कंगूरे की चमकती ईंटों के दौर में नये-नवेले राम

जिस राम को तुलसीदास जानते थे, वाल्मीकि जानते थे, धीरे-धीरे वे राम नेपथ्य में चले गये। संघ और भाजपा ने अपने लिए एक नये राम का निर्माण किया। वे राम, जो फूलों से कोमल और ब्रज से भी कठोर थे उन्हें धीरे-धीरे केवल कठोर बनाया जाने लगा। राम की भुवनमोहिनी मुस्कान और कोमल काया तस्वीरों के साथ-साथ आम जन के अवचेतन से भी दूर की जाने लगी।

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दक्षिणावर्त: राम मंदिर बनने से कुछ नहीं बनने वाला, फिर भी बनने दीजिए!

अगर राम-मंदिर बन ही रहा है, तो भी समस्याएं रहेंगी, उनके साथ हमें जीना होगा, उनके निबटारे का प्रयास करना होगा, लेकिन देश में बहुसंख्यक आबादी के पुराने ज़ख्‍म पर मुकम्‍मल मरहम लगेगा और घाव दोबारा नहीं बहेगा।

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दक्षिणावर्त: न तो PM का अयोध्या दौरा सांप्रदायिक है, न ही सनातन के प्रतीकों पर हमला सेकुलरिज़्म

यहूदियों की भावना को आहत न करने के पीछे स्वास्तिक को नीचा दिखाने, उसे एक खूंरेज़ विचार के साथ दिखाने के पीछे की मंशा आखिर क्या है? अमेरिका में यहूदी लॉबी चूंकि बहुत ताकतवर है, इसलिए तो कहीं ऐसा नहीं हो रहा है?

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भगवान राम का भारतीय होना आरएसएस के लिए क्यों जरूरी है?

कंफ्यूजन की सबसे बड़ी वजह है कि कम्युनिस्ट ओली ने राम के अस्तित्व को खारिज नहीं बल्कि राम की सांस्कृतिक परंपरा को भारतीय हिंदुओं से झपटने की कोशिश की है.

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