फागुन में गाली के रंग अनेक…
जैसे बोली से पता चलता है कि इंसान सभ्य है या असभ्य, पढ़ा-लिखा है अनपढ़। यह वर्गीय विभाजन गाली में भी है। पढ़ा लिखा शुद्ध भाषा में गाली देगा जबकि बिना पढ़ा-लिखा बेचारा ठेठ देशज अंदाज में गाली देता है।
Read MoreJunputh
जैसे बोली से पता चलता है कि इंसान सभ्य है या असभ्य, पढ़ा-लिखा है अनपढ़। यह वर्गीय विभाजन गाली में भी है। पढ़ा लिखा शुद्ध भाषा में गाली देगा जबकि बिना पढ़ा-लिखा बेचारा ठेठ देशज अंदाज में गाली देता है।
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हमारे पड़ोस की ग्रामसभा में पिछली दो बार महिला प्रधान थीं लेकिन चुनाव प्रचार से लेकर सारे काम पति महोदय ने किया और एक साल तक तो अधिकारियों को भी नहीं पता था कि फ़लाँ प्रधान नहीं बल्कि प्रधान पति हैं। और गाँववाले तो आज तक ‘पति’ को प्रधान समझते हैं।
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‘लोगों के लिए’ होने की पहली शर्त है ‘लोगों के द्वारा’ होना। किसी भी संस्था को अपने स्वरूप में लोकतांत्रिक होने के लिए उसमें हर एक वर्ग, जाति, समुदाय की …
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ब्रिटिश साम्राज्यवाद तो भगत सिंह को न डरा पाया न हरा पाया किन्तु वैज्ञानिकता की बुनियाद पर टिके आधुनिक भारत के निर्माण की भगत सिंह की संकल्पना से एकदम विपरीत एक अतार्किक, अराजक और धर्मांध भारत बनाने कोशिशों का मुकाबला वे किस तरह करते इसकी तो कल्पना ही की जा सकती है।
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सागर सरहदी सिनेमा से जुड़े उन विरले लोगों में से हैं, जो घंटों किताबें पढ़ना पसंद करते थे. मुंबई के सराय कोलीबाड़ा इलाके में स्थित उनके घर में दीवारों के समानांतर आलमारियों में किताबें भरी पड़ी हैं. उन्हें देखकर ऐसा लगता था जैसे कोई पुरानी लाइब्रेरी के बीच रह रहा हो.
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यह पर्व सर्दी का अंत और हल्की-हल्की गर्मी का आगाज़ होता है, जब मौसम अधिक रोमांचित हो जाता है, जिस समय हर पहाड़ों पर नए-नए फूलों-पौधों का जन्म होते दिखता है। बुरांश और बासिंग के पीले, लाल, सफेद फूल और और इन्हीं फूलों की तरह बच्चों के खिले हुए चेहरे…
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आज की युवा पीढ़ी के दिमाग से इस घटना और इसके महत्व को बताने के लिए 91 साल पहले हुई उस ऐतिहासिक यात्रा के केंद्र पर उन स्मृतियों को सहेजने के लिए एक स्मारक बनाया गया है।
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इस मामले में क्षेत्रीय फिल्मों की स्थिति काफी अच्छी है। खासकर दक्षिण में तमिल, कन्नड़ और तेलुगु फिल्मों में किसानों के ऊपर फिल्में अब भी बन रही हैं। पिछले एक दशक में मराठी सिनेमा में भी इनकी संख्या बढ़ी है।
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दुनिया के अन्य विकसित देशों से इस आन्दोलन की मांगों, अधिकारों और न्याय के लिए समर्थन निरंतर मिल रहा है। भारत के अन्य राज्यों में महापंचायतों के विस्तार से जो जागरूकता समाज के विभिन्न वर्गों में उभर रही है वो न्याय व अधिकारों के संघर्ष के स्पष्ट संकेत हैं।
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वे अमूर्त से सैद्धान्तिक सवालों पर बहस नहीं करते थे। उनके विचारों का स्रोत कहीं बाहर-पुस्तकीय ज्ञान में न था, राजनीतिक हस्तक्षेप में उनका विश्वास बढ़ रहा था। उनके मन में एक आशा पनप रही थी। और जब ऐसा कुछ हुआ, तो रेणु अचानक सक्रिय हो गए।
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