वह खिड़की जो भीतर की ओर खुलती थी : स्मृतिशेष विनोद कुमार शुक्ल
उनका लेखन किसी भी तरह के नाटकीय तंत्र या शैलीगत छल-कपट से दूर रहा। उनका लेखन समय की रेखाओं में धीरे-धीरे चलता था। उनके कथ्य में पात्रों का नाम होना या न होना, घटनाओं का बड़ा मोड़ होना या न होना, सब इसलिए था ताकि पाठक उस अंतराल में बैठकर खुद को सुन सके।
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