मंटो की ‘सॉरी’ से अलग है बैतूल पुलिस की ‘मिशटेक’


एस.एच.ओ. ने दशकों पहले जो कहा था, वह गलत भी नहीं था। आखिर अभी हाल ही में बैतूल में जैसे ही दीपक बुंदेले ने कहा कि वह वकील हैं, पुलिस की लाठियां थम ही गई थीं। मध्यप्रदेश के बैतूल में। निगमन तर्कशास्त्र से हम इस सवाल पर पहुंच सकते हैं कि क्या वकील नहीं होना अपराध है? वैसे ही जैसे दशकों पहले, यहीं नयी दिल्ली में एक एस.एच.ओ. की एक टिप्पणी पर हम चकित थे कि क्या पत्रकार नहीं होना अपराध है? थाने पर धीरे-धीरे जमा हो गये पत्रकारों मे सबों को तो नहीं, पर कुछ को जरूर एस.एच.ओ. की टिप्पणी ने आश्चर्य में डाल दिया था। बेशक एस.एच.ओ., पत्रकारों के बढ़ते जमावड़े से दबाव में रहे होंगे, जमावड़े के साथ-साथ दबाव बढता भी गया होगा और शायद एक पुलिसवाले के हाथों पत्रकार की क्रूर पिटाई का कोई न कोई वाजिब तर्क ढूंढ लेने की उनकी अकुलाहट भी। यह एस.एच.ओ. की अकुलाहट ही रही होगी कि अपने कक्ष में नाराज और कई तो चीख रहे पत्रकारों को शांत करने की जुगत में उनके मुंह से बेसाख्ता निकला था, ‘‘बताया नहीं होगा इन्होंने कि ये पत्रकार है’’।

Madhya Pradesh: Cops apologise after beating up lawyer; say, we mistook you for a Muslim

बेसाख्ता इसलिए कि हमारे इस प्रतिप्रश्न पर कि ‘क्या पत्रकार नहीं होना भी आई.पी.सी.-सी.आर.पी.सी. की किसी धारा में जुर्म के तौर पर वर्गीकृत है’, वह शर्मिंदा दिखे थे, ‘मेरा मतलब यह था’, ‘मेरा मतलब वह था’ जैसे बगलें झांकते वाक्यांशों के साथ। यह शर्मिन्दगी दशकों बाद भी बदस्तूर है – समाज के शक्ति-संपन्न प्रोफेशनलों के साथ सलूक में चूक पर शर्मिन्दगी। जो पत्रकार हैं, जो वकील हैं, डॉक्टर हैं, अधिकारी हैं, धनाढ्य हैं, और सबसे अहम कि जो राजनीतिक नेता हैं, या नेता-पुत्र, इन और ऐसी कई अन्य श्रेणियों के गणमान्यों से सलूक की एक अलिखित संहिता है। चौथी सत्ता में होने का, वकील, डॉक्टर, अधिकारी, राजनेता, नेता-पुत्र आदि होने का यह जो महत्व-बोध है, केवल इन श्रेणियों के लोगों के दिलोदिमाग में नहीं, व्यवस्था के, सत्ता-तंत्र के लाठी-गोली संपन्न कारकूनों के भी जेहन में, उनके अवचेतन में बद्धमूल है। यह न होता तो वह टिप्पणी न आती। यह न होता तो बुंदेले के खुद को वकील बताते ही अनगिन पुलिसवालों की ढेर सारी लाठियां अचानक खामोश नहीं हो जातीं। यह न होता, तो केवल कुछ नहीं, सारे पत्रकार इस टिप्पणी पर चकित होते। शायद क्रुद्ध भी। पर रंज तो कुछ को ही हुआ था।

मुख्तसर में, घटना यों थी कि गाजियाबाद से यू.एन.आइ का एक पत्रकार बस से आकाशवाणी के स्टॉप तक आ रहा था। उतरने की तैयारी में वह एक स्टॉप पहले ही अगले गेट के पास आ खडा हुआ था। उस स्टॉप पर एक पुलिस वाला उतरा तो उसके धक्के से पत्रकार महोदय संभवतः गिर गये, या कि शायद गिरते-गिरते बचे। सत्ता और ताकत सिर पर चढ़ जाये, तो वह आपके उठने-बैठने, बोलने-चालने, चढने-उतरने, सब में पैबस्त होती है। पुलिसवाले के भी हो गयी होगी और पत्रकार का जुर्म कि उसने पुलिसवाले को देख-संभल कर उतरने की सलाह दे दी। ऐसी हर छोटी से छोटी सलाह में गलत होने की विनम्र पूर्व-सूचना अन्तर्निहित होती है और सत्ता के लिए, शक्ति के लिये यह केवल और केवल द्रोह है, दंडनीय द्रोह, भले उसका दावा छप्पन इंच से बहुत-बहुत कम का भी हो। सो इतना काफी था। पुलिसवाले ने घसीटकर पत्रकार महोदय को नीचे उतार लिया, उनकी बेरहम पिटाई की और उन्हें पॉकेटमार बताकर इस अपराध में शिरकत के लिए बस-यात्रियों और राहगीरों की एक भीड़ का भी निर्माण कर लिया।

दादरी से लेकर पालघर तक, पिछले वर्षों में जो कुछ बार-बार सामने आता रहा है, वह भीड़ निर्माण की इस तकनीक को पूरी तरह साध लेने, उसमें विशेषज्ञता पा लेने भर के प्रमाण नहीं हैं, बल्कि डेडीकेटेड आइ.टी. सेलों के निर्माण, ट्विटर, ह्वाट्स-ऐप, फेसबुक जैसे सोशल मीडिया के इस्तेमाल और मीडिया की मुख्यधारा के अधिकांश को इस एजेंडे में जोत देने की भी दक्षता हासिल कर लेने का सबूत है।

बहरहाल, वह शायद 1993-94 का कोई समय रहा होगा। पी.वी. नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे। झारखंड तो तब बना भी नहीं था और 2000 में बने इस राज्य में दुमका की एक चुनावी रैली में ‘नागरिकता कानून का विरोध करने, बल्कि आगजनी करने वालों को उनके कपड़ों से पहचानने-पहचनवाने की अलख जगाते पी.एम.’ को तो तब देश इतना ही जानता था कि वह 1990 में सम्पन्न लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा में अधिकांश वक्त सारथी की भूमिका में था। मिथक के दबाव से मुक्त होकर कहें तो सहयोगी भूमिका में। बाबा तुलसीदास ने तो ‘रावण रथी, विरथी रघुवीरा कहा है, पर राममंदिर के पैरोकार रथ पर थे – सोमनाथ में 25 सितम्बर 1990 से 23 अक्टूबर 1990 में समस्तीपुर में गिरफ्तारी तक और करीब 1200 किलोमीटर की इस यात्रा में अधिकांश समय मोदी उनके साथ थे।    

तो जिसे खुद रथी ने भस्मासुर बना दिया था और तिलोत्तमा हो जाने की रणनीतियों से नावाकिफ होने के कारण जिसे राख में बदला जा चुका है, उसी के एक समय विनम्र सहकारी रहे नेता ने 15 दिसम्बर 2017 की उस रैली में क्या कहा था, याद कीजिए। उन्होंने कहा था, ‘‘साथियों आपने समाचारों में देखा होगा, कि हमारे देश की संसद ने अभी नागरिकता कानून से जुडा एक महत्वपूर्ण बदलाव किया। और इस बदलाव के कारण पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान से, जो वहां लघुमति में थे, वो अलग धर्म का पालन करते थे, अलग पंथ के अनुयायी थे, इसलिए वहां उन पर जुल्म हुए, उनका जीना मुश्किल हो गया, उनकी बहन-बेटियों की इज्जत मुश्किल हो गयी। ये तीन देशों से हिन्दू, ईसाई, सिख, पारसी, जैन, बौद्ध – उनको वहां से अपना गांव, घर, परिवार, दोस्त, यार – सब कुछ छोड़कर के, भारत में भाग कर के, यहां शरणार्थी की जिंदगी जीने के लिए मजबूर होना पड़ा। उनके जीवन को सुधारने के लिए, इन गरीबों के प्रति सेवाभाव से, उनको सम्मान मिले, इसलिये भारत के दोनों सदनों ने, भारी बहुमत से, इन गरीबों के लिए निर्णय किया, नागरिकता का निर्णय किया। लेकिन ये कांग्रेसवाले और उसके साथी क्या कर रहे हैं? हो-हल्ला मचा रहे हैं, तूफान खड़ा कर रहे हैं, और उनकी बात चलती नहीं है, तो आगजनी फैला रहे हैं। भाइयों और बहनों! ये जो आग लगा रहे हैं, टी.वी. पर उनके जो दृश्य आ रहे हैं, ये आग लगाने वाले कौन हैं, वो उनके कपड़ों से ही पता चल जाता है।’’

यह अकारण नहीं है कि दीपक बुंदेले वकील होने की बात कह कर पुलिस की बेरहम पिटाई से निजात भले पा गये हों, पता यह चला है कि उनकी पिटाई मुसलमान समझ लिए जाने के ‘मिशटेक’ के कारण हुई थी। पिछली 17 मई को इस मामले में बयान लेने बुंदेले के घर पहुंचे पुलिसवालों की उनसे बातचीत की अभी-अभी सामने आयी एक आडियो रिकार्डिंग के अनुसार पुलिसवालों ने उनसे मामले को रफा-दफा करने का अनुरोध करते हुए बार-बार कहा कि उन्हें वकील होने के कारण नहीं पीटा गया, दरअस्ल उनकी लम्बी दाढ़ी देखकर पुलिस ने उन्हें मुसलमान समझ लिया था, वरना यह सब नहीं होता। शायद यह भी इत्तफाक न हो कि बुंदेले की पिटाई ठीक उस शाम हुई, जब मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया की अगुवाई में कांग्रेस के कई विधायकों के इस्तीफे की बदौलत सत्ता परिवर्तन का प्रहसन, सी.एम. के तौर पर शिवराज सिंह चौहान के शपथ-ग्रहण के साथ सम्पन्न हो रहा था।

खबर है कि पुलिस इस प्रकरण में ‘सॉरी’ तक कहने को तैयार है। लेकिन क्या बुंदेले की धार्मिक पहचान को लेकर भ्रम उतना ही बड़ा सच था, जितना कि वह मंटो की कहानी ‘सॉरी’ में है?

सआदत हसन मंटो के ‘दस्तावेज, खंड-दो’ में यह एक छोटी सी कहानी है- भारत में हिंदु और इस्लामी- दो राष्ट्रों की मौजूदगी के सिद्धांत के साथ परवान चढ़ी विभाजन की परियोजना संपन्न होने के वक्त साम्प्रदायिक फसाद और कत्ल-ओ-गारद से बनते ‘स्याह हाशिये’ की एक छोटी सी कहानीः

छुरी
पेट चाक करती हुई
नाफ के नीचे तक चली गयी।
इजारबंद कट गया।
छुरी मारनेवाले के
मुंह से
दफ्अतन
कल्मा-ए-तअस्सुफ निकला
‘‘च च च…. मिशटेक हो गया!’’

क्या हम साम्प्रदायिक जुनून के उसी, 73 साल पीछे के दौर में धकेल दिये गये हैं? पर वहां तो मिशटेक, उन्मादी भीड़ कर रही थी, सत्ता और सत्ता-तंत्र नहीं।


राजेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और लंबे समय तक यूनीवार्ता से सम्बद्ध रहे हैं


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