मास्क लगाओ, पढ़ते जाओ: एक प्रकाशक और एक दर्ज़ी के सह-अस्तित्व की साझा लड़ाई और अपील


दलित विषयक किताबों को प्रमुखता से प्रकाशित करने वाला नवायन प्रकाशन संकट में चल रहा है. इस प्रकाशन ने अपने पाठकों से एक अपील जारी की है और सस्ती दर पर किताबों की सेल शुरू की है.

कहानी हालाँकि इतनी ही नहीं है.

नवायन प्रकाशन को खुले 17 साल हो गये. वर्ण व्यवस्था के ख़िलाफ़ लम्बी लड़ाई में नवायन ने समकालीन बौद्धिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण भूमिका प्रकाशन के माध्यम से निभायी है. नवायन के प्रमुख लेखक आनंद तेलतुम्बडे फिलहाल जेल में हैं जबकि कोरोना के चलते लगे लॉकडाउन ने देश के अस्सी फीसद किताब बाज़ार को अपनी चपेट में ले लिया है. कुछ प्रकाशन हमेशा के लिए बंद हो गये. कुछ दुकानों ने अपने शटर गिरा दिये. सबसे बुरा असर उन प्रकाशनों पर पड़ा है जो सामाजिक महत्त्व और आन्दोलन से जुड़ी किताबें छापते थे.

दिल्ली के शाहपुर जाट से अपना दफ्तर चलाने वाले नवायन इन्हीं में एक है. नवायन जिस भवन में स्थित है, उसके दूसरे माले पर एक बाप-बेटा दर्ज़ी हैं. पिता शाहबाज़ और पुत्र सुहैल भागलपुर से हैं. इनके यहाँ छः दर्जियों का स्टाफ काम करता था जिनमें से दो लोग बंदिशें हटते ही झारखण्ड में अपने गाँव लौट गये. सुहैल के मुताबिक़ 80 फीसद काम का नुकसान हुआ है और तीन महीने से वे दुकान का किराया नहीं चुका सके हैं. इस बीच शाहबाज़ और सुहैल ने धंधा जारी रखने के लिए मास्क बनाने शुरू कर दिए.

नवायन को समझ में आया कि जिस तरह किताबों से लेकर दर्जियों तक सब पर लॉकडाउन की मार पड़ी है, कुछ ऐसा किया जाना चाहिए ताकि दोनों अपने अपने अस्तित्व को एक दूसरे के सहारे बचा सकें. इस तरह बुनावट और लिखावट की दुनिया का संगमेल हुआ. नवायन के लोग तो पहले से ही शाहबाज़ टेलर के बनाए इक्कत, कलमकारी, खादी और लिनेन के मास्क पहन रहे थे. अब अपने पाठकों को भी उन्होंने ये प्रस्ताव दिया है.

बस, इस प्रस्ताव की एक शर्त है कि आप नवायन की किताबें खरीदें, शाहबाज़ के मास्क आपको मुफ्त मिलेंगे.

किताबों की तीन श्रेणियां रखी गयी हैं. पहली श्रेणी में अम्बेडकरी कार्यकर्ताओं के संस्मरण, जीवन अनुभव केन्द्रित किताबों का सेट है जिसमें चार पुस्तकें शामिल हैं केवल 999 रुपये में. साथ में शाहबाज़ भाई का बनाया एक मास्क तो रहेगा ही.

दूसरी श्रेणी में जाति विमर्श पर छः किताबों का सेट है जिसमें आनंद तेलतुम्बडे की दो और कांचा इल्लैया व गेल ओम्वेट की एक एक किताब शामिल है, केवल 1499 रुपये में.

अगर आप किताबों के बड़े शौक़ीन हैं और अपनी लाइब्रेरी सजाना चाहते हैं तो 50 किताबों का एक लाइब्रेरी सेट महज 10,999 रुपये में उपलब्ध है.

यदि आप दलित साहित्य में दिलचस्पी रखते हैं तो दलित कविता-कहानी की पांच किताबों का सेट केवल 799 रुपये में उपलब्ध है.

एक प्रकाशक और एक दर्ज़ी के संयुक्त अस्तित्व को बचाने का यह संयुक्त प्रयास अपने आप में दुर्लभ और मौलिक है. इसीलिए अपनी वेबसाइट पर प्रत्येक सेट के विज्ञापन पर नवायन ने लिखा है: नवायन प्रकाशन और शाहबाज़ टेलर की प्रस्तुति!

किताबें खरीदने के लिए नवायन प्रकाशन की वेबसाइट पर जाएं.


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