जनपथ पर आ रहे हैं “गाँव के लोग” के संपादक रामजी यादव हर इतवार
ज़मीन और गांव से जुड़े, अपने किस्म की अनूठी भाषा में लिखने वाले, कहानीकार और ‘गांव के लोग’ पत्रिका के सम्पादक रामजी यादव अब जनपथ से जुड़ रहे हैं। आगामी …
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ज़मीन और गांव से जुड़े, अपने किस्म की अनूठी भाषा में लिखने वाले, कहानीकार और ‘गांव के लोग’ पत्रिका के सम्पादक रामजी यादव अब जनपथ से जुड़ रहे हैं। आगामी …
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ईरान ने यह स्पष्ट किया है कि चाबहार रेल परियोजना को लेकर भारत से कोई क़रार ही नहीं हुआ था, सो क़रार टूटने का सवाल नहीं है. तकनीकी रूप से यह बात सही है
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मारे जीवन में राजनीति के विराट रंगमंच पर अब ऐसे सहृदय प्रेक्षकों की भारी कमी होती जा रही है। इसीलिए राजनीति के नाटक का पूरा संचालन एक निर्देशक के हाथों में आ गया है। हमने दखल लेने की अर्हताएँ खो दी हैं। अब हम केवल दर्शक हैं। जो दिखाओ, हम देख लेंगे। जो सुनाओ, हम सुन लेंगे।
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सवाल यह है ही नहीं कि कांग्रेस को बचाया जा सकता था. यहां सवाल यह था कि कांग्रेस किस जाति या समुदाय के साथ गठबंधन करती जिससे कि उसकी डूबती हुई लुटिया को बचाया जा सकता था? क्या उस डूबती हुई नैया को पूरी तरह डुबाने का श्रेय राहुल गांधी को दिया जाना चाहिए? शायद यह कहना राहुल गांधी के साथ नाइंसाफी होगी.
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मैं अपने स्तर पर ऐसे 30,000 से ज्यादा संवेदनशील लोगों को होमियोपैथी दवा एवं एहतियात के बदौलत कोरोना संक्रमण से बचा चुका हूँ। लगभग 250 कोरोना पॉजिटिव मरीजों का सफल इलाज कर चुका हूँ। परिणाम अच्छे हैं।
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आखिर ट्विटर पर हो रहा जन-जागरण किसे संबोधित था? अंधविश्वासों में जकड़ी हिन्दू औरतें ट्विटर पर मिलती हैं क्या? अव्वल तो ये विरोध, ये हैश टैग क्रांति, ‘मिसप्लेस्ड’ थी, लेकिन यहां मेरा विषय यह है ही नहीं।
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विदर्भ में ताप बिजलीघरों को पानी देने पर एक रिपोर्ट गैर-सरकारी संगठन ग्रीनपीस ने भी दी है. संस्था के मुताबिक, 2003 से 2011 के बीच 3988.7 करोड़ क्यू. मी. पानी तापबिजली घरों की दी जा चुकी है और इससे करीबन 79,774 हे. खेतों को सींचा जा सकता था. विदर्भ में आत्महत्याओं के सिलसिले को कृषि समस्या और सिंचाई की कमी से जोड़ा जाता रहा है. खासकर जिन जिलों में किसान आत्महत्याएं अधिक संजीदा रुख अख्तियार किए हुए है वहां कोयला आधारित ताप बिजलीघरों को मंजूरी देना अतार्किक सा लगता है.
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कानपुर में जो उस दिन हुआ और जो इस दिन हुआ, यह ब्रह्मांड में घटित ऐसी ही मामूली घटनाओं की तरह है। व्यवस्था के उल्का पिंडों के टकराव की तरह। इसमें जनता के हिस्से में केवल राख होना आया था। लेकिन उसे ये नहीं पता था कि एक दिन सब धुआं-धुआं हो जाएगा।
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भद्रकुमार जैसा वरिष्ठ और अनुभवी कूटनीतिक जब यह कहता है कि डोवाल की कोशिशों को नाक़ामयाब बनाने और उसे ग़लत साबित करने की रिपोर्टों और विश्लेषणों के पीछे दिल्ली में मौजूद ताक़तवर अमेरिकी लॉबी है, तो हमें गंभीरता से इसे सुनना-समझना चाहिए.
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तोड़ भी दीजिए चुप्पी! बोलिए, कहिए, सुनिए, सुनाइए, चिल्लाइए! दोस्तों के बीच, घर में, फोन करते वक़्त, दफ्तर में! और अगर इसका अभ्यास नहीं है तो आईने के सामने खड़े होकर खुद से खुद के लिए बोलिए… देखिएगा, अच्छा लगेगा फिर। हवा चलने लगेगी! रूत, बदलने लगेगी!
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