व्‍यालोक का नया ‘मौन’


चांद है टूटा हुआ या,

कि उफ़क़ पर माहताबी…

रात है सर ओढ़ कर चुपके

दुलाई में समाई…

टिमटिमाते हैं ये तारे…

हर तरफ है मौन छाया…

चल रहा चुपचाप मैं बस…

हमनफ़स कोई न आया…

एक टूटा सा हुआ पुल…एक मद्धम सा चुका सुर…

एक ट्रक दोनों तरफ है, एक कुछ बीता हुआ है…

मैं खड़ा हूं बीच धारे, जाऊं तो जाऊं कहां मैं…

याद आती है कहानी, मां मुझे जो थी सुनाती….

लोरियों के बीच थपकी, दे मुझे जो थी सुलाती….

वह कहानी भूल कर भी, मां मुझे है याद आती…

अब हूं इतनी दूर आया, मैं नहीं हूं लौट सकता,

मां मुझे वापस बुला ले, मैं तेरी गोदी में आया…..

रात का गहरा है साया, हर तरफ सन्नाटा छाया,

है कहीं कोई न चिड़िया, ना कोई आदम है पाया…

मैं अकेले पुल पै बैठा, देखता हूं रात को बस…
चीखती लहरों को बैठा ताकता मैं मौन हूं बस…

मौन है अंदर से उपजा…

मौन मेरे उर में पैठा….

क्या इसे मैं नाम भी दूं……

नाम ही जब मौन इसका……

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