तन मन जन: ‘स्वास्थ्य की गारंटी नहीं तो वोट नहीं’- एक आंदोलन ऐसा भी चले!


सबसे बड़े लोकतंत्र के नाम पर दुनिया में भारत की चर्चा खूब होती है। लगभग हर साल यहां चुनाव होते ही रहते हैं। राज्यों, पंचायतों, निगमों या फिर देश का आम चुनाव। यहां के लगभग सभी राजनीतिक दल झूठ के लॉलीपाप और जुमलों के सहारे चुनाव जीतने का तिकड़म जानते हैं और वो बारी-बारी से जीतते भी रहते हैं। चुनाव के पहले और फिर चुनाव के बाद नेताओं के व्यवहार और बयान को देख सुन लें तो अंतर आप समझ जाएंगे। बीते कई चुनावों से देखा जा रहा है कि देश की सीधी-साधी धर्मपारायण जनता को उग्र धर्मांध अन्धभक्त बनाया जा रहा है। ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर उन्हें उन्माद, नफरत और हिंसा में झोंका जा रहा है। थोथे राष्ट्रवाद के नाम पर उन्हें संविधान विरोधी बनाया जा रहा है। इन सबके बीच आम लोग अपने मूल सवाल शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार से लगभग काट दिए गए हैं। नतीजा सामने है कि देश बीमारियों के खौफनाक दौर में बदहाल स्वास्थ्य सेवा और कुशिक्षा का शिकार है।

इन दिनों चुनाव की हवा गर्म है। सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के तूफानी दौरे और उनके भाषणों, वायदों पर गौर करें- कहीं भी बीमारियों का खौफ़, बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की चिंता या बर्बाद प्राथमिक शिक्षा की चर्चा नहीं मिलेगी। यही मेरी चिंता है और इस लेख में यही प्रयास करूंगा कि बीमारियों के इस खौफ़नाक दौर में सामुदायिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने, लोगों को सुलभ स्वास्थ्य उपलब्ध कराने के यदा कदा किये गए दावे की पड़ताल की जाए और जनता को जागरूक बनाया जाए कि वह नेताओं/राजनतिक दलों को बाध्य करे कि वह नागरिक सवालों, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार आदि की अनदेखी न कर सके।

लगभग 100 साल के बाद फिर यह देश भयानक व जानलेवा महामारी का आतंक झेल रहा है। सन् 1918 में देश क्या लगभग पूरी दुनिया ने खतरनाक फ्लू (स्पैनिश फ्लू) का आतंक झेला था। ऐसे ही 2019-20 में पूरी दुनिया कोरोना वायरस संक्रमण नामक फ्लू का कहर झेल रही है। 1918 में करोड़ों लोग मरे थे। इस बार भी इस वायरल संक्रमण से लाखों जानें जा चुकी हैं। इसके अलावा लगभग प्रत्येक 10 साल में एक न एक नया रोग सामने आ जाता है। पूरी दुनिया में करोड़ों लोग किसी न किसी बीमारी की वजह से असमय मौत के मुंह में चले जाते हैं। जीवन के विभिन्न तत्व जैसे भोजन, पोषण, रहन-सहन आदि में गड़बड़ियों की वजह से उत्पन्न रोगों में विगत कुछ वर्षों में जो वृद्धि हुई है उससे समझा जा सकता है कि कई रोगों के लिए समाज, सरकार व सरकारी नीतियां जिम्मेवार हैं।

वर्तमान कोरोना संक्रमण की विश्वव्यापी घोषणा के बावजूद महज व्यक्तिगत व राजनीतिक लाभ के लिए मौजूदा सरकार ने हिदायत के बाद भी अंतरराष्ट्रीय आवाजाही को नियंत्रित नहीं किया। राजनीतिक उठापटक, सत्ता हस्तान्तरण, जनसभाएं आदि के बहाने लोगों की भीड़ कोरोना वायरस संक्रमण फैलाती रही, अचानक लॉकडाउन की घोषणा से करोड़ों लोगों के जीवनयापन का संकट पैदा हो गया। सरकार ने मेहनतकश मजदूरों को अपने हाल पर छोड़ दिया। ये सारी परिस्थितियां रोग बढ़ाती रहीं और आम लोग बेबस, असहाय अपनी जान देते रहे। इस बीमारी ने आम लोगों की जितनी मौतें दर्ज की उससे ज्यादा मौतें तो कुव्यवस्था और लापरवाही की वजह से हुईं। बेशर्म और गैरजिम्मेदार राजनीति ने बीमारी को त्वरित मौत में बदलने का मानो अभियान चला रखा था। बहरहाल, साल दर साल सरकारी नीतियों की वजह से समय असमय दम तोड़ते जीवन के हकीकत के बीच यह चर्चा ज्यादा जरूरी है कि जो राजनीति लोगों के जीवन संचालन के लिए की जा रही हो उसमें लोगों के स्वास्थ्य का सवाल प्रमुखता से शामिल क्यों नहीं है? विडम्बना ही है कि रोगों व कुपोषण की वजह से जिस देश में मृत्यु दर सबसे ज्यादा हो वहां सरकार छद्म मुद्दों की अफीम चटाकर लोगों से उनका वोट तो ले लेती है लेकिन उन्हें एक बेहतर जीवन की व्यवस्था नहीं दे पाती। यह संयोग नहीं, साजिश है।

भारत में स्वास्थ्य पर कुल व्यय अनुमानतः जीडीपी का 5.2 फीसदी है जबकि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय पर निवेश केवल 0.9 फीसदी है, जो गरीबों और जरूरतमंद लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिहाज से काफी दूर है जिनकी संख्या कुल आबादी का करीब तीन-चौथाई है। पंचवर्षीय योजनाओं ने निरंतर स्वास्थ्य को कम आवंटन किया है (कुल बजट के अनुपात के संदर्भ में)। सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट का बड़ा हिस्सा परिवार कल्याण पर खर्च होता है। भारत की 75 फीसदी आबादी गांवों में रहती है फिर भी कुल स्वास्थ्य बजट का केवल 10 फीसदी इस क्षेत्र को आवंटित है। उस पर भी ग्रामीण क्षेत्र में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा की मूल दिशा परिवार नियोजन और शिशु जीविका व सुरक्षित मातृत्व (सीएसएसएम) जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों की ओर मोड़ दी गई है जिन्हें स्वास्थ्य सेवाओं के मुकाबले कहीं ज्यादा कागज़ी लक्ष्यों के रूप में देखा जाता है। एक अध्ययन के अनुसार पीएचसी का 85 फीसदी बजट कर्मचारियों के वेतन में खर्च हो जाता है। नागरिकों को स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने में प्रतिबद्धता का अभाव स्वास्थ्य अधिरचना की अपर्याप्तता और वित्तीय नियोजन की कम दर में परिलक्षित होता है, साथ ही स्वास्थ्य संबंधी जनता की विभिन्न मांगों के प्रति गिरते हुए सहयोग में यह दिखता है। यह प्रक्रिया खासकर अस्सी के दशक से बाद शुरू हुई जब उदारीकरण और वैश्विक बाजारों के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था को खोले जाने का आरंभ हुआ। चिकित्सा सेवा और संचारी रोगों का नियंत्रण जनता की प्राथमिक मांगों और मौजूदा सामाजिक-आर्थिक हालात दोनों के ही मद्देनजर चिंता का अहम विषय है। कुल सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय के साथ इन दोनों उपक्षेत्रों में भी आवंटन लगातार घटता हुआ दिखा।

चिकित्सीय शोध के क्षेत्र में भी ऐसा ही रुझान दिखता है। कुल शोध अनुदानों का 20 फीसदी कैंसर पर अध्ययनों को दिया जाता है जो कि 1 फीसदी से भी कम मौतों के लिए जिम्मेदार है जबकि 20 फीसदी मौतों के लिए जिम्मेदार श्वास संबंधी रोगों पर शोध के लिए एक फीसदी से भी कम राशि आवंटित की जाती है।

भारत में जन स्वास्थ्य राजनीति का मुख्य एजेण्डा क्यों नहीं बन पाया? यह सवाल भी उतना ही पुराना है जितना कि देश में लोकतंत्र। आजादी के बाद से ही यदि पड़ताल करें तो लोगों के स्वास्थ्य और शिक्षा की मांग तो जबरदस्त रही लेकिन राजनीति ने लगभग हर बार इस मांग को खारिज किया। अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ तथा कई गैर सरकारी संगठनों ने अपने तरीके से जन स्वास्थ्य का सवाल उठाया, सरकारों ने महज नारों को स्वास्थ्य का माध्यम माना और संकल्प, दावे, घोषणाएं होती रहीं लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और है। कोरोना वायरस संक्रमण ने इस हकीकत को सामने लोकर खड़ा कर दिया। कुछ अपवादों को छोड़कर देश के प्राथमिक और जिलास्तरीय स्वास्थ्य का ढांचा न तो पर्याप्त है और न ही भरोसेमंद। हर सामान्य नागरिक कर्ज लेकर बीमारी से अपनी जान बचाने के लिए निजी अस्पताल और निजी चिकित्सकों के पास जाना चाहता है। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली की कहानी पर बीते तीन दशकों से मैं कलम चला रहा हूं मगर मुझे तो स्थिति में बदलाव के कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ रहे।

‘ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिज़ीज़’ अध्ययन में कहा गया है कि स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच और गुणवत्ता के मामले में वर्ष 1990 के बाद से भारत की स्थिति में सुधार देखे गए हैं, लेकिन विगत 2015 के बाद हालात ख़राब हुए हैं। वर्ष 2016 में स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच और गुणवत्ता के मामले में भारत को 41.2 अंक मिले हैं तो वर्ष 1990 में 24.7 अंक मिले थे। इसके अनुसार वर्ष 2016 में गोवा और केरल के सबसे अधिक अंक रहे। प्रत्येक को 60 से अधिक अंक मिले, जबकि असम और उत्तर प्रदेश को सबसे कम अंक मिले, दोनों के अंक 40 से कम रहे। भारत इस सूची में चीन(48), श्रीलंका(71), बांग्लादेश(133) और भूटान(134) से भी नीचे है, जबकि स्वास्थ्य सूची (हेल्थ इंडेक्स) में भारत का स्थान नेपाल(149), पाकिस्तान(154) और अफगानिस्तान(191) से बेहतर है। अध्ययन के अनुसार, तपेदिक(टीबी), दिल की बीमारी, पक्षाघात, टेस्टिक्युलर कैंसर, कोलोन कैंसर और किडनी की बीमारी से निपटने के मामलों में भारत का बेहद खराब प्रदर्शन है।

कोरोनाकाल में विभिन्न सरकारों की प्राथमिकताओं पर गौर करें। आपको हालात समझने में देर नहीं लगेगी। देश क्या दुनिया में लगभग सभी जगह झूठे व फरेबी नेताओं का शासन पर कब्जा है। सबसे शक्तिशाली देश के रूप में प्रचारित अमरीका को ही देखें तो महज प्रशासनिक विफलता की वजह से वहां कोरोना वायरस संक्रमण के मामले बेकाबू हुए। ब्रिटेन में भी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरियां सामने आ गईं। फ्रांस, इटली, जर्मनी आदि देशों से भी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की खामियां जगजाहिर हुईं। सबसे कम मृत्युदर वाला यह नया वायरस संक्रमण (कोविड-19) इतने बड़े पैमाने पर लोगों की मौत का परवाना कैसे बना? यह सवाल अब भी अनुत्तरित है।

भारत में स्थिति तो और भी नाजुक है। देश के अस्पतालों की दुर्दशा का ही परिणाम है कि आम लोग महंगी कीमत अदा कर भी अपने कोविड-19 संक्रमण के उपचार के लिए निजी अस्पतालों का ही रुख करना उचित समझा। अस्पतालों ने भी सरकारी दिशानिर्देशों की धज्जियां उड़ाते हुए एक एक मरीज से लगभग 10-15 लाख रुपए बटोरे। इस कोरोनाकाल में सरकारी बाबुओं और नेताओं ने भी करोड़ों लूटा। शायद इसे ही नेताओं ने ‘‘आपदा में अवसर’’ बताया। लोगों के जीवन से खिलवाड़ करती नकली पीपीई किट, दवाएं, मेडिकल उपकरणों की खरीद के नाम पर लूट की खबरें शायद जनता भूल चुकी होगी लेकिन सच है कि इस दौरान करोडों रुपए की लूट हुई। लोगों की सेहत बचाने के नाम पर किए गए लॉकडाउन से जनता तो त्रस्त रही लेकिन संकीर्ण मानसिकता की राजनीति ने अपना काम बखूबी किया। विधायकों की खरीद बिक्री, सत्ता परिवर्तन, अमेरि‍की राष्ट्रपति ट्रम्प का भारतीय दौरा और ‘‘नमस्ते ट्रम्प’’ जैसे कार्यक्रमों से स्पष्ट हो गया कि सत्ता की राजनीति की प्राथमिकता में जनता और जनता का स्वास्थ्य नहीं है।

अब आइए यह चर्चा कर लें कि स्वास्थ्य को लेकर देश की जनता क्या सोचती है और किसी भी लोकतांत्रिक देश में जनता के स्वास्थ्य के लिए क्या क्या किये जाने की जरूरत है। सरकारी घोषणा, वायदे और योजनाओं का हश्र है उससे सरकारी सोच और उनकी नीयत पर भरोसा करना मुश्किल है। फिर भी यदि हम जनता के स्वास्थ्य को महत्त्वपूर्ण मानते हैं तो राजनीतिक दल और राजनेता यह संकल्प लें कि देश के नागरिकों का इलाज और उनके सेहत की रक्षा सरकार की तयशुदा जिम्मेवारी मानी जाएगी। वैसे भी लोगों का स्वास्थ्य और उनकी बुनियादी शिक्षा भारतीय संविधान में लोगों के मौलिक अधिकारों में शामिल है। स्वास्थ्य और उपचार के क्षेत्र को सरकार यदि ‘‘आवश्यक जन सेवा’’ घोषित कर दे तब कहीं लोगों के इलाज और स्वास्थ्य लाभ की प्रक्रिया में सुधार हो सकता है। उपचार और दवा की कीमतें यदि आवश्यक सेवा अधिनियम के दायरे में डाल दी जाएं तो निजी चिकित्सक व अस्पताल भी मनमानी नहीं कर सकेंगे। स्वास्थ्य को सर्वसुलभ बनाने का संकल्प, घोषणा आदि सब होते हुए भी नियम के अभाव में देश में स्वास्थ्य संस्थाओं की सेहत अच्छी नहीं है। सेहत के क्षेत्र में भ्रष्टाचार को अघोषित सरकारी संरक्षण मिले होने की वजह से ही हालात बदल नहीं रहे। कुछ राज्यों में कुछ छोटी पार्टियों जैसे दिल्ली में आम आदमी पार्टी, केरल में वामपंथी सरकार आदि को छोड़ दें तो लगभग सभी राज्यों में सरकार भाजपा की हो या कांग्रेस की, चिकित्सा सेवा की स्थिति ऐसी ही है।

लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले दूसरे मामले जैसे भोजन, पोषण, पर्यावरण, सड़क मार्ग, शहरी ग्रामीण बड़ी फैक्ट्रियां, रसायन आदि कारक भी लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। जैसे, यदि कहीं रासायनिक फैक्ट्री लगी है तो उसके आसपास की आबादी स्वास्थ्य सम्बन्धी खतरों को जानलेवा स्तर तक झेलती है। भोपाल, चेर्नोबिल, हैदराबाद की औद्योगिक दुर्घटना को याद रखें। अब जैविक खतरे के रूप में वायरस और बैक्टीरिया भी जोड़ लें। बीमारी के नाम पर जेनेटिक इंजीनियरिंग से तैयार खाद्य, बीज आदि नए प्रकार की चुनौतियां हैं जिनसे लोगों को बचाना जरूरी है।

इन दिनों कई राज्यों में चुनावी सरगर्मी है। विभिन्न राजनीतिक दल चन्द पैसों का लालच देकर देश के भोले भाले मतदाताओं को लुभाने में लगे है। कांग्रेस पार्टी विगत कई वर्षों से जनता से कटी हुई है लेकिन उसका जो भी दमखम बचा है उसी के साथ वह जनता के सवालों के साथ जुड़ी भी है। जैसे किसान, नौजवान, बेरोजगारी, आपदा राहत आदि में यह राष्ट्रीय दल जनता के साथ खड़ा दिखा है। सत्ताधारी भाजपा और उसके सहयोगी दल कभी भी जनता के सवालों से जुड़े नहीं दिखे, मसलन कई जनविरोधी फैसले जैसे नोटबंदी, अचानक लॉकडाउन, बिना तैयारी के जीएसटी, कश्मीर और जम्मू का सवाल, कृषि कानून, अन्तरराष्ट्रीय सीमा विवाद, लगभग सभी मामले में भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने पूंजीपतियों के हितों का ध्यान रखा, न कि जनता का। स्वास्थ्य के मामले में भी भाजपा की नीति स्वास्थ्य गारन्टी वाली न होकर स्वास्थ्य बाजार वाली है। जैसे सीमित लोगों के लिए आयुष्मान योजना, आधे अधूरे मन से बाल पोषण योजना, का नतीजा ही है कि स्वास्थ्य संकेतक में कोई खास सुधार दिखा नहीं।

भारत साल दर साल गरीबी, कुपोषण और बीमारी के जाल में फंसता जा रहा है। आंकड़े देख लें, समझ जाएंगे। इसलिए अब मुझे लगता है कि स्वास्थ्य को जन आंदोलन बनाने की तत्काल जरूरत है। जनता स्वास्थ्य के अधिकार के साथ सामुदायिक, जिलास्तरीय, राज्यस्तरीय तथा केन्द्रस्तरीय स्वास्थ्य व्यवस्था की प्रत्येक नागरिकों को स्वास्थ्य गारंटी के लिए आंदोलन करे। जनता यह मांग करे कि ‘स्वास्थ्य गारंटी नहीं तो वोट नहीं’’। जन दबाव और जन चेतना से न केवल सरकार बल्कि कारपोरेट भी हिलेंगे और तभी जनता की सेहत सुधरेगी। क्यूबा, चीन, बांग्लादेश का उदाहरण हमारे सामने है। तो देर किस बात की। जागिए और ऐलान कीजिए कि ‘‘स्वास्थ्य की गारंटी दो तो मेरा वोट लो’’, ‘‘स्वास्थ्य की गारंटी नहीं तो वोट नहीं’’।


लेखक जन स्वास्थ्य वैज्ञानिक एवं राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त होमियोपैथिक चिकित्सक हैं


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