राग दरबारी: क्या सरकार इतनी अराजकता चाहती है कि अबकी आसानी से शहर वापस ही न जाएं मजदूर!


मार्च की 18 तारीख को देश के प्रधानमंत्री लोगों से यह अपील करने आए कि 22 मार्च को पूरे देश में जनता कर्फ्यू लगाया जाएगा. फिर उसकी सफलता से गदगद होकर 24 मार्च को शाम के आठ बजे फिर से टीवी पर अवतरित हुए और घोषणा कर दी कि चार घंटे के बाद मतलब रात के 12 बजे पूरे तीन हफ्ते मतलब 21 दिनों तक पूऱे देश में कर्फ्यू लागू कर दिया जाएगा. जो लोग जहां हैं वहीं रहें, सड़क पर न निकलें. उन्होंने इस बात को पिछली बार की तरह दोहराया कि कोरोना संकट से निपटने के लिए यही एकमात्र उपाय रह गया है. जिस तरह 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी की घोषणा के बाद एटीएम के सामने लोगों की लंबी कतार लग गयी थी, उसी तरह प्रधानमंत्री की उस घोषणा के बाद पूरे देश में हर राज्य के बॉर्डर पर कतार लग गयी. एक अनुमान के मुताबिक पूरे देश में लगभग 48 करोड़ प्रवासी मजदूर हैं जो रोजी-रोटी के लिए अपने राज्यों से बाहर निकलते हैं. इन 48 करोड़ लोगों में तीस फीसदी वैसे लोग हैं जिन्हें हर दिन काम मिलता है लेकिन वे स्थायी नौकरी पर नहीं होते हैं. 

इसी तरह भारतीय रेलवे के आंकड़े के मुताबिक भारतीय रेल हर दिन 13,452 ट्रेन चलाती है जिसमें औसतन 2 करोड़ 30 लाख यात्री रोजाना यात्रा करते हैं. अब अगर इस आंकड़े को थोड़ा कम कर के देखें और मान लें कि भारतीय रेलवे हर दिन 12 हजार ट्रेन चलाती है जिसमें औसतन 15 करोड़ लोग यात्रा करते हैं तो हर दिन करीब 1.8 करोड़ यात्री अपने गंतव्य स्थान पर आसानी से पहुंच सकते हैं.  इस आंकड़े के मुताबिक अगर सरकार चाहती तो आसानी से हर दिन पौने दो करोड़ लोगों को उनके गंतव्य तक पहुंचा सकती थी.

जिस दिन लॉकडाउन का फ़रमान जारी किया गया उस दिन को याद कीजिए, तो आपको पता चलेगा कि 24 मार्च को ऑफिशियली सिर्फ 60 लोग कोरोना से प्रभावित थे. अगर प्रधानमंत्री इसकी सफलता का श्रेय खुद न लेने की कोशिश करते तो हर दिन हो रही मजदूरों की त्रासदी को कम किया जा सकता था. भारतीय मीडिया ने जिस रूप में सरकार के सामने सरेंडर किया है या जिस तरह सरकार ने मीडिया पर कब्जा कर लिया है, उस स्थिति में कहीं प्रवासी मजदूरों की समस्या के लिए सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा रहा है। उल्टे मोदी सरकार के पक्ष में सर्वेक्षण किया जा रहा है जिसमें बताया जा रहा है कि कोरोना से पहले मोदी की लोकप्रियता 72 फीसदी के करीब थी जो अब बढ़कर 94 फीसदी के करीब पहुंच गयी है. जबकि हम जानते हैं कि देश के हर स्वायत्त संस्थान को मोदी सरकार ने अपने नियंत्रण में ले लिया है.

सचमुच मोदी मजदूरों के हिमायती थे? 

क्या आपको लगता है कि यह सिर्फ मोदी सरकार की विफलता थी जिसके चलते मजदूरों को चौथे चरण के लॉकडाउन के बाद भी दर दर की ठोकरें खाने को बाध्य होना पड़ रहा है या फिर एक सोची समझी साजिश थी जिसका परिणाम वे मजदूर भोग रहे हैं?

मोदी सरकार का दूसरा कार्यकाल शुरू होने के तत्काल बाद मौजूदा रेल व वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने बयान दिया था कि जब तक भारत में मजदूर सस्ता नहीं होगा हम चीन से मुकाबला नहीं कर सकते हैं. पीयूष गोयल ने यह बयान एक बार नहीं बल्कि कई बार दिया. अब इस बात को थोड़ा विस्तार से समझने की कोशिश करें. 

मोदी सरकार की मशीनरी और गुलाम मीडिया इस बात को जितना भी छुपाने की कोशिश करे, हकीकत तो यही है कि कोरोना के मामले में ही नहीं बल्कि मजदूरों के पलायन को ठीक से हैंडिल करने में भी मोदी सरकार पूरी तरह असफल रही है. लेकिन इसे असफल तभी कहा जा सकता है जब हम यह मान रहे हैं कि मोदी सरकार इस परिस्थिति से मुकाबला ठीक से नहीं कर सकी.

अगर इस सवाल को उलट दें और पूछे कि क्या सचमुच मोदी सरकार इस समस्या से निपटना चाह रही थी तो इसका जवाब यह है कि सरकार चाहती थी कि इतनी अराजकता हो कि मजदूर अगली बार इतनी आसानी से गांव से शहर की ओर न लौटे. 

अब उन मजदूरों के बारे में सोचिए जो पिछले कई वर्षों से हर साल मजदूरी करने के लिए शहर आते थे और कमाकर कुछ दिनों के लिए लौटकर अपने गांव आ जाते थे. अब वे मजदूर इतनी परेशानी झेलकर फिर से कई दिनों की यात्रा करके अपने घर लौटे हैं या लौट रहे हैं- क्या वे फिर इस पीड़ा को इतनी जल्दी भूल जाएंगे और तत्काल शहर लौटकर आ पाएंगे? 

क्यों हुआ था पलायन?

गांव से पलायन करके शहर आये मजदूरों की सामाजिक पृष्ठभूमि को देखें तो हम पाते हैं कि वे मजदूर शहर पलायन करके आये थे जो खेतों में कड़ी मेहनत करके भी अपने परिवार का पालन-पोषण नहीं कर पा रहे थे. तीस-पैंतीस साल पहले ये मजदूर साल में एक बार आते थे और फिर बचा हुआ समय अपने गांव में ही बिताते थे. बाद में उन्होंने दो बार शहर आना शुरू किया और चार-पांच वर्षों के बाद वे स्थायी रूप से शहर में ही बस गये. अब वे तीज-त्योहार में अपने घर जाने लगे. कुल मिलाकर वे पूरी तरह प्रवासी मजदूर बन गये.

जब तक वह मजदूर गांव में रहा, उसे खाने में परेशानी होती थी, जातिगत आधार पर उनको अपमानित किया जाता था, सांमती उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था और उनके साथ हिंसा भी होती थी. एक बार जब वह गांव से निकलकर शहर की तरफ आ जाता तो उसे न्यूनतम स्तर पर जातिगत भेदभाव या सामंती उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था. हिंसा काफी हद तक घट जाती थी या वह दूसरे कारणों से होती थी.

कोरोना के चलते हुई घर वापसी से वर्षों बाद एक बार फिर से उसे उसी सामंती और जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ेगा जो उसके बाप-दादाओं ने सहा था. फिर से गांव में दबंग जाति या सामंती गुंडों का अत्याचार उन मजदूरों को सहना पड़ेगा. दूसरी तरफ वर्तमान समय में गांवों के आर्थिक हालात इतने भयावह हो गये हैं कि गांव लौटे प्रवासी मजदूरों को फिर से आधी मजदूरी पर काम करने को तैयार होना पड़ेगा और काम के घंटे तो वैसे ही अधिकतर राज्य सरकारों ने बढ़ा दिये हैं, इसलिए काम भी ज्यादा करना होगा. 

साल भर अपने गांव में रुकने के बाद मजदूर गांव से हताश होकर एक बार फिर जब शहर का रूख करेंगे तब उनके पास रोजगार के अवसर तो कम होंगे ही, वे कम मजदूरी पर भी काम करने को तैयार रहेंगे. शहर में होने का एक अतिरिक्त लाभ यह हो सकता है कि उन्हें जातिगत-सामंती भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ेगा. इसलिए कम मजदूरी मिलने के बाद भी वे यहीं काम करना चाहेंगे. 

मशहूर कथाशिल्पी फणीश्वरनाथ रेणु ने वर्षों पहले पटना की बाढ़ पर ‘ऋृण जल धन जल’ शीर्षक से एक रिपोर्ताज लिखी थी. उसमें उन्होंने लिखा था कि बाढ़ की विभीषिका किस तरह बहुसंख्य लोगों के लिए विपदा लेकर आती है लेकिन चंद लोगों के लिए सुनहरे अवसर लेकर भी आती है. मेरे हिसाब से मोदी व उद्योगपतियों के लिए कोविड- 19 भी एक अवसर लेकर आया है. 


लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं


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