दो बच्चियों के खोने और मिलने से उपजे कुछ विचार

शहर में रहने वाले हर नागरिक को मानवीय गरिमा के साथ अपनी रोजी-रोटी कमाने का अवसर मुहैया करवाना भी सरकार की ज़िम्मेदारी है। धर्मार्थ भोजन बाँटना, प्याऊ खोलना अच्छे काम हैं लेकिन ऐसी व्यवस्था कायम करना जहाँ किसी को भीख माँगने की आवश्यकता महसूस ही न हो, इससे बड़ा जनहित का काम कोई नहीं।

Read More

स्मृतिशेष: कमला भसीन और उनका स्त्री संसार

उन्होंने 1975 से अपना काम शुरू किया और तत्कालीन नारीवादी आंदोलन का एक अहम चेहरा बनकर उभरीं। उनके काम की सबसे सुंदर बात या उनके काम की विरासत उनके द्वारा लिखे गए गीत हैं। कमला भसीन ने महिला आंदोलन को पहले गीत दिए। कोई भी लड़की अगर महिला आंदोलन से जुड़ेगी, किसी मोर्चे पर जाएगी तो वह ये गाने ज़रूर गाएगी। इनमें से एक गीत ये है-

Read More

ये महापंचायत नहीं, समारोह है! किसानों के जुटान से हलकान एक विद्वान का ज्ञान

विद्वान प्रोफेसर इतिहास को परखने की उस विधि का इस्तेमाल नहीं करते दिखते जिसे उन्होंने खुद ही अनगिनत बार पढ़ा-पढ़ाया होगा। कोई दागिस्तानी लेखक-शायर जरूर इस लहजे में कहता कि अगर वीरान सर्द रात में एक अदद​ चिंगारी के मायने नहीं मालूम तो आप भारी भूल कर रहे हैं। और चिंगारी को भूसे के ढेर पर पटक देने से भी अच्छे नतीजे की उम्मीद करना नासमझी होगी, चिंगारी को सुलगाए रखना सबसे जरूरी है।

Read More

कैमरे के लेंस से क्यों गायब किए गए रोस्टर मूवमेंट के मूकनायक?

तमाम तरह के सवाल यह डॉक्युमेंट्री अपने पीछे छोड़ गयी। आज नहीं तो कल इसे बनाने वालों से अवश्य सवाल खड़े करेंगे कि क्या आरक्षण और रोस्टर की लड़ाई में उन नायकों को कैसे छोड़ दिया जो दशकों से लड़ाई लड़ते आ रहे हैं।

Read More

आलोचनात्मक नारीवाद: बदलाव के लिए एक औज़ार के रूप में शिक्षा का उपयोग

उन्होंने 1 लाख शिक्षकों और हाशिए पर पड़े समुदायों से जुड़े 50 लाख छात्रों को आलोचनात्‍मक नारीवाद पढ़ाया। फाउंडेशन ने शिक्षकों, छात्रों और माता-पिता-सभी हितधारकों को शामिल करके समाज की क्रूर पितृसत्तात्मक मानसिकता को बदलने की कोशिश में महत्वपूर्ण संवाद किए हैं।

Read More

पितृसत्ता से मुक्ति, आज़ादी और बराबरी के लिए स्कूली शिक्षण के नवीनतम प्रयोग

इस अध्यापन के तरीके ने लड़कियों को अपनी जिंदगी से सबक लेते हुए खुद के लिए खड़े होने की रणनीतियां विकसित करना सिखाया। यह उनके परीक्षा परिणामों दिखायी देता है जहां 88 प्रतिशत लड़कियों ने अपनी शिक्षा पूरी की है। यह राष्‍ट्रीय औसत से दोगुना आंकड़ा है।

Read More

आप न्यूज़ चैनल क्यों देखते हैं?

आप ये सोचिए कि क्या तमाम न्यूज़ चैनल देखने के बावजूद आपको ये बुनियादी जानकारी थी कि लॉकडाउन के दौरान क्या-क्या खुला रहेगा? ट्रेन कब चलेंगी? एक राज्य से दूसरे राज्य में आने-जाने के नियम क्या हैं? क्या ये बातें आपको न्यूज़ चैनलों के द्वारा बतायी गयी थीं या आपने बड़ी मुश्किलों से ये जानकारी खुद जुटायी और फिर भी कंफ्यूज़ रहे?

Read More

समाजशास्त्री गेल ओमवेट को याद करते हुए

सत्तर के दशक के आख़िर में उन्होंने कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी में सुनहरा अध्यापकीय जीवन छोड़कर भारत आने का चुनौतीपूर्ण निर्णय लिया। सामाजिक कार्यकर्ता भारत पाटणकर से विवाह कर वे महाराष्ट्र के एक गाँव में ही बस गयीं और वर्ष 1983 में उन्होंने भारत की नागरिकता भी ले ली।

Read More

काशी की सियासी तारीख के अहम किरदार और कम्युनिस्टों के गुरु कामरेड विशु दा

बनारस ही नहीं बल्कि वामपंथी दुनिया में उन्हें वैचारिकी का स्रोत समझा जाता था। एस.ए. डांगे, मोहित सेन, भूपेश गुप्त, इन्द्रजीत गुप्त, बी.डी.जोशी आदि के साथ पार्टी को मजबूत करने तथा जनांदोलनों की दशा और दिशा तय करने में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभायी। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन अधिकारी तो कामरेड विश्वेश्वर मुखर्जी को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।

Read More

‘मैं तुमसे और तुम्हीं से बात किया करता हूं’! कवि त्रिलोचन को याद करते हुए…

खुद को कितना बोलने देना है, इस मामले में असंयम बरतने वाले त्रिलोचन, कविता को कितना बोलने देना है, इस मामले में सदैव संयमी रहे। त्रिलोचन जी का वस्तुसत्य व माया और उनकी लंबी बतकही निश्चित ही उनके एक गंभीर नागरिक सोच का जीवंत प्रमाण है।

Read More