कोरोना की तबाही से जागा बनारस, स्वास्थ्य-शिक्षा और आजीविका के मुद्दे पर जन अधिकार यात्रा
इस यात्रा से पहले बनारस से पहली बार स्वास्थ्य का अधिकार बनाए जाने की मांग उठी थी और उसके समर्थन में एक हस्ताक्षर अभियान चलाया गया था।
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इस यात्रा से पहले बनारस से पहली बार स्वास्थ्य का अधिकार बनाए जाने की मांग उठी थी और उसके समर्थन में एक हस्ताक्षर अभियान चलाया गया था।
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माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को भी ‘परीक्षा पर चर्चा’ जैसे खोखले प्रवचन से आगे बढ़कर छात्र समुदाय के हित में कुछ ज़रूरी कदम उठाने चाहिए जो असल में उनके काम आएं। सरकार को आगे आकर ‘देश के भविष्य’ को बचाने की सख़्त ज़रूरत है।
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जब वित्त मंत्री ने बजट का पिटारा खोला तो गरीब और मध्यम वर्ग के चेहरे पर मायूसी छा गई. सरकार ने ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के बजट से 45 फीसदी से ज्यादा कटौती कर ली है.
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इस बजट में अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय का बजट घटा दिया गया है। पिछले वर्ष 2020-21 का बजट 5029 करोड़ रूपये था जबकि इस वर्ष 2021-22 के लिए 4810.77 करोड़ रूपये प्रस्तावित किया है। पिछले साल से मुकाबले 218.23 करोड़ की कमी की गयी है।
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बजट में विगत वर्ष के कुल शिक्षा बजट 99312 करोड़ रुपये के मुक़ाबले सिर्फ 93224 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। यह पिछले आवंटन की तुलना में 6088 करोड़ रुपये कम है। ये अजीब बात है कि मौजूदा वित्तीय वर्ष 2021-22 में समग्र शिक्षा अभियान के लिए आवंटित बजट 31050 करोड़ है, जो 2019 -20 के वास्तविक व्यय 32376.52 करोड़ से भी कम है। अगर हम पिछले वर्ष 2020-21 में राष्ट्रीय शिक्षा मिशन (समग्र शिक्षा अभियान और शिक्षक प्रशिक्षण एवं वयस्क शिक्षा) के तहत आवंटन को देखें तो 38860 करोड़ के मुक़ाबले इस बार महज 31300 करोड़ ही आवंटित किए गए हैं।
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आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में विभिन्न पार्टियों के घोषणापत्र में राज्य में शिक्षा व्यवस्था की चिंताजनक स्थिति को बेहतर करने की दिशा में निम्नलिखित घोषणाओं को शामिल किए जाने की मांग
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विश्व स्वास्थ्य संगठन का वादा था- सन् 2000 तक सबको स्वास्थ्य, लेकिन स्थिति नहीं बदली। फिर सहस्राब्दि (मिलेनियम) विकास लक्ष्य 2015 तय हुआ। वह भी हवा-हवाई हो गया। अब टिकाऊ (सस्टेनेबल) विकास लक्ष्य 2030 तय हुआ है। समझा जा सकता है कि “जब रात है ऐसी मतवाली फिर सुबह का आलम क्या होगा”।
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भारत पर अपने राज को मजबूती देने के लिए अंग्रेजों ने सांप्रदायिक चश्मे से इतिहास का लेखन करवाया और आगे चलकर इतिहास का यही संस्करण सांप्रदायिक राजनीति की नींव बना और उसने मुसलमानों के बारे में मिथ्या धारणाओं को बल दिया.
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ये अभियान सरकार, मीडिया, सिविल सोसाइटी, स्कूल प्रबंधन समितियों और माता-पिता सहित अन्य हितधारकों को साथ लाते हुआ रणनीतिक तरीके से बच्चों की शिक्षा के मुद्दों को सामने लाएगा ताकि रेमेडियल कक्षाएं प्रभावी ढंग से संचालित हों और राज्य सरकारों द्वारा युद्ध स्तर पर अन्य बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए कदम उठाया जाए।
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अहमदाबाद, आरटीई फोरम, गुजरात, 9 जून, 2020 “आज गुजरात बोर्ड का 10वीं कक्षा के परिणाम घोषित हुए हैं जिसमें 60.64% विद्यार्थी ही उत्तीर्ण हो पाये हैं। गौरतलब है कि ये …
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