वेनेज़ुएला का असफल तख्तापलट और चावेज़ का अधूरा सपना


कुछ ही दिन पहले अमरीका के अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने दक्षिण अमरीकी देश वेनेज़ुएला में विपक्षी दलों के सदस्यों के उत्पीड़न पर एक खबर छापी। न्यूयॉर्क टाइम्स एक प्रभावशाली अखबार है, लेकिन वह हाथ धोकर वेनेज़ुएला के पीछे पड़ा है और पिछले करीब दो साल से निरंतर वेनेज़ुएला की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक स्थिति पर नकारात्मक लेख प्रकाशित कर रहा है।

दक्षिण अमेरिका में नव-उदारवादी और पूंजीवादी सरकारों के विरोध में कई सारे आन्दोलन हुए हैं और कई वामपंथी या वामपंथी रुझान वाली राजनीतिक पार्टियां सत्ता में आयी हैं। फिर भी वहां शासन परिवर्तन करने की प्रक्रिया में विदेशी साम्राज्यवादी और देसी पूंजीवादी ताकतें हमेशा सक्रिय रहती आयी हैं।

अभी हाल ही में वेनेज़ुएला में तख्तापलट का एक षडयंत्र रंगे हाथों पकड़ा गया। इस साज़िश का मुखिया एक भूतपूर्व अमेरिकी सैनिक था। अमेरिका बहुत दिनों से वेनेज़ुएला में तख्तापलट के प्रयास में लगा है, खासकर जबसे राष्ट्रपति चावेज़ चल बसे और सत्ता का भार निकोलस मादुरो पर आया।  

चावेज़ ने जिस समाजवादी आंदोलन का वेनेज़ुएला में आगाज़ किया था वह मूलतः राजकीय समाजवाद था जो 19वीं सदी के क्रांतिकारी सिमोन बोलिवार के राष्ट्रवाद से प्रेरित था। चावेज़ की क्रान्ति का एक महत्त्वपूर्ण बिंदु यह था कि वह सच्चे रूप से ज़मीनी-स्तर का समाजवाद था। उसकी परिकल्पना में समाज के हरेक वर्ग का सशक्तिकरण था। इसके लिए एक सर्वव्यापी ढांचा भी तैयार किया गया जिससे समाज में ऐसी संस्थाएं बनायीं गयीं जो स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियाँ और फैसले ले सकें।  

इस ढांचे की मूल इकाई “कोमुना” (comuna) कहलाती है जो एक समुदाय यानी कम्युनिटी का एक अंश होती है। अलग-अलग तरह के कोमुना और कोआपरेटिव बने जो एक-दूसरे के साथ जुड़े और राष्ट्रीय स्तर तक अपनी बात रखने की क्षमता रखते हैं। इनको सरकार की तरफ से फंडिंग दी जाती रही है। कोमुना में समाज के आम आदमी शामिल थे। स्थानीय स्तर के मामलों से निपटने के लिए अपेक्षा की गयी कि सरकारी महकमे और मुलाज़िम- जैसे मुन्सीपाल्टी इत्यादि – क्रमशः अपना दायित्व कोमुना को सौंप देंगे। जब तक यह कोमुना अपने पैरों पर नहीं खड़े हो जाते, तब तक समाज की मौलिक जरूरतें और सुविधाएँ सरकार की ज़िम्मेदारी है।  

एक समाजवादी व्यवस्था के अंतर्गत स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि-उद्योग एवं खाद्य सम्प्रभुता जैसे मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया गया। ये सुविधाएँ राष्ट्रीय स्तर पर ‘मिशन्स’ (missions, या स्पैनिश भाषा में मिसिओनेस/missiones ) के नाम पर अलग-अलग क्षेत्र के लिए चलायी गयीं। जैसे सेहत-सम्बन्धी सुविधाएँ मिशन बारियो एदेन्त्रा (Mission Barrio Adentro) के नाम से और शिक्षा सम्बन्धी सुविधाएँ मिशन रॉबिंसन (Mission Robinson) के नाम से जानी गयीं। मिशन ज़मोरा (Mission Zamora ) के नाम के अंतर्गत भूमि पुनर्वितरण का काम शुरू हुआ।  

स्वास्थ्य-सम्बन्धी सुविधाओं और कृषि-सम्बन्धी कार्यों के लिए क्यूबा से डॉक्टर और अन्य विशेषज्ञ बुलाये गए। ज़रूरतमंद इलाकों में मोहल्ला-क्लिनिक की स्थापना हुई।  

चावेज़ की उस क्रांति की एक विशिष्टता यह थी कि उसने सभी निजी व विदेशी उद्योगों, कंपनियों इत्यादि को बंद नहीं किया या उन्हें देश से निकलने के आदेश नहीं दिया। जब चावेज़ सत्ता में आये तब वेनेज़ुएला भारी रूप से या तो निजी उद्योगों पर या विदेशी कंपनियों पर निर्भर था अपनी ज़रूरतों के लिए। उनके लिए एक ही साथ उन सभी उद्योगों को एकदम से बंद करना आसान निर्णय नहीं था।  

एक तरह से कहिये, समाजवाद का एक नया प्रयोग और पूँजीवाद का पुराना कारोबार- और उसकी अपरिवर्तनीय आदतें- एक साथ चलने लगे।  

इसी कारण जो पूंजीवादी थे, वे अधिक्तर पहले जैसे ही बने रहे। चावेज़ को इस बात पर कई विशेषज्ञों और समाजकर्मियों ने प्रश्न किया था कि आपने एक ही बार में पूरी अर्थव्यवस्था क्यों नहीं बदल दी। चावेज़ ने तो उन पूर्व-सेनाधिकारियों को भी माफ़ कर दिया था जिन्होंने उसको पहले गिरफ्तार किया था और उसके खिलाफ तख़्त-पलट का प्रयास किया था।  

उसकी क्रांति लाने की शैली क्यूबा से भिन्न रही- क्यूबा ने एक नए सिरे से शुरुआत करने का फैसला किया था क्रांतिकारी सरकार की  स्थापना के बाद। पूंजीवादियों से क्यूबा ने पूरी तरह से एक बार में नाता तोड़ा था। वेनेज़ुएला में ऐसा नहीं हुआ। इसी कारण से वेनेज़ुएला में पूंजीवादियों और दक्षिणपंथियों की पकड़ बनी रही, खासकर राजनीति में।  

चावेज़ के सन 2013 में आकस्मिक देहांत के बाद निकोलस मादुरो ने कमान संभाली, लेकिन उनके आते-आते विश्व भर में कच्चे तेल के दाम गिरने लगे थे और एक चीज़ चावेज़ पूरी तरह से कार्यान्वित नहीं कर पाए  थे- वह था वेनेज़ुएला की अर्थव्यवस्था की कच्चे तेल के निर्यात पर निर्भरता। उनका पूरा समाजवादी आंदोलन उस तेल के निर्यात की आमदनी से ही चल रहा था।  

कई कारणों से मादुरो अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से संभाल नहीं पाए हैं। इसमें कई तरह की बाहरी अड़चनें भी बाधक रही हैं। यह कम नहीं था कि अमरीका ने 2017 से वेनेज़ुएला के तेल निर्यात पर प्रतिबन्ध लगाए। फिर बिजली के ग्रिड में कुछ दिक़्क़तों के कारण देश भर में पिछले साल भीषण विद्युत् कटौती चली। वेनेज़ुएला की मुद्रा व्यवस्था में भी काफी गंभीर समस्याएँ रहीं हैं और अब अमेरिकी डॉलर भी स्वीकार्य हो गया है उनके हाट-बाज़ार में, जिससे कालाबाज़ारी इत्यादि और बढ़ गयी है।  

इन सब के साथ-साथ वेनेज़ुएला का विपक्ष निरंतर इस प्रयास में है- अमरीका के समर्थन के साथ- कि किसी भी प्रकार से तख्तापलट कर दिया जाय। इस शंकापूर्ण स्थिति का नतीजा यह हुआ है कि सरकारी दमन, नियंत्रण, प्रतिहिंसा बढ़ी है। कहने को तो सरकार-विरोधी और देश-विरोधी ताकतों के प्रति कदम उठाये जा रहे हैं, लेकिन इसकी चपेट में ऐसे कई लोग भी आ रहे हैं जो अपने को चावेज़ के अनुयायी मानते थे लेकिन उन्होंने मादुरो की कार्यशैली पर सवाल उठाये, उन्हें भी हिरासत में ले लिया गया है ।  

चावेज़ की समाजवादी क्रांति विश्व भर में एक प्रेरणादायक उदाहरण थी लोकशक्ति की काबिलियत का। वेनेज़ुएला ने उस दौरान अपनी आर्थिक स्थिति बहुत बेहतर की थी, खासकर समाज में आर्थिक असामनता पर काबू पाने के मामले में। वह एक बहुत बड़े स्तर पर खाद्य परिपूर्णता और संप्रभुता की ओर अग्रसर था। उसने देश भर में सामुदायिक स्वास्थ्य-केंद्र खोलकर महंगी सी महंगी चिकित्सा को आम व्यक्ति तक पहुँचाने की कोशिश की थी। ध्यान देने की बात यह है कि यही लोकल क्लिनिक आज उसके कोरोना महामारी के संदर्भ में निर्णायक साबित हो रहे हैं।  

उसके कोमुना और अन्य प्रकार के कोआपरेटिव आज भी जमे हुए हैं। उदाहरण के तौर पर, मेरिडा राज्य में “चे गेवारा कम्यून” कॉफ़ी, कोको, गन्ना और केलों की खेतीबाड़ी में आज भी लगा हुआ है। वेनेज़ुएला में कई बीज बैंक हैं जो देसी बीजों का संग्रहण करते हैं और उनका वितरण भी। ऐसे और भी बहुत प्रोग्राम हैं जो सच्ची आत्मनिर्भरता और लोकतंत्र के जीते-जागते उदाहरण हैं।  

आज वेनेज़ुएला कुछ कठिनाइयों के दौर से गुज़र रहा है। बहुत वर्षों तक क्यूबा भी एक ख़ास दौर से गुज़रा जब उसका एक मुख्य व्यापारिक पार्टनर सोवियत यूनियन भंग हो गया था। जब तक वेनेज़ुएला के चावेज़ ने क्यूबा से सुदृढ़ व्यापारिक रिश्ते नहीं जोड़े तब तक क्यूबा काफी आर्थिक तंगी में रहा। आज वेनेज़ुएला की स्थिति थोड़ी लड़खड़ायी हुई है। अभी पिछले ही साल हमने देखा कि किस प्रकार से बोलीविया के राष्ट्रपति ईवो मोरालेस को उनके पद से बेदख़ल किया गया।   

क्यूबा में 1953 की क्रांति के बाद ऐसी कई समितियां बनायीं गयी थीं जो क्रांति की सुरक्षा और उसके फलने-फूलने के लिए थीं। इन समितियों का नाम था ‘कमेटी फॉर दी डिफेन्स ऑफ़ दि रेवोलुशन’ और ये समितियां मोहल्लों के स्तर पर कार्यरत थीं। वेनेज़ुएला की विकासशील क्रांति को भी विश्व भर की तरफ से ऐसी कई अंतरराष्ट्रीय समितियां चाहिए- चाहे वह किसी भी रूप में क्यों न हों- जो उसके दिखाये गये विकल्प को पूर्ण रूप से साकार होने में समर्थन प्रदान करें।  


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