बीते साल का शोकगीत…
मार्च में पिछली पोस्ट से लेकर अब तक जनपथ सूना पड़ा रहा। इसकी एक नहीं, कई वजहें गिनाई जा सकती हैं। बहरहाल, साल बीतने को है और पिछले नौ महीनों …
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मार्च में पिछली पोस्ट से लेकर अब तक जनपथ सूना पड़ा रहा। इसकी एक नहीं, कई वजहें गिनाई जा सकती हैं। बहरहाल, साल बीतने को है और पिछले नौ महीनों …
Read Moreपिछले करीब एक महीने से जनपथ सूना पड़ा है। अच्छा नहीं लगता, लेकिन वक्त का तकाजा है। लंबा लिखने का वक्त नहीं और वक्त है भी तो मौसम खराब। ऐसे …
Read Moreहाल के दिनों में जिस तरीके से हमारे इर्द-गिर्द पत्रकारों पर हमले बढ़े हैं, उसने यह साफ कर दिया है कि अब हमारे शासकों को अपने ही संविधान में सुनिश्चित …
Read Moreपिछली बार भी लिखी थी अधूरी एक कविता… छूटे सिरे को पकड़ने की कोशिश की नहीं। आखें बंद कर- करता हूं जब भी कृत्रिम अंधेरे का साक्षात्कार मारती हैं किरचियां …
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हम पहले भी सुनते आए हैं कि किस तरह सत्यार्थी अपने दो-चार विश्वस्त पत्रकार गुर्गों के माध्यम से मीडिया को मैनेज करते रहे हैं, लेकिन पहली बार ऐसा उदाहरण सजीव प्रस्तुत है।
Read Moreतीन-चार खबरें जल्दी-जल्दी बतानी हैं, क्योंकि एक तो ब्लॉग अपडेट करने का वक्त नहीं मिलता, दूसरे हरेक खबर के बारे में लंबा नहीं लिखा जा सकता… सबसे पहले…जल्द से जल्द …
Read Moreदरअसल, पिछले दिनों हुए नया ज्ञानोदय विवाद पर एक पुस्तिका प्रकाशित हुई थी जिसका नाम रखा गया ‘युवा विरोध का नया वरक’। मैंने सोचा कि साल बीतते-बीतते इस पर एक …
Read Moreअभी पिछले ही दिनों 21 से 24 सितम्बर के बीच दिल्ली में एक महत्वपूर्ण आयोजन हुआ जिसे हम मीडिया की भाषा में ‘अंडर रिपोर्टेड’ की संज्ञा दे सकते हैं। जवाहरलाल …
Read Moreये पंक्तियां आलोक धन्वा की एक कविता की हैं…बरबस याद आ गईं। दरअसल, मैं दो दिनों पहले दिल्ली में आयोजित एक पुरस्कार समारोह के बारे में सोच रहा था। शहीद …
Read More(यह लेख कुछ ही दिनों पहले दैनिक भास्कर में प्रकाशित हो चुका है। चूंकि इस पर काफी प्रतिक्रियाएं आईं और किसी रूद्र वर्मा नाम के सज्जन ने इसे ए से …
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