सब कुछ ठप पड़ा है, फिर विश्व बैंक को ग्रोथ कहां दिख रही है?

इस बार सारा मामला मनोवैज्ञानिक है। कुछ तो जेनुइन भी है। हर आदमी को डर लग गया है कि कहीं मेरी ही मौत न हो जाए। इसके चलते एक दिमागी लॉकडाउन रहेगा लंबे समय तक। खेल, मनोरंजन, पार्टियां, सिनेमाहॉल, यात्रा, पर्यटन, सब कुछ पोस्टपोन हो जाएगा। लॉकडाउन उठ भी गया तो लोग खुद ही इस पर लगाम लगाएंगे। सबसे बड़ा सवाल शिक्षा का है कि स्कूल कॉलेज कब खुलेंगे।

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कोरोनाकाल में गणित के सामने दण्डवत् जगत और आत्मनिर्वासित ग्रेगरी पेरेलमैन!

जिन एप्लाइड मैथमेटीशियन को मैथ वाले कमतर मानते थे और कहा करते थे कि यह भी कोई मैथ जानते हैं जी! उनकी आज दुनिया भर में पूछ हो रही है. हर तरफ मैथेमेटिकल मॉडलिंग का शोर है. दुनिया विश्वयुद्ध के बाद पहली बार इस तरह से गणित के सामने दण्डवत हुई है.

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‘भूख से मरने पर, साबुन हमें नहीं बचा पाएंगे’!

पालघर जिले के कवटेपाड़ा में रहने वाले अधिकांश आदिवासी परिवार निर्माण स्थलों पर दैनिक मज़दूरी करके जीवनयापन करते हैं। कोविड-19 लॉकडाउन के कारण यह काम बंद हो गया है, और अब उनके पैसे और राशन तेज़ी से ख़त्म होने लगे हैं

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(फ्री) सेक्स विमर्श को यहां से देखो राष्ट्रवादियों!

यौन संतोष और आर्थिक फायदा – विवाह के ये दो अहम स्तंभ हैं. सैकड़ों सालों से ऐसा ही चला आ रहा है लेकिन अब स्थितियां अदृश्य रूप से बदल रही हैं.  दरअसल, उत्पादन संबध बदल रहे हैं इसीलिए. तेजी से पसरते हुए मध्यवर्ग का एक तबका फ्री सेक्स के विचार को सैद्धांतिक तौर पर भले ही न माने लेकिन इसकी व्यावहारिकता से शायद ही परहेज करेगा.

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हिंदुत्ववादियों के विलाप के बावजूद नेपाल फिर ‘हिंदू राष्ट्र’ नहीं बन सका

  आनंद स्‍वरूप वर्मा  आखिरकार नेपाल के बहुप्रतीक्षित संविधान को अंतिम रूप देने का काम 13सितंबर से शुरू हो गया। 2008 में निर्वाचित पहली संविधान सभा को ही यह कार्य …

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आस्‍था नहीं, अन्‍वेषण पर आधारित होना चाहिए इतिहास

भारतीय इतिहासलेखन के विकास, असहमति की परंपरा तथा बौद्धिक अभिव्‍यक्तियों को बाधित करने के मौजूदा प्रयासों पर रोमिला थापर की कुलदीप कुमार से बातचीत   (अनुवाद: अभिषेक श्रीवास्‍तव)   आपकी …

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जाति का उन्मूलन: कल, आज और कल

आनंद तेलतुम्बड़े हमारे समय के सबसे महत्‍वपूर्ण चिंतकों में एक हैं। पिछले दिनों उनके कहे-लिखे पर काफी विवाद खड़ा किया गया है। प्रस्‍तुत लेख उन्‍होंने ”समयांतर” के लिए लिखा था …

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पत्रकारिता का साम्राज्यवादी चेहरा: संदर्भ एस.पी. सिंह

सुरेंद्र प्रताप सिंह यानी एस.पी. पर जितेन्‍द्र कुमार के लिखे आलेख पर बहस अब तक फेसबुक समेत तमाम मंचों पर जारी है। यह लेख अब भी जितेन्‍द्र कुमार के ब्‍लॉग …

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एसपी ”मूर्ख-मूर्खाओं” को ही रखते थे क्योंकि वे सवाल नहीं पूछते! पुण्यतिथि पर एक स्मरण…

भारत में टीवी पत्रकारिता के गॉडफादर माने जाने वाले सुरेन्द्र प्रताप सिंह उर्फ़ एसपी की आज पुण्यतिथि है. 1997 में उनकी मौत के बाद बीते दो दशक से ज्यादा वक़्त …

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