आप यहूदियों से कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वे गोएबल्स की मौत का शोक मनाएं?

2019 के लोकसभा चुनाव के बाद दंगल के ‘मुस्लिम-मुक्त भारत’ जैसे शो से प्रभावित होकर तुम्हारा पड़ोसी जो तुम्हारे हर सुख दुःख में साथ रहा हो और तुम उसके सुख दुःख में साथ रहे हो, अचानक एक दिन आकर तुम्हारे सामने तुम्हारे पिता जी से कहे कि मुझे तुम्हारा घर पसन्द है, जाते वक्त (पाकिस्तान) मुझे देकर जाना। ये सुनकर आप पर क्या गुजरेगी?

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असली देशभक्ति क्या है? महामारी के संदर्भ में स्वामी विवेकानंद की याद

स्वामी जी द्वारा तय किये गये देशभक्ति के पैमाने पर उन पर दावे करने वाली और उनके नाम की माला जपने वाली संस्थाएं कहां खड़ी नजर आती हैं?

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आम की डाल पर बैठकर बोलने वाली घुघुती और मजदूर दिवस

रोजगार की तलाश में शहरों की ओर गये मजदूर महामारी के डर से, लॉकडाउन से, शहरों की कठिनाइयों से वापस अपने घरों की ओर लौटने को मजबूर हो रहे हैं। यह दुख ऐसा है कि शायद हमारे लोकगीतों में भी न समा पाये।

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कोरोना की दूसरी लहर ने स्वास्थ्य तंत्र की पोल खोल के सिस्टम को नंगा कर दिया है

श की राजधानी दिल्ली की स्थिति और भी भयावह है, जो लगातार बद से बदतर होती जा रही है। दिल्ली के अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी से लोग छटपटा कर दम तोड़ रहे हैं। मरीज एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक ऑक्सीजन के साथ एक अदद बेड की तलाश में भटक रहे हैं।

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विफल राज्य, मजदूरों के पलायन और तबाही के बीच 150 साल के लेनिन को याद करने के संदर्भ

लेनिन को याद करने का अर्थ सिर्फ मजदूर क्रांति के सपने को साकार करना नहीं है। अपने समाज को समझने का रास्ता भी है। राज्य की प्रकृति समझना है तो लेनिन को जरूर पढ़िए।

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वापस लौटने के लिए गांव ही न बचे तो?

गांव का शोषण, बदहाली और उपेक्षा यूं ही बदस्तूर जारी रहा तो क्या वह दिन दूर है जब हम दिल्ली, मुंबई के प्रवासी बन कर जीवन बिताने को मजबूर लोग वापस गांव की ओर लौटना चाहें और कहीं कोई गांव ही ना बचा हो तो?

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जिनवर: गृह युद्ध से जूझते सीरिया में खिलता स्त्रीवादी युटोपिया का एक फूल

सुनने में ये जगह एक फेमिनिस्ट यूटोपिया की तरह लगती है लेकिन पितृसत्ता की धुरी के सहारे चलने वाली इस दुनिया में ऐसी एक जगह है जहाँ एक गाँव उसी सपने को लेकर जी रहा है जिसके ख़्वाब दुनिया भर की ना जाने कितनी औरतों की आँखों में हैं।

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डर लगता है कि मेरा वैचारिक बदलाव आपको पसंद नहीं आएगा: शिक्षक के नाम एक विद्यार्थी का पत्र

मेरी भी इच्छा थी कि यदि मैं लिख दूंगा तो यह बातें आप तक भी पहुंच जायेंगी। सर, मेरी इच्छा रहती है कि मैं आपको अपना लिखा हुआ पढ़कर सुनाऊं और आप कहें कि ”तुम्हारी चिट्ठी सुनने का सुख मिला।”

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फागुन में गाली के रंग अनेक…

जैसे बोली से पता चलता है कि इंसान सभ्य है या असभ्य, पढ़ा-लिखा है अनपढ़। यह वर्गीय विभाजन गाली में भी है। पढ़ा लिखा शुद्ध भाषा में गाली देगा जबकि बिना पढ़ा-लिखा बेचारा ठेठ देशज अंदाज में गाली देता है।

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प्रधानी का चुनाव और चौराहे की चाय

हमारे पड़ोस की ग्रामसभा में पिछली दो बार महिला प्रधान थीं लेकिन चुनाव प्रचार से लेकर सारे काम पति महोदय ने किया और एक साल तक तो अधिकारियों को भी नहीं पता था कि फ़लाँ प्रधान नहीं बल्कि प्रधान पति हैं। और गाँववाले तो आज तक ‘पति’ को प्रधान समझते हैं।

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