नेपाल का ‘संवैधानिक तख्तापलट’: सुप्रीम कोर्ट में याचिका, सड़क पर बवाल, सियासत डांवाडोल


एकतरफा तरीके से इतवार को संसद भंग कर के अगले साल चुनाव की तारीख घोषित करने के बाद नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली पहली बार आज राष्‍ट्र को संबोधित करेंगे।

इस बीच बीते चौबीस घंटे में काठमांडू सहित पूरे नेपाल में विरोध प्रदर्शन शुरू होने की खबर है। सुप्रीम कोर्ट में संसद भंग किए जाने को ‘’संवैधानिक तख्‍तापलट’’ करार देते हुए याचिकाएं लगा दी गयी हैं। प्रधानमंत्री ओली के इस कदम की नेपाल में कड़ी आलोचना हो रही है, इस कदम को नेपाली लोकतंत्र की हत्या कहा जा रहा है।

नेपाल मजदूर किसान पार्टी के अध्यक्ष नारायण मान बिजुक्छे ने कहा है कि यह कदम भारत के दबाव में उठाया गया है। नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी ने ओली के कदम को अलोकतांत्रिक, संविधान-विरोधी और तानाशाही बताया है। पार्टी की स्टैंडिंग कमिटी की बैठक में ओली के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की गयी है। इसके लिए केंद्रीय समिति की आज की बैठक में प्रस्ताव लिया जाएगा।

नेपाली कांग्रेस ने कहा है कि संसद को भंग करने की ओली की सलाह संविधान की आत्मा और प्रावधानों के खिलाफ है और पार्टी इस कदम का मजबूती से विरोध करेगी।

संसद भंग किये जाने के बाद सात मंत्रियों ने इस्‍तीफा दे दिया था। सड़क पर ओली के पुतले जलाए जाने लगे थे। सुप्रीम कोर्ट के प्रवक्‍ता के अनुसार संसद भंग किए जाने के खिलाफ याचिकाएं दाखिल की गयी हैं। दिनेश त्रिपाठी याचिकाकर्ताओं में एक हैं जो वकील हैं। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री के पास संसद भंग करने का अधिकार नहीं है।

उन्‍होंने रायटर को बताया कि वे इस फैसले पर कोर्ट से स्‍टे लेने जा रहे हैं क्‍योंकि यह ‘’संवैधानिक तख्‍तापलट’’ है।

कोर्ट में अगर ये याचिकाएं स्‍वीकार हो गयीं तो जानकारों के मुताबिक फैसला आने में दो हफ्ता लग जा सकता है। ओली की सलाह पर राष्‍ट्रपति ने अगले चुनाव की तारीख 30 अप्रैल और 10 मई 2021 रखी है। यह नियत समय से एक साल पहले की तारीख है।

तीन साल पहले केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में तत्कालीन सीपीएन-यूएमएल और प्रचंड के नेतृत्व वाले सीपीएन (माओवादी सेंटर) ने चुनावी गठबंधन बनाया था. इस गठबंधन को चुनावों में दो-तिहाई बहुमत मिला था. सरकार बनने के कुछ समय बाद ही दोनों दलों का विलय हो गया था.

इस पूरे घटनाक्रम पर वरिष्ठ पत्रकार और नेपाल मामलों के विशेषज्ञ आनंद स्वरूप वर्मा ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है :

नेपाल के प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली की सरकार की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति बिद्या भण्डारी ने आज संसद को भंग कर दिया और नए चुनावों की घोषणा की. जनतंत्र के इतिहास की संभवत: यह पहली घटना है जब लगभग दो तिहाई बहुमत की सरकार के मुखिया ने सारे नियम कानून ताक पर रख कर अपनी ही निर्वाचित सरकार को महज इसलिए भंग करा दिया क्योंकि उसे अपनी पार्टी के प्रतिद्वंद्वियों से अपनी कुर्सी के लिए खतरा दिखाई दे रहा था और इस प्रकार समूचे देश को संकट में डाल दिया. उनके इस कदम के विरोध में उनके ही मंत्रिमंडल के सात मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया है और कहा है कि उनका यह कदम “गैर संवैधानिक, आलोकतांत्रिक, जनादेशविपरीत तथा राजनीतिक मूल्य और स्थिरता के प्रतिकूल” है. ओली के इस आत्मघाती कदम का विश्लेषण जल्दी ही सामने आएगा.


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