बात बोलेगी: नये युग का करें स्वागत…


परसों सावन बीत गया। कल से भादों शुरू हो गया है। आज भादों की द्वितीया के साथ ही ऐसा कहा जा रहा है कि भारत में ‘नया युग’ शुरू हो रहा है। पाँच सौ साल पुराना युग। हिन्दू युग।

आज बीते युग की कुछ बातें होंगी।

बीत चुके युग में अँग्रेजी कलेंडर के अनुसार इस साल (2020) होली किसी तरह बस ‘हो-ली’। दिल्ली में उठीं हिंसा की लपटों से मन में कालिख पुती हुई थी। उस पर कोरोना की पदचाप तमाम अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों के रास्तों पर स्पष्ट सुनायी देने लगी थी। विपक्ष का एक नेता लगातार सावधान कर रहा था कि कोरोना अब बस पहुँचा ही जानो। अब भी एयरपोर्ट्स पर इसे लेकर सावधानियाँ नहीं बरती जा रही थीं। शाहीन बाग अब भी फौलादी इरादों के साथ देश के उस संविधान की रक्षा में रात-दिन डटा हुआ था जो देश के हर नागरिक को समान रूप से प्यार-दुलार, सम्मान और सुरक्षा देता है। देश के अन्य छोटे-बड़े शहरों में सैकड़ों शाहीन बाग बन चुके थे। कई-कई पीढ़ियाँ एक साथ देश में चेतना का संचार कर रही थीं। बुजुर्गों की जो पीढ़ी कई दशकों से आंदोलनों में नहीं देखी गयी, वो इसकी धुरी बन गये। विशेष रूप से महिलाएं, अम्माएं, अम्मीयाएँ, चाचियाँ, दादियाँ, नानियाँ। वो एक साथ कई मोर्चों पर लड़ रही थीं। अपने औरतपन से भी, पितृसत्ता से भी, मज़हबी कट्टरताओं से भी और राजसत्ता से भी। इनकी लड़ाई को मिला व्यापक समर्थन न केवल संसदीय लोकतन्त्र में एक हिलोर पैदा कर रहा था बल्कि घर, परिवार, समाज और मज़हबी सत्ताओं के खिलाफ समानता के जन्मसिद्ध अधिकार में पुनर्दखल कर रहा था।

बहुत कुछ बदल रहा था। हिंसा की तमाम वरदहस्त प्राप्त वारदातों से भी इनका हौसला टूटने और  एकता बिखरने का नाम नहीं ले रही थी।

कोरोना की आहट ने जहां पूरी दुनिया के हौसले तोड़े, तो इनको भी उन्हें स्थगित करना पड़ा। व्यापक जन-स्वास्थ्य की खातिर। आख़िरकार दादियाँ-नानियाँ ही तो थीं। उनके दिल पसीजे थे, लेकिन उनकी आग अब भी ठंडी न पड़ी थी।

यह रायसीना हिल्स में निवासरत सियारी वीरता नहीं थी जो कुछ औंस वज़न के एक वायरस से डरकर होली मिलन के कार्यक्रम मुल्तवी कर रही थी। दूरी का पालन तो वैसे भी चारित्रिक विशेषता रही है इसकी, लेकिन जब भय से उत्पन्न दूरी की घोषणा ही करनी पड़ गयी तो भी इस छद्म वीरता में इतना साहस नहीं था कि कह सकती कि पंथ प्रधान होने के नाते दिल्ली में हुई बर्बर हिंसा से दुखी मन इस बार होली न मना पाएगा; कह पाता कि मैं कैसे रंगों से खेलूँ, जब मेरे संरक्षण में मेरी ही राजधानी में सैकड़ों परिवारों के घर उजड़ गये। तब भी इस वीरता ने कोरोना की ओट ले ली।

दिल्ली में रहने वाले कई लोगों ने इस साल होली नहीं खेली। कोरोना की वजह से नहीं, बल्कि उत्तर-पूर्व में हुई हिंसा और कुछ न कर पाने की विवशता के कारण। यह मानवीय था। यहाँ करुणा थी। अपने सह-नागरिकों के प्रति मन में दर्द था। हिंसा का शिकार हुए परिवारों के साथ सहानुभूति थी। अफ़सोस! रायसीना हिल्स में वजह दूसरी थी जो विशुद्ध रूप से अपने पद, अपने दायित्वों और अंतत: मनुष्य होने की न्यूनतम अहर्ता से एक कुटिल पलायन था। बहरहाल, होली कुछ इसी तरह बीती।

अब आयी ईद, जिसमें भी सब मनाते रहे कि किसी तरह इस बार ईद मना लो। लॉकडाउन को सुस्त कर दिया गया था जिसे हिंदुस्तान की आत्मा से प्यार करने वाले सशंकित निगाह से देख रहे थे। उन्हें डर था कि अगर मुसलमान घरों से निकले और इधर कोरोना के आंकड़ों में वृद्धि हुई, तो तोहमतें मढ़ने को शिकारी घात लगाये बैठे हुए हैं। ईद से पहले ईद की रस्मन मुबारकबाद नसीहतों में बदल गयी। ईद, मुहर्रम की तरह बीती।

अब फिर ईद आयी। लॉकडाउन का अनलॉक हो चुका था लेकिन एहतियात बरकरार थी। नसीहतें और ज़्यादा बढ़ गयीं। नये मरकज़ की तलाश में गिद्ध (सहूलियत के लिए मीडिया चैनलों और सोशल मीडिया में काम कर रहे तनखैया पढ़ें) घात लगाये बैठे थे। क्यों जाना मस्जिद? क्या करोगे ईदगाह जाकर? घर पर ही मना लो इस बार भी। आगे ठीक से मनाएंगे। ईद -उल-जुहा भी बीत गयी।

रक्षाबंधन अभी देश में संक्रमण काल से गुज़र रहा है। यह तय करना मुश्किल हुआ पड़ा है कि कौन किसकी रक्षा करेगा। भाई, बहिन की करेगा या बहिन भाई की या दोनों एक-दूसरे की या सब इतने सक्षम हैं कि किसी को किसी की रक्षा की ज़रूरत नहीं है। कोरोना काल में जहां सब कुछ की गति थोड़ा मद्धम हुई है, इस उलझन में कोई खास कमी दर्ज़ होना नहीं पाया गया। इसलिए रक्षाबंधन पर बाज़ार को जरूर थोड़ा फर्क पड़ा हो, लेकिन दिल्ली में बैठे विमर्शकारों ने इस मामले में यथास्थिति बरकरार रखी है। उन्हें साधुवाद! 

इस बीच थोड़ा क्रमभंग के साथ,  मरकज़ कहीं और बनने लगे। सबसे धनी मंदिर में सैकड़ों की तादाद में लोग संक्रमित हो गये। सरकार बचाने, बनाने और टिकाये रखने की लालच में देश के हृदय प्रदेश के कर्णधार बीमार पड़ गये। बकौल बबीता फोगाट, ये बीमारी सूअरों से फैलने लगी और सूअरों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ी। यहाँ तक कि पुराने युग के अवसान की एक संध्या में ऐसी ख़बर मिली कि लोग सन्न रह गये। लोकतंत्र का गर्भगृह संक्रमित हो गया। इसके समानांतर रामलला के रखवाले भी लपेटे में आ गये। बस, कवि अजय सिंह की इकलौती चर्चित व विवादास्पद कविता का साकार होना शेष रह गया।

हम जैसे लोग तो अब भी खुद को उस राष्ट्र-राज्य से बाहर का मानते हैं जहां किसी बीमार की बीमारी का मखौल बना देना राजधर्म माना जाने लगा हो। यह अनिवार्य कर दिया गया हो कि अगर देशभक्ति जताना हो तो कमजोर को सताओ, बीमारों का मज़ाक बनाओ, उन्हें भरपूर गालियां दो, असहाय लोग सड़कों पर पैदल चलें तो उन्हें पीटने में पुलिस का साथ दो। उनसे रेल का चार गुना किराया वसूलो। उन्हें दंडित करो क्योंकि उन्होंने राजाज्ञा का उल्लंघन किया है। राजाज्ञा हुई तो ताली बाजाओ, थाली बजाओ, घंटा बजाओ, शंख फूँको। यह सब हमने नहीं किया। हम जैसे लोग राज से च्युत लोग हैं। इस नये भारत के नये युग में प्रवेश पर यह सब याद दिलाकर भी हम राजाज्ञा और राजधर्म का निर्वहन नहीं कर रहे हैं, बल्कि ज़ायका ही खराब कर रहे हैं। कबाब में हड्डी समझते हैं? तो वही समझ लो।

सावन बिना कांवड़ियों के बीता। बाबा बर्फानी अकेले मायूस बैठे होंगे अपनी गुफा में। पिछले साल भी उन्हें ऐसा ही मायूस होना पड़ा था जब यात्रा बीच में रोककर एक संप्रभु राष्ट्र ने अपने ओछेपन और तंगदिली का मुज़ाहिरा पेश करते हुए किसी समय एक अलग सभ्यता और संप्रभुता वाले राज्य के साथ वादाखिलाफी की और उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। उस दिन से सभ्यता और भूगोल की दृष्टि से देश का वह मुकुट फौजी बूटों के तले किसी तरह से सांस ले रहा है। अपने समय की उलटबांसी तो देखो! इसे शेष भारत में, खासकर उत्तर भारत में बड़ी जीत की तरह देखा जा रहा है। अगर भारत एक माता है और उसका एक सगुण रूप है तो कश्मीर उसका मुकुट हुआ, जो आज भी लॉकडाउन में है। इस बचे हुए धड़ को यह डर है कि कहीं बूटों तले दबे इस मुकुट में और जिस सर पर यह सजा है उसमें कोई जुंबिश न हो जाय। उसे गुलाम बनाये एक बरस हो चुका है। आज उसकी गुलामी की बरसी भी है।

यह याद दिलाने का और अपने राज्य की अहर्ता-प्राप्त प्रजा को यह यकीन दिलाने के लिए कि राजा का दिल अभी उतना ही कठोर है जितना तुमने चाहा था, वह अपना पाषाणहृदय लेकर अयोध्या पहुँच चुका है। वहाँ “भाजपा का राम मंदिर” बन रहा है। ठीक वैसे ही जैसे कई छोटे-बड़े शहरों में बिरला के मंदिर होते हैं। अंदर कौन बैठा है इससे क्या? बनवाया किसने है यह याद रखा जाता है। इसे चांदी की ईंटों से स्वर्ण अक्षरों में दर्ज़ कराये जाने का प्रदर्शन सीधे प्रसारण से आज देश-दुनिया देख रही है।

बीते तीन दशकों से जिन दो कार्यों के न हो पाने से हिंदुस्तान का बहुसंख्यक समाज खुद को गंभीर रूप से असहाय, निर्बल और हीनताबोध से ग्रसित पा रहा था, आज ऐसा संयोग रचा गया कि दोनों ऐतिहासिक कार्य सम्पन्न होने जा रहे हैं। कश्मीर के सच्चे अर्थों में विलय (जिसे आपने मुकुट के रौंदे जाने के तौर पर ऊपर पढ़ा) की बरसी और राम का भव्य मंदिर।

इस नये युग का स्वागत अब एक स्वाभिमानी हिन्दू करेगा। अब चहुंओर स्वाभिमान की घटाएँ छा जाएंगी। स्वाभिमान बारिश की बूंदों में बरसेगा। खेतों में धर्मभिमान अन्न के दानों के रूप में पैदा होगा। समूचा आर्यावर्त अब उच्च कोटि की नस्लें जनेगा। रक्त में प्रबल जोश बहेगा। अभिमान ही अब से रोटी होगी। धर्म-रक्षा ही रोजगार होगा। सब अभिमान की हंसी हँसेंगे, स्वाभिमान के आंसू रोएँगे। दैहिक, दैविक भौतिक तापा अब यहाँ नहीं व्यापेंगे। यह भारत के संसदीय लोकतन्त्र को नये भारत की धर्म-संसद में बदल जाने का का दिन होगा।

आओ, नये युग का करें स्वागत!



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