के डिजिटल युग में भी पुस्तकों का महत्व कम नहीं हुआ है। चाहे कागज की किताब हो या ई-पुस्तक, पढ़ने की आदत व्यक्ति को भीतर से समृद्ध करती है। सामाजिक बदलाव किसी एक दिन में नहीं आता। यह चेतना, विचार और संवाद की लंबी प्रक्रिया का परिणाम होता है और इस प्रक्रिया की सबसे सशक्त माध्यम पुस्तकें ही हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि पुस्तकें पढ़ना केवल व्यक्तिगत विकास के लिए नहीं, बल्कि एक जागरूक, संवेदनशील और परिवर्तनशील समाज के निर्माण के लिए अनिवार्य है।

पुस्तकें संतुलन का काम करती हैं— वे गहराई, संदर्भ और आलोचनात्मक दृष्टि देती हैं। इस प्रकार, पुस्तकें पढ़ना और तर्कवादी होकर वैज्ञानिक बात करना केवल व्यक्तिगत बौद्धिक विकास का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और बदलाव की अनिवार्य शर्त है। एक ऐसा समाज, जो पढ़ता है और तर्क करता है, वही समाज सचमुच आगे बढ़ता है।


[डॉ. अनीश कुमार गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़ के हिन्दी विभाग में अध्यापन करते हैं। जनसंदेश टाइम्स, सुबह सबेरे, जनवाणी, युवा शक्ति, अचूक संघर्ष समेत कई अखबारों में लगातार लेखन कार्य। इसके साथ विभिन्न ऑनलाइन पोर्टल जैसे SSRN, यूथ की आवाज, जनपथ, दलित दस्तक आदि पर भी विभिन्न लेख प्रकाशित। इसके साथ ‘द पर्सपेक्टिव अंतर्राष्ट्रीय जर्नल’ तथा हिन्दी विभाग, गुरु घासीदास (केंद्रीय) विश्वविद्यालय, बिलासपुर की संस्थागत त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका ‘स्वनिम’ के सह-संपादक का निर्वहन। ईमेल: anishaditya52@gmail.com]


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