सियासत की बिसात पर मोहरे की चाल और जनता बेहाल

सत्तापक्ष के इरादे साफ़ हैं- एकदलीय व्यवस्था, जिसकी ओर वह तेज़ी से अग्रसर है। बहुदलीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था का मज़ाक सत्तापक्ष के नेतृत्व ने सदन के भीतर और बाहर भी उड़ाया है। साथ ही साथ उन्होंने खुलकर एकदलीय व्यवस्था का एलान भी किया जिसकी आलोचना विपक्ष ने जतायी भी।

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क्या होता यदि फुले दम्पत्ति की मुलाकात मार्क्स से हुई होती?

आज फुले दम्पति होते तो वे अपने किसानों के साथ खड़े होते। वे ललकार रहे होते। उन्हें ‘गुलामगिरी’ से मुक्ति के पाठ पढ़ा रहे होते। उन्हें भीमा-कोरेगांव के किस्से सुना रहे होते।

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”टू मच डेमोक्रेसी” वाला वर्ष और अंत में रुकावट के लिए एक खेद!

टू मच डेमोक्रेसी में सवाल के हिसाब से जवाब नहीं दिये जाते बल्कि जवाब के हिसाब से सवाल किए जाते हैं। असल में टू मच डेमोक्रेसी में सरकारों का काम ही ये होता है और सरकारें इस काम को पूरी शिद्दत के साथ करती है। यहां तक कि विश्व महामारी में भी वो अपने इस एजेंडा से टस से मस नहीं होती।

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बिटवीन द लाइंस: सृजन और विध्वंस के बीच एक कलाकार की याद

अकादमी परिसर के बाहर आयोजित की गयी सभा के अंत में मुख्य अतिथि जस्टिस शास्त्री ने भावुक होकर नीता जी से अपने घरेलू रिश्तों और तमाम यादगार पलों को साझा किया और इसके बाद कला दीर्घा में प्रज्वलित कर चित्र प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। खास बात यह कि गैलरी में रजनीगंधा भी था। यह फूल नीता कुमार का पसंदीदा फूल था।

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तेजी से बढ़ रहा है किसान आंदोलन का राष्ट्रव्यापी आधार

पूरे देश की नज़र कल 30 दिसंबर को 2 बजे विज्ञान भवन में भारत सरकार और 40 किसान संगठनों के बीच बातचीत पर टिकी हुई है ।पहले भी 5 वार्ताएं …

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लंगुराही और पंचरुखिया: यहां के लोग नहीं जानते उनका मुख्यमंत्री कौन है!

रास्ते में हमें टाटा नमक और चिप्स के खाली पैकेट कहीं कहीं जरूर पड़े मिले जिसे देखकर मन में यही बात घूमने लगी कि इसे कॉरपोरेट का दम कहें या सरकार की नाकामी कि आज़ादी के इतने साल बाद भी जहां सार्वजनिक वितरण प्रणाली नहीं पहुंच पायी, बिजली नहीं पहुंच पायी, वहां जाने के रास्ते में चिप्स के पैकेट और नमक के पैकेट जरूर पहुंच गये।

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जातिवाद, ब्राह्मणवाद और साम्प्रदायिकता के खिलाफ सामाजिक न्याय का एक किसान-बहुजन योद्धा

चौधरी चरण सिंह को जनसामान्य ‘किसान मसीहा’ और भारत के पांचवें प्रधानमन्त्री के तौर पर तो जानता है लेकिन कुछ मामलों में उनके व्यक्तित्व को उनके मूल विचारों और कृतित्व से उलट ही जानता और समझता आया है।

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नागरिकों को ही ‘विपक्ष’ का विपक्षी बनाया जा रहा है!

सरकार ने अब अपने किसान संगठन भी खड़े कर लिए हैं। मतलब कुछ किसान अब दूसरे किसानों से अलग होंगे ! जैसे कि इस समय देश में अलग-अलग नागरिक तैयार किए जा रहे हैं। धर्म को परास्त करने के लिए धर्म और नागरिकों को परास्त करने के लिए नागरिकों का उपयोग किया जाता है।

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पंजाब के किसानों का संघर्ष और संभावनाएं: इतिहास के आईने में एक दृष्टि

उस समय इस संधि को लेकर देश में खासतौर से पंजाब में गंभीर बहस हुई थी। कप्तान अमरिन्दर सिंह ने उस समय इस संधि का खुलकर समर्थन किया था। विश्व व्यापार संगठन का समर्थन करते हुए उन्होंने पंजाब ट्रिब्यूनल में एक लेख लिखा था। अब कांग्रेस पार्टी इस तरह का दिखावा कर रही है कि वह इन जनविरोधी कानूनों के खिलाफ है।

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शहर में किसान यानी मिडिल क्लास की नापसंदगी का मौसम

टीवी इनके पसंदीदा हीरो को दिखाता है। कभी टीवी में दाढ़ी अच्छी लगती है तो कभी कपड़ा! बस रोड पर बैठे छात्र, किसान अच्छे नहीं लगते क्योंकि वही लोग तो इनको ऑफिस जाने में, अस्पताल जाने में, मॉल घूमने जाने में तंग करते हैं।

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