हिंदी पट्टी में वामपंथ और मानवाधिकारों की सबसे विश्वसनीय आवाजों में एक रहे कामरेड चितरंजन सिंह का निधन हो गया है. वे लम्बे समय से बीमार चल रहे थे.
बीते कुछ साल से वे जमशेदपुर में अपने भाई के यहाँ रह कर इलाज करवा रहे थे. हाल ही में उन्हें बलिया स्थित अपने गाँव लाया गया. उन्हें बनारस में भर्ती कराया गया था जहां डॉक्टरों ने बताया था कि उनके कुछ अंग काम करना बंद कर चुके हैं.
अभी गुरुवार को ही बलिया के जिलाधिकारी उन्हें देखने गए थे. बलिया के सामाजिक कार्यकर्ता बलवंत यादव ने आज सुबह ही फोन पर बातचीत में बताया था कि उनकी हालत खराब है और अस्पताल वालों ने भी जवाब दे दिया है.
बलवंत यादव ने दो दिन पहले ही चितरंजन जी की स्थिति पर एक वीडियो जारी करते हुए लम्बी टिप्पणी की थी जिसे हम नीचे दे रहे हैं.
हम सभी के प्रिय साथी चितरंजन सिंह जिनका एक लम्बा इतिहास है। आज उनके शरीर के लगभग सभी अंग सामान्य क्रिया करना बन्द कर रहे हैं। मैं यह वीडियो जारी नहीं करना चाहता था। बावजूद इसलिए दे रहा हूँ कि उन तमाम साथी सहयोगी गणों को सचमुच चितरंजन भईया का वास्तविक स्वास्थ्य का समाचार मिल सके। बीएचयू से घर लौट आये हैं। सुल्तानपुर (मनियर), बलिया के मूल निवासी थे। इनका व्यक्तिगत जीवन प्रेम त्रासदी संघर्ष का एक भयानक रूप था। ऐसी स्थिति में भाई मनोरंजन सिंह अखिलेश सिन्हा के साथ साथ पूरा पीयूसीएल संगठन वामपंथी प्रगतिशील समाजवादी बहुजनवादी विचार के लोगों के बगैर सहयोगी बने वे जीवन और जीने की परिस्थितियों में बार बार खड़े नहीं हो पा सकते थे। यह बातें मुझसे उन्होंने कई बार कहा है। बावजूद एक आन्दोलनकारी का आज ऐसे असहाय परिस्थितियों में देखकर मैं खुद अपने को रोक नहीं पा रहा हूँ। मैं बहुत कुछ अंतरंग संवाद के उनके व्यक्तिगत क्षणों के सम्बन्ध को छेडना नहीं चाहता हूँ। मैं बस इतना ही कहना चाहूँगा की सभी साथी सहयोगी लोग जिनको सम्भव हो घर पर उनसे मिल सकते हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के शानदार कैरियर के साथ साथ देश भर में सामाजिक राजनीतिक परिवर्तन के आन्दोलनकारी पत्रकार मानवाधिकार के कार्यकर्ता के रूप में जाने जाते हैं। अब शायद उनकी प्रिय आवाज को हम लोग कभी भी नहीं सुन पाएंगे। मिलते ही सबसे पहला सवाल कि और कैसे हो। अपना ख्याल रखना, बच्चे कैसे हैं, एक एक व्यक्ति का समाचार पूछना, सब ठीक है।चितरंजन जी उम्र में दोगुना थे बावजूद वही ऐसे व्यक्ति थे जिनसे हम निर्भय हो कर कुछ भी कह सकते हैं। डांटने और नाराजगी का तो कोई सवाल ही नहीं बेहतरीन सुझाव देते थे। आज जिन्दगी की अंतिम जंग लड रहे हैं ।


अभी होली पर उनके गांव मिलकर आया, तब लग नहीं रहा था कि इतना जल्दी साथ छूट जाएगा। उन्हें श्रद्धांजलि। उनका व्यवहार भुलाया नहीं जा सकता।
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