देश के पेट्रोल पंपों पर केवल डीजल, पेट्रोल या सीएनजी नहीं मिलता बल्कि 2014 के बाद देश में देश के लिए चलायी जा रही तमाम योजनाओं का वहां पर्याप्त विस्तार से ज़िक्र भी मिलता है। ये गुत्थी हालांकि अब तक कोई नहीं सुलझा सका कि पेट्रोल, डीजल बेचने वाले पंप को ‘पेट्रोल पंप’ ही क्यों कहा जाता है? डीजल पंप क्यों नहीं? क्या पेट्रोल का महंगा होना और उसकी इज्ज़त ज़्यादा होने की वजह से ऐसा रहा है? तब तो आज के बाद, जबकि दिल्ली में डीजल की कीमत पेट्रोल से ज़्यादा हो चुकी है, क्या अब इन्हें ‘डीजल पंप’ कहा जाने लगेगा?
कल ही एक पंप पर लगे एक पोस्टर पर निगाह गयी। देश के प्रधानमंत्री की तस्वीर के साथ लिखा हुआ है- ‘हर एक काम, देश के नाम’। ये पोस्टर का कंटेन्ट कौन बनाता है भाई? देश के प्रधानमंत्री द्वारा किया गया हर काम देश के ही नाम होगा न? कौन नहीं जानता कि देश का प्रधानमंत्री देश के लिए ही काम करता है। किसे इसमें संदेह है?

कोई सोच ही सकता है कि हो न हो, यह संदेह खुद देश के जनसंपर्क विभाग को है, शायद इसीलिए वो थाह लेता रहता है समय-समय पर कि लोगों को भी ऐसा लगने लगा है क्या कि देश में देश के लिए काम नहीं हो रहा है? तो चलो, इस पोस्टर से बताया जाये कि देश में हर काम देश के लिए, देश के नाम पर ही हो रहा है।
जनसंपर्क विभाग का संदेह नाजायज़ नहीं है। अब देखिए, हाल ही में चीन ने हमारे प्रधानमंत्री के काम को अपने नाम कर लिया। या कुछ समय पहले ‘नमस्ते ट्रम्प’ जैसा एक काम अमेरिका के नाम हो गया। लोग तो ये भी कह रहे हैं कि कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना देश के कम, चीन के ज़्यादा काम आएगा।
बहरहाल, ये बड़े मामले हैं और इस वक़्त जब देश में ‘भगवानों का नेता’ ही प्रधानमंत्री के रूप में विराजमान हो तो मामले अगम-अगोचर हो जाते हैं। आम इंसान की समझ से परे। कलाएं रचते भगवान आज तक अबूझ बने हुए हैं, तो उन जैसे तैंतीस कोटि भगवानों के नेता की लीला भला कौन जाने? फिर भी यह लिखने की ज़रूरत क्यों आन पड़ी?
दरअसल, मामला ये है कि देर-सबेर यह बात सामने आ ही जाती है कि अब दुनिया पूंजी की मुट्ठी में है। पूंजी जिनके पास है वो दुनिया को मुट्ठी में करने के लिए भांति-भांति के षड्यंत्र रचते रहते हैं। अब नोटबंदी को ही ले लो। पता चला कि ये तो भाई ‘बेटर दैन कैश एलायंस’ के लिए की गयी थी, जो एक ग्लोबल मामला है जिसका फायदा तमाम क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, ऑनलाइन पेमेंट गेटवे को मिलना था। इसमें मास्टर कार्ड, वीजा कार्ड और कौन-कौन तो नहीं है। ये चाहते थे कि नकदी का चलन बंद हो और सब इनकी सेवाएं लें, जिसके बदले में इन्हें तगड़ा कमीशन मिले। यह सूचना भी हालाँकि मार्केट में तब आ सकी जब हाथी सामने से पूरा का पूरा निकल गया। जितनों को तबाह होना था वो हो लिए, जितनों को काले से सफ़ेद करना था वे कर ले गये। जितनों को मरना था वो मर गये। देर से ही सही लेकिन साबित हुआ कि यह काम कम से कम देश के नाम तो नहीं था।
फिर जीएसटी आया। खुद चलकर नहीं, बल्कि लाया गया। आधी रात को संसद सजाकर। शहनाई बजाकर। किसके लिए? किसके नाम पर? ज़ाहिर है, देश के नाम पर। देश को क्या मिला? अर्थव्यवस्था की डुबकी! और ऐसी डुबकी जिससे उबरने को लेकर बहुत साल तक कुछ कहा नहीं जा सकता।
अब जो बीते सप्ताह कोयले की नीलामी हुई, वो देश के नाम पर किया गया एक और काम बताया गया लेकिन सबको पता चल गया कि विदेशी निवेश से व्यापार के लिए कोयले को नीलाम करना देश के काम नहीं आयेगा। हो गयी किरकिरी!
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राहत पैकेज का धारावाहिक पांच दिन चला। पूरे देश ने भक्तिभाव से देखा-सुना। एक मंत्री ने अंग्रेजी में बताया, एक ने हिन्दी में। सब कुछ देश के नाम किया गया लेकिन देश को कुछ नहीं मिला। सब मुंह बाये देखते रह गये। बीपीसीएल यानी भारत पेट्रोलियम कंपनी लिमिटेड, जिसके पेट्रोल पंपों पर ‘हर एक काम देश के नाम’ लिखा हुआ है उसे ही बेच दिया गया। किसके लिए? फिर बताया गया- देश के लिए, देश के नाम। अब तक देश की कंपनी विदेशों के काम आ रही थी क्या?
अब लोग तो यह भी कह रहे हैं कि पीएम केयर्स फण्ड के इए पैसा देश के लोगों से देश के नाम पर मांगा गया लेकिन देश के काम कैसे आयेगा ये पूछो तो भगवान रूठ जाते हैं। बुलेट ट्रेन जापान के काम ज़्यादा आएगी, देश के कम, ऐसा भी बहुत लोग मानते हैं। भव्य मंदिर में ये भगवान अपने ‘भक्त रूपी भगवान’ की मूर्ति रखेंगे, इसे भी देश के काम में गिन लिया गया लेकिन उससे देश को कुछ हासिल न हुआ बल्कि वो इनके ‘भगवान रूपी भक्त’ के काम आ गया।
और कितने काम गिनने हैं? पुलवामा में एक काम हुआ देश के नाम। फायदा किसे मिला? भगवानों के नेता को। देश को क्या मिला? फिर बालाकोट हुआ। ये भी देश के नाम हुआ लेकिन काम बना भगवानों के नेता का।
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लॉकडाउन हुआ। देश के नाम हुआ। ताल ठोक कर देश के नाम हुआ। देश बचाने के लिए हुआ। बचे-खुचे लोग जो नोटबंदी से बर्बाद न हो सके वो इस लॉकडाउन से बरवाद हो गये लेकिन देश को क्या मिला? आप नहीं जानते– देश को नया नाम मिला- आत्मनिर्भर भारत! संविधान में देश का नाम बदलने की जो पहल हुई वो असल में इंडिया के स्थान पर ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लिए थी। कोर्ट समझा नहीं। लोगों ने भी मज़ाक बना दिया।
सोचकर देखो- ‘आत्मनिर्भर भारत का गणराज्य’ (रिपब्लिक ऑफ आत्मनिर्भर भारत) सुनना कैसा लगेगा? अच्छा ही तो लगेगा! जो लोग लॉकडाउन की आलोचना करते हैं उन्हें इतिहास दंडित करेगा और जब लोग पीछे मुड़कर देखेंगे तो पाएंगे कि इस लॉकडाउन ने देश का नाम बदलने में महती भूमिका का निर्वहन किया है।
लब्बोलुआब यह है कि देश के नाम में देश की परिभाषा को स्पष्ट किया जाना चाहिए। या तो अब देश के नाम पर कोई काम हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री और भगवानों के नेता को नहीं करना चाहिए। देश को यह पसंद नहीं आ रहा है और पेट्रोल पंपों पर कुछ भी लिख देने का चलन तत्काल प्रभाव से बंद होना चाहिए। अच्छे पोस्टर्स देखना हम देशवासियों का मौलिक हक़ होना चाहिए और पोस्टर बनाते समय जनता की राय लेना चाहिए। पाठक का ज़ायका खराब करने की इस कु-संस्कृति की भर्त्सना की जानी चाहिए और पेट्रोल पंप को पेट्रोल पंप कहना भी चलन से बाहर होना चाहिए, इससे डीजल की भावनाएं आहत होती हैं! और तब जबकि डीजल, पेट्रोल से कीमती पदार्थ हो गया तब तो उसकी भावनाएं ज़रूर आहत होंगी।
पोस्टर बनाने वालों को भी यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि देश आदेश से नहीं बनते। इन्हें जनता बनाती है। देश के नाम पर आदेश भी नहीं दिये जा सकते। बाकी तो सब कुशल मंगल है।



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