जनहित की ‘राजनीति’ बनाम निर्वाचित सरकार का ‘राजहठ’


शास्त्र और ग्रंथ तो नहीं पढ़ा हूं, लेकिन घर पर आपने दादा को कभी-कभार यह कहते सुना हूं कि दुनिया में तीन सबसे बड़े हठ हैं- राजहठ, बालहठ और स्त्री हठ। मुझे सभी हठ उस सीमा तक पसंद हैं जो तर्क और विज्ञान की कसौटी पर सही तुल पायें। हां, ‘मैया मोहें चाँद खिलौना लेइहौं’ जैसा बालहठ मुझे बेशक पसंद है क्योंकि मैं इसे वात्सल्य की आंखों से देखता हूं।

बहरहाल, मैं अपनी उस बात पर आता हूं जो आज ज़ेरे बहस होनी चाहिए- राजहठ। शासन व्यवस्था जब धूर्ततापूर्ण चालाकी अख़्तियार कर ले तब वह अधिक ख़तरनाक हो जाती है। वह हमें बदली हुई तो दिखायी देती है, हमें सब कुछ ठीक-ठीक होने का एहसास दिलाती है मगर अपनी मूल प्रवृत्ति नही छोड़ती। जैसे, सामंती व्यवस्था को अपने क्षरण का जब आभास हुआ होगा तब उसने राष्ट्र-राज्य का रूप धर लिया और हमें लोकतंत्र जैसी शासन व्यवस्था मिली। इसमें होना तो यह चाहिए था कि हमें एक ‘प्रधान सेवक’ और ‘मुख्य सेवक’  मिलता जो सबके साथ मिलजुल कर देश और प्रदेश को तरक़्क़ी की राह पर ले जाता, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हुआ नहीं (इस बात का सम्बंध 2014 से आज तक का है क्योंकि इसी अवधि में मैं वोटर बना और घटनाओं को घटते मैंने देखा)।

जो लोग गांव में रहे होंगे उन्हें पता होगा कि पुरवा बयार बहने पर देह में लगी पुरानी चोट फिर से दर्द देने लगती है। 2014 में मुझे लगा था कि ये जो राजनीति की नयी बयार आयी है वो लोगों को सुकून देगी, उनका जीना आसान बनाएगी लेकिन ये तो पुरवा बयार की तरह निकली।

प्रचंड बहुमत के साथ देश में और बाद में उत्तर प्रदेश में एक ही दल की सरकार बनी। दोनों ने शपथ संविधान की ली लेकिन दोनों ने ही राजा और प्रजा की तर्ज पर व्यवस्था को चलाना शुरू कर दिया। कौरवों की भांति केंद्र का तरीक़ा इंच भर पीछे नहीं हटने वाला और राज्य का रवैया ठोंक देने वाला रहा। जिन्होंने महाभारत का टीवी पर दोबारा प्रसारण शुरू करवाया है, उन्हें ‘इंच भर’ पीछे न हटने  का परिणाम तो पता ही रहा होगा। अगर नहीं, तो अब धारावाहिक देखकर जरूर पता चल गया होगा।

2014 के बाद से आज तक ऐसे कई उदाहरण हैं (जीएसटी, नोटबन्दी, सीएए आदि) हैं जिनसे यह समझ आता है कि लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार के मुखिया ने हमेशा अपनी बात को ही सर्वथा सत्य माना और अपनी ज़िद से ही देश को चलाया (देश चला या नहीं, यही बात समझने वाली है)। विमर्श के सारे दरवाज़े बन्द कर दिये गये। विमर्श हुआ भी, तो वह हाथी के दिखने वाले दांत की तरह रहा। अंततः लोकतंत्र में राजहठ कायम रहा।

वर्तमान समय में पूरी दुनिया ऐसी व्याधि से जूझ रही है जिसका फिलहाल अभी तक कोई समाधान नहीं निकल पाया है। विज्ञान की तरक़्क़ी को देखते हुए जल्द ही समाधान मिल जाने की उम्मीद है। हमारी सरकार के लिए हालांकि यह महामारी ही अपने आप में एक ‘उम्मीद’ है, जिसको वो ‘अवसर’ के रूप में ले रही है। कैसा अवसर? अगर यह अवसर है तो इसका लाभ क्या और किसे होगा। इस बीच प्रधानमंत्री केयर्स फंड भी सवालों के घेरे में है।

फिलहाल इस महामारी ने मानव जीवन का पहिया जाम कर दिया है। घंटों का सफ़र मीलों का हो गया और कई जानें तो अनन्त के सफ़र पर चली गयीं, जो अब घर कभी नहीं पहुंचेंगी। आग उगलते सूरज के नीचे हमारे बच्चों के कोमल पैर, विकास की प्रतीक सड़कों पर पिघलते गर्म अलकतरे से जा चिपके। हमने तब भी इसे अवसर माने बैठे रहे। क्या यह ऐसी परिस्थिति है जिसका हल व्यापार की सोच और भाषा से होगा?

हम सरकार को लगातार यह कहते हुए सुनते आये हैं कि वह विपक्ष से सकारात्मक सहयोग की अपेक्षा करती है। इसके ठीक उलट देश के सबसे बड़े सूबे में विपक्ष की ओर से दिये गये एक सकारात्मक सहयोग की लगातार उपेक्षा की जा रही है। कांग्रेस पार्टी प्रदेश के मजदूरों को उनके घर वापस भेजने के लिए एक हज़ार बसें अपनी तरफ से भेजना चाह रही थी। सरकार जोड़गांठ कर पत्राचार में लगी रही कि आपने तो एक हज़ार बसें कही थीं लेकिन बसें तो 879 ही हैं और इनमें भी कई बसों के तमाम प्रमाणपत्र नहीं हैं। उत्तर प्रदेश परिवहन की बसों की वो दशा है कि ब्रेक के नीचे ईंट लगाकर उसपर पैर रखकर बस रोकी जाती है। कई बार तो स्टीयरिंग छोड़कर दोनो हाथों से गियर लगाना पड़ता है। यह स्थिति हम सभी जानते हैं। यदि इसके बाद भी सरकार ऐसे संकटकाल में कांग्रेस पार्टी द्वारा उपलब्ध करायी गयी बसों को ऐसे तर्कों के आधार पर रोकेगी, तो उसकी नीयत पर सवाल उठेंगे ही।

आदर्श तो यह होता कि जितनी बसें उपलब्ध थीं, उनसे राज्य सरकार लोगों को उनके घरों तक पहुंचाती और सहयोग के लिए शुक्रिया कहती! इससे सरकार का इकबाल मजबूत होता और सकारात्मक राजनीति को बल मिलता, लेकिन ऐसा हो नही रहा है। बहुत से लोग इसे कांग्रेस पार्टी की राजनीति कह रहे हैं। मेरा मानना है कि राजनीति से यदि व्यापक हित होता है, तो ऐसी ही राजनीति होनी चाहिए लेकिन हकीकत तो यह है कि सरकार की प्राथमिकता में मजदूर कहीं आते ही नहीं हैं, वर्ना इसकी नौबत ही नहीं आती।

इस सरकार को बनाने के लिए तो मजदूर वर्ग ने भी वोट किया था, सरकार चुनी थी लेकिन अब सरकार ने इन्हें चुनने से इनकार कर दिया। इनकी जगह सरकार ने प्रवासी भारतीयों को चुना जो बेहतर सुख सुविधा की लालसा लिए देश छोड़ गये थे। उलटे, सरकार ने व्यवस्था कायम रखने के नाम पर ‘कोरोना योद्धा’ के रूप में पुलिस को खुला छोड़ दिया है जिसकी लाठी का शिकार गरीब और मजदूर ही हो रहा है। आजादी के इतने दशक बाद भी राज्य का चरित्र यदि नहीं बदला है, यदि आज भी वो सामंती नहीं तो अर्ध-सामंती बर्ताव करता है और लोगों को नागरिक के बजाय प्रजा के रूप में देखता है, तो हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का बाज़ा बजाते हुए क्यों घूमते फिरते हैं?


लेखक बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) के छात्र हैं


About धीरेन्द्र गर्ग

View all posts by धीरेन्द्र गर्ग →

3 Comments on “जनहित की ‘राजनीति’ बनाम निर्वाचित सरकार का ‘राजहठ’”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *