कठघरे में मिलॉर्ड? न्यायपालिका से न्यायिक जवाबदेही का अभियान


28 मार्च 2025 को, विभिन्न आंदोलनों और समाज के विभिन्न वर्गों से 2600 से अधिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों, वकीलों, पत्रकारों, कलाकारों और चिंतित नागरिकों ने POCSO मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा हाल ही में जारी किए गए पुनरीक्षण आदेश (सं. 1449/2024 दिनांक 17 मार्च 2025) के बारे में भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा।

इस तथ्य का स्वागत करते हुए कि सर्वोच्च न्यायालय ने अंततः प्रतिगामी आदेश का स्वतः संज्ञान लिया है, यह कहते हुए कि यह आदेश ‘पूरी तरह से असंवेदनशील, अमानवीय’ और ‘कानून के सिद्धांतों से अनभिज्ञ’ था; पत्र में कहा गया है कि पुनरीक्षण आदेश संस्थाओं में सामान्य हो चुकी स्त्री-द्वेष की कई अभिव्यक्तियों में से एक है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर त्रुटि का संज्ञान लिया है, लेकिन यह मुद्दा अभी भी कानूनी संस्थाओं में बना हुआ है, इसलिये लैंगिक रूप से न्यायपूर्ण लोकतांत्रिक और न्यायसंगत संस्था में काम करने के लिए लैंगिक रूप से संवेदनशील बदलाव की ज़रूरत होगी।



पत्र में कहा गया है कि ‘समाज के साथ-साथ न्यायपालिका में भी सामाजिक रूप से कमजोर लोगों, खासकर महिलाओं के खिलाफ अपराध करने वालों को बचाने की एक चिंताजनक प्रवृत्ति है- चाहे वे घरेलू हिंसा, यौनम जातीय या सांप्रदायिक अपराधों की शिकार हों। यह निर्णय ऐसी प्रवृत्ति का एक खास घृणित उदाहरण है और इसके ज़रिये ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण व अनुचित प्रवृत्ति को मजबूत करने की संभावना है।’

पत्र में आगे मांग की गई है कि:

न्यायपालिका को यौन हिंसा और पीड़ितों पर होने वाले हमलों की सच्चाई के प्रति संवेदनशील होना चाहिए

हम पूरी दृढ़ता से आग्रह करते हैं कि यौन हिंसा के पीड़ितों और शिकार व्यक्तियों को न्याय देने से इनकार करते हुए अपने पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रह का प्रदर्शन करने वाले न्यायाधीशों को यौन अपराधों से सम्बम्धित मामले नहीं सौंपे जाने चाहिए।

इस पत्र का समर्थन पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज, फोरम अगेंस्ट ऑप्रेसन ऑफ विमेन, सहेली विमेंस रिसोर्स सेंटर, फेमिनिस्ट्स इन रेजिस्टेंस, बेबाक कलेक्टिव, उत्तरखंड महिला मंच, रिक्लेम द नाइट कैम्पेन, प. बंगाल, कैथोलिक एसोसिएशन ऑफ आर्चडायसीज ऑफ दिल्ली, ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव विमेंस एसोसिएशन, श्रुति डिसेबिलिटी राइट्स ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक विमेंस एसोसिएशन, नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन विमेन, बैलांचो साद, हजरत-ए-जिंदगी मामूली, ऑल इंडिया फेमिनिस्ट अलायंस (अलीफा-एनएपीएम) और कई अन्य समूहों व व्यक्तियों ने किया है।

अनेक संगठनों व व्यक्तियों के द्वारा गठित यह राष्ट्रीय मंच इस पहल के माध्यम से समस्त न्यायपालिका से न्यायिक जवाबदेही को लेकर एक दीर्घकालिक अभियान की शुरुआत कर रहा है।


फेमिनिस्ट्स फ़ॉर जुडिशियल अकाउंटेबिलिटी


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One Comment on “कठघरे में मिलॉर्ड? न्यायपालिका से न्यायिक जवाबदेही का अभियान”

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