कोरोना संकट की आड़ में उपेक्षित अन्य गंभीर रोग


कोरोना वायरस संक्रमण के थमने की फिलहाल तो कोई सम्भावना नहीं लगती। यदि मान लें कि कुछ समय के लिए संक्रमण के मामले प्रकाश में नहीं आ पाये तो भी इससे निश्चित नहीं हुआ जा सकता। कोरोना वायरस पर अब तक के शोध बता रहे हैं कि इस संक्रमण के फैलने के कारणों को लेकर जो जानकारी उपलब्ध हो सकी है उसके अनुसार लम्बे समय तक इस वायरस के डर से मुक्त नहीं हुआ जा सकेगा। इसके अलावा स्पष्ट लक्षणों का अभाव, सुषुप्त संक्रमण का रहस्य, संक्रमण के जांच उपकरणों की विश्वसनीयता का अभाव, जांच की महंगी कीमत, जांच की सहज अनुपलब्धता आदि ऐसे कई पहलू हैं जिससे इस संक्रमण के नियंत्रण, बचाव और उपचार पर अब तक प्रश्नचिह्न ही हैं।

कोरोना वायरस संक्रमण को लेकर वैश्विक स्तर पर शुरू से ही सन्देह के कई बिन्दु हैं। जैसे संक्रमण का उद्भव प्राकृतिक है या कृत्रिम? संक्रमण का प्रसार सांस, म्यूकस के जरिये होता है या वायुमार्ग से? संक्रमण के बाद लक्षण स्पष्ट होने में दो हफ्ते लगते हैं या ज्यादा? सब अब भी प्रश्नवाचक चिन्ह के साथ ही हैं, इसलिए कोरोना वायरस संक्रमण के साथ सावधानी और बचाव का पूरा ध्यान रखना ही उचित है।

कोरोना वायरस संक्रमण पूरी दुनिया के लिए एकदम नई चुनौती है इसलिए इसकी स्पष्टता तक बाकी स्वास्थ्य समस्याओं को लम्बे समय तक नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। भारत ही नहीं पूरी दुनिया की स्वास्थ्य समस्याओं पर गौर करें तो कई ऐसे घातक रोग हैं जो रोजाना हजारों लोगों के मौत की वजह हैं। भारत के सन्दर्भ में यदि देखें तो यहां स्वास्थ्य की अन्य चुनौतियों में संचारी रोग, असंचारी रोग, प्रदूषण से पैदा होने वाले रोग, लचर स्वास्थ्य व्यवस्था के दुष्प्रभाव, जनसंख्या और कुपोषण आदि ऐसे अनेक गम्भीर व जटिल मसले हैं जिन्हें किसी भी तरह से यदि नियंत्रित नहीं किया गया तो रोजाना हजारों असमय मौतों को रोक पाना सम्भव नहीं होगा।

हमारे देश में जिन संचारी रोगों से पीड़ित लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है, उनमें मलेरिया से ग्रस्त होने वाले सालाना 20 लाख नये लोग, टयूबरक्लोसिस यानी तपेदिक से प्रभावित लोगों की संख्या सालाना 22 लाख, कैंसर से ग्रस्त होने वाले लोग लगभग 30 लाख, मधुमेह से पीड़ित 73 लाख (72.96) लोग, उच्च रक्तचाप से प्रभावित 2 करोड़ लोगों के साथ देश की करीब आधी आबादी किसी न किसी रूप में गम्भीर रोगों के खतरे में जी रही है।

कोरोना वायरस के इस खौफनाक मंजर ने वर्ष 2016 की विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की चेतावनी की याद दिला दी कि डेंगू, चिकनगुनिया, जीका जैसे रोग भारत के लिए ‘‘खामोश मौत’’ की तरह होंगे। ये उभरते संक्रामक रोग हैं जो हर साल और ताकतवर होकर आते रहेंगे। अकेले डेंगू से ही सालाना 39 करोड़ लोग (वैश्विक स्तर पर) संक्रमित होते हैं जिनमें से 9.6 करोड़ लोगों में रोग के लक्षण साफ तौर पर दिखायी देते हैं। ऐसे ही चिकनगुनिया भारत के अलावा 60 अन्य देशों की समस्या बन गया है। यह एक ऐसा रोग है जो संक्रमण के बाद या तो व्यक्ति की जान ले सकता है या उसे अपाहिज बना देता है। उल्लेखनीय है कि ये सभी मच्छरों के माध्यम से फैलने वाले रोग हैं और भारत सहित एशिया में मच्छरों का प्रकोप अगले कुछ वर्षों में और कई गुना बढ़ने वाला है।

अफ्रीका के बाद एशिया मच्छरों का सबसे बड़ा आशियाना है। विकास की सनक में स्मार्टहोते शहर और गांव, समाज और लोग, सब इन खतरनाक रोग फैलाने वाले मच्छरों के बढ़ने के लिए जिम्मेदार हैं। शोध पत्रिका नेचरका विश्लेषण कहता है कि अमीर होना समाज में जलवायु परिवर्तन के लिए ज्यादा जिम्मेदार है और जलवायु परिवर्तन मच्छरों के बढ़ने के लिए जिम्मेदार है। ऐसे में मच्छरजनित रोगों का बढ़ना लाजिमी है। एक और पहलू है बीमारियों के बढ़ने का, वह है वैश्विक तौर पर तापक्रम का बढ़ना। ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विम गर्मी) की वजह से मच्छरों की नयी और ज्यादा खतरनाक प्रजाति हर साल कहर बरपा रही है। इसलिए मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया, जीका रोगों में वृद्धि देखी जा रही है। धीरेधीरे ये वायरस अपने को ज्यादा ताकतवर बनाते जा रहे हैं। इन पर कोई टीका या दवा उतना कारगर भी नहीं है। स्थिति ऐसी है मर्ज बढ़ता ही गया ज्यों ज्यों दवा की। ऐसे में मच्छरों को मारने या मच्छरों से होने वाले रोगों की दवा या वैक्सिन बनाने से ज्यादा जरूरी है कि मच्छरों के पनपने की सम्भावनाओं को घटाया जाय या खत्म किया जाय। उसके लिए ताबड़तोड़ विकास के फार्मूले से हट कर मानवीय व प्रकृतिसम्मत विकास की सोच पर लौटना होगा और स्थायी व टिकाऊ विकास की नींव रखनी होगी। सुविधाओं को छोड़ना इतना आसान नहीं है लेकिन आपके पास कोई और चारा भी नहीं है।

इससे भी बड़ी समस्या, जिसकी अब तक कल्पना भी नहीं की जा सकी है, वो है कोरोना वायरस के संक्रमण का दूसरे रोगों के साथ कॉम्पलेक्स बना लेना। मसलन, इसे इस तरह समझें कि आपको मधुमेह है तो उसका असर आपकी आंख की रोशनी पर पड़ता है। अगर आपको उच्च रक्तचाप की शिकायत है तो मधुमेह के कारण यह और बढ़ सकती है। इस तरह किसी एक कारण से दूसरे कारण पैदा होते हैं या उत्प्रेरित हो जाते हैं और रोगों का एक जटिल तंत्र देह को घेर लेता है। कोरोना के बारे में शुरू से कहा जा रहा है कि यह मधुमेह और उच्च रक्तचाप वालों पर जल्दी असर करता है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता अगर कम है तो कोरोना का संक्रमण अंततः एकाधिक अंगों को खराब कर सकता है। इस तरह शरीर में वायरस का प्रवेश एक जटिल कॉम्पलेक्स निर्मित करता है रोगों का। इस ओर अब तक ध्यान भी नहीं दिया गया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लू.एच.ओ.) नारे तो बहुत अच्छा गढ़ लेता है लेकिन उसे जमीन पर उतारना एक कपोल कल्पना ही होती है। पिछले साल संगठन ने नारा दिया था ‘‘सबके लिए स्वास्थ्य-हर व्यक्ति हर जगह’’ (Universal Health Care : Everyone, Everytime) लेकिन आंकड़े बताते हैं कि तमाम संसाधनों के बावजूद लोगों का स्वास्थ्य दुनिया भर में अपवाद को छोड़कर किसी भी सरकार की प्राथमिकता सूची में नहीं है।

संक्रामक रोगों के बारे में हमें यह समझ लेना चाहिए कि यह सामुदायिक स्वास्थ्य का मामला है। विगत तीन दशकों में सामुदायिक स्वास्थ्य की उपेक्षा का दण्ड हर साल भारत को मिलता रहता है लेकिन सरकारों की सेहत पर इसका खास असर नहीं दिखा शायद इसलिए कि इससे मरने वालों में अधिकांश गरीब लोग ही रहे हैं। विगत वर्षों का आंकड़ा देख लें तो मच्छरजनित रोग, जलजनित रोग व अन्य संक्रामक रोगों से मरने वालों में 90 फीसद आर्थिक रूप से कमजोर लोग हैं। कैंसर, उच्च रक्तचाप और अवसाद से ग्रस्त लोगों की मौत के आंकड़े को आर्थिक आधार पर विभाजित करने से गरीबों की मौत का प्रतिशत 80 फीसद से ज्यादा आता है।

भारत में बढ़ती बीमारियों की चुनौतियों में बड़े पैमाने पर ‘‘पलायन’’ भी एक महत्वपूर्ण कारण है। वर्ष 2019 के आंकड़े के अनुसार अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आई.एल.ओ.) कहता है कि भारत में कोई 45-55 करोड़ लोग बेहतर अवसर की तलाश में अपना घर छोड़ कर कहीं शहर या दूसरे देश चले जाते हैं या आते-जाते रहते हैं। यह स्थिति महामारियों के फैलने की सबसे बड़ी वजह है। मौजूदा व्यवस्था में फिलहाल तो यह सम्भव नहीं लगता कि लोगों को अपनी मूल जगह से कहीं और जाने से रोका जा सके लेकिन बढ़ती महामारियों के दौर में हालात के बिगड़ने की यह एक बड़ी वजह है।

देश की वर्तमान अर्थव्यवस्था का मूल आधार ही विस्थापन है। रोजगार, श्रम, व्यवसाय, यातायात, उद्योग सबकी बुनियाद में विस्थापित लोग मजबूती से जुड़े हैं। ऐसे में किसी भी देश की किसी भी सरकार के लिए यह सम्भव नहीं है कि वह लोगों की आवाजाही पर रोक लगा सके। लोगों के एक शहर से दूसरे शहर तथा एक देश से दूसरे देश में जाने आने के कारण संक्रामक रोगों के फैलने की आशंका 90 फीसद से भी ज्यादा है। महामारियों ने वैश्विक यात्रा का आनन्द ले लिया है। पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था अब वैश्विक यातायात के बिना चल ही नहीं सकती। ऐसे में वैश्विक महामारियों को रोक पाना लगभग असम्भव सा है। कोरोना संक्रमण ने हमें यह भी सबक दे दिया है कि घातक वायरस संक्रमण का दौर शुरू हो चुका है और इसे किसी वैक्सिन या दवा से रोक पाना आसान नहीं है।

इसलिए सबक का मूल यह है कि हम इन वायरसों के साथ जीना सीख लें और अपने शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में लग जाएं। समझ रहे हैं न! प्रकृति से लड़ना बन्द करें। प्रकृति के साथ जीना सीख लें। कैसे? काफी हद तक वैसे ही, जैसे लॉकडाउनमें जी रहे हैं।


लेखक जन स्वास्थ्य वैज्ञानिक एवं राष्ट्रीय  पुरस्कार प्राप्त होमियोपैथिक चिकित्सक हैं। अगले हफ्ते से डॉ. ए.के. अरुण का जनपथ पर नियमित स्तम्भ शुरू हो रहा है। कोरोना पर ही स्तम्भाें की श्रृंखला में अगले हफ्ते  पढ़िये- "कोरोना वायरस संक्रमण में वैकल्पिक उपचार की सम्भावनाएं"!

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