राग दरबारीः पंत से लेकर अंत तक राजसत्ता की मज़हबी जंग के सात दशक


इस साल की शुरूआत कुछ विचित्र तरह से हुई है. लगभग सौ वर्षों के बाद देश अलग तरह की महामारी कोरोना का सामना कर रहा है. पूरी दुनिया में लगभग ढ़ाई लाख से अधिक लोग इस बीमारी से मारे गये हैं जबकि भारत में कम से कम 1600 लोगों की मौत हो चुकी है. हर शहर से मजदूरों के फंसे होने की खबरें आ रही हैं, जो हर हाल में अपने वतन वापस लौटना चाह रहे हैं. जिस दिन तीसरी बार लॉकडाउन को बढ़ाने की बात हुई, उसी दिन सरकार की तरफ से लॉकडाउन में आंशिक छूट देने की बात भी हुई, लेकिन कुछ अलग तरह का तुग़लकी फ़रमान जारी हो गया. मीडिया में जो खबरें छनकर आ रही हैं वे महामारी की तरह ही भयानक है.

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक कोरोना लॉकडाउन के बाद लगभग 800 नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) विरोधी प्रदर्शनकारियों को या तो हिरासत में लिया गया है या फिर गिरफ्तार कर लिया गया है. दिल्ली में ही, शाहीनबाग सहित जगह-जगह हो रहे आंदोलनों का नेतृत्व कर रहे अनेक मुसलमान युवा-युवतियों को सरकार ने गिरफ्तार किया है. जामिया कोऑर्डिनेशन कमिटी (जेसीसी) की सदस्य सफ़ूरा ज़रग़र को तीन महीने का गर्भ होने के बावजूद गिरफ्तार किया गया है. इसी तरह दिल्ली के खुरेज़ी में पूर्व नगर पार्षद इशरत जहां को महीने भर से अधिक समय से जेल में बंद कर के रखा गया है. यह भी कहा जा रहा है कि उन्हें हिरासत में लगातार यातनाएं दी जा रही हैं. उनके साथ खालिद सैफ़ी को भी पुलिस हिरासत में बुरी तरह यातनाएं दी गयी हैं.

सफ़ूरा ज़रगर

इनके अलावा अनेक छात्र व राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं को झूठे आरोप लगाकर जेल में डाल दिया गया है. छात्र राजद के अध्यक्ष मीरन हैदर, जेएनयू के प्रतिभाशाली छात्र शरजील इमाम को महीनों से तरह-तरह के आरोपों में जेल में बंद करके रखा गया है जबकि उसने एक नागरिक के रूप में लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग किया था. जेएनयू के पूर्व छात्र व मार्क्सवादी नेता उमर ख़ालिद पर भी यूएपीए जैसे संगीन आरोप लगाये गये हैं. यूएपीए वैसा कानून है जिसमें शक़ के आधार पर किसी को भी बिना सबूत के आतंकवादी घोषित किया जा सकता है. इसके तहत व्यक्ति का आतंकी संगठन से संबंध स्थापित करने की भी कोई आवश्यकता नहीं पड़ती है. इसका मतलब यह हुआ कि निर्दोष साबित न होने तक आरोपी पर आतंकी का टैग लगा दिया जाता है और इसे हटवाने के लिए सरकार द्वारा बनायी गयी रिव्यू कमिटी के सामने ही जाना पड़ता है. वर्तमान सरकार में मुसलमानों के हालात कितने भयावह बना दिये गये हैं, इसका अंदाजा हम सिर्फ इस बात से लगा सकते हैं कि दिल्ली पुलिस ने दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष जफ़रुल इस्लाम खान के उपर भी राजद्रोह का मुकदमा दायर कर दिया है.

लखनऊ से दिल्ली तक पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर आरोपों की निंदा

कोरोना महामारी की विभीषिका को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि महामारी के दौरान जेलों में बन्द कैदियों को पैरोल पर रिहा किया जाए ताकि जेलों के अन्दर संक्रमण फैलने से रोका जा सके. इतना ही नहीं, चीफ़ जस्टिस बोबडे ने सभी राज्य सरकारों को यह आदेश भी दिया था कि वे एक उच्चस्तरीय कमेटी बैठाएं जो यह निर्धारित करे कि कैदियों को पैरोल पर या अंतरिम ज़मानत पर छोड़ने के लिए क्या मापदंड होंगे? सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश देते हुए यह साफ कर दिया था कि ऐसे कैदियों को पैरोल दी जा सकती है जिन्हें सात साल तक की सज़ा हुई है या जो ऐसे मामलों में बन्द हैं जिसकी सज़ा सात साल तक है. केन्द्र सरकार इसके ठीक उलट न केवल सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना कर रही है बल्कि उसके आदेश पर दिल्ली सहित बीजेपी शासित उत्तर प्रदेश में व्यापक स्तर पर चुन-चुन कर मुसलमान नागरिकों को जेल में डाल रही है. 

आला अदालत के आदेश के बाद भी जेलों की भीड़ क्यों नहीं कम की जा रही है?

दिल्ली और उत्तर प्रदेश में जो हालात बना दिये गये हैं वे इस समस्या के विकरालता को बयां करते हैं. दिल्ली में सरकार भले ही अरविंद केजरीवाल की है लेकिन पुलिस सीधे तौर पर गृहमंत्री अमित शाह के अधीन है. पूरे देश में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद अल्पसंख्यकों को लगातार निशाने पर लिया जा रहा है. जगह-जगह अलग-अलग बहाने बनाकर उन्हें हिंसा का शिकार बनाया जा रहा है या फिर सीधे तौर पर पुलिस उन पर जबरिया कार्रवाई कर रही है. उत्तर प्रदेश में 76 वर्षीय वकील मोहम्मद शोएब को पुलिस ने दो-दो बार कई झूठे व मनगढ़ंत आरोपों में गिरफ्तार किया. कुछ जानकारों के अनुसार पुलिस धार्मिक आधार पर उनके साथ गाली-गलौज कर रही थी. दि हिंदू के पत्रकार उमर राशिद के बयानों में भी यही बात सामने आयी है जिन्हें पुलिस ने बीच सड़क से उठा लिया था.

उसी तरह दिल्ली में फरवरी में हुए नरसंहार में पुलिस मुसलमानों के खिलाफ मोर्चा खोले हुई थी और हिंसा में हिंदुओं को मदद कर रही थी. दंगे के बाद संसद में गृहमंत्री ने कहा था कि अपराधी जो भी होगा उसे बख्शा नहीं जाएगा लेकिन जब पुलिस कार्रवाई की बात हुई तो चुन-चुनकर मुसलमानों को गिरफ्तार किया जा रहा है या फिर उन्हें विभिन्न तरह की धाराओं में आरोपित किया जा रहा है. इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर अमित शाह सचमुच ‘सबके ऊपर’ कार्रवाई करना चाह रहे हैं या थे तो कम से कम भारतीय जनता पार्टी के नए हिन्दू हृदय सम्राट कपिल मिश्रा को जरूर गिरफ्तार करते जिसके बयान पर हिंसा भड़की थी. उसी तरह अपनी पार्टी के सासंद प्रवेश वर्मा और केन्द्रीय राज्य मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर के उपर भी कार्रवाई की जानी चाहिए थी क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जिन्होंने खुलेआम मुसलमानों के खिलाफ हिंसा भड़काने में मदद की थी. इतना ही नहीं, सीएए के खिलाफ शाहीनबाग और जामिया में जाकर गोली चलाने वाले गोपाल शर्मा और कपिल गुर्जर को तत्काल छोड़ दिया गया.

शाहीनबाग में योगेंद्र यादव

अगर हम शाहीनबाग के सीएए विरोधी प्रदर्शन के गौर से देखें तो पाते हैं कि जगह भले ही शाहीनबाग रही हो, लेकिन उसमें शामिल होने वालों और समर्थन देने वालों में पूरी दिल्ली के बुद्धिजीवी शामिल थे. जो लोग वहां के प्रदर्शनकारियों के साथ मिलकर लगातार काम कर रहे थे उनमें हर्ष मंदर, अपूर्वानंद, योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण, वृंदा ग्रोवर जैसी बड़ी व महत्वपूर्ण सामाजिक व राजनीतिक हस्तियां शामिल थीं लेकिन पुलिस कार्यवाही की बात हुई तो गिन-गिनकर मुसलमानों को निशाना बनाया गया. हां, राज्यों में धार्मिक आधार पर इस तरह की चुनिंदा की कार्यवाही देखने को नहीं मिली यह भी सच बात है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी और लखनऊ में जिन लोगों पर मुकदमे दायर किये गये वे हिंदू और मुसलमान दोनों थे और कुछ एफआइआर में तो हिंदुओं और खासकर ब्राह्मणाें की संख्या ज्यादा थी। केंद्र के तहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस हालांकि इस मामले में एकतरफ़ा दिखी है।

केंद्र सरकार द्वारा इस तरह की कार्यवाही किये जाने का मतलब बहुत साफ़ है. सरकार आम हिन्दुओं के मन में यह धारणा बैठा देना चाहती है कि अगर कुछ गड़बड़ी हो रही है तो इसके लिए पूरी तरह मुसलमान जवाबदेह है. सरकार शायद यह सोचती है कि जिस रूप में मीडिया को नियंत्रित किया जा चुका है वैसी स्थिति में एक समुदाय के खिलाफ घृणा का माहौल तैयार करके हिन्दुओं को अपने पक्ष में गोलबंद किया जा सकता है. इसी को ध्यान में रहकर वह तरह-तरह के हथकंडे भी अपना रही है. अगर सीएए के खिलाफ किसी हिन्दू पर मुकदमा दायर होगा तो सरकार बहुसंख्य हिन्दुओं को यह मैसेज देने में असफल हो जाएगी कि सीएए का विरोध मुसलमानों के अलावा बहुत से हिन्दू या अन्य लोग भी करते रहे हैं.

ऐसा नहीं है कि नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के पहले अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव नहीं होता था. मुसलमानों के साथ भेदभाव की कहानी तो बहुत ही पुरानी है. देश की आजादी के समय से ही मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव होना शुरू हो गया था. इसका स्पष्ट विवरण मशहूर राजनीति वैज्ञानिक पॉल आर. ब्रास ने अपनी किताब में विस्तार से किया है. चरण सिंह की दो भागों में लिखी जीवनी (एन इंडियन पोलिटिकल लाइफ, सेज प्रकाशन) के पहले भाग में पॉल ब्रास बताते हैं कि जब देश आजाद हुआ तो उत्तर प्रदेश के पुलिस-प्रशासन में मुसलमानों की भागीदारी जनसंख्या के अनुपात से अधिक थी लेकिन कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने वैसी नीति बनाई जिसमें मुसलमानों की संख्या घटने लगी, जिसमें तत्कालीन गृहमंत्री रफी अहमद किदवई ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी.

पॉल ब्रास के अनुसार, पंडित पंत की नीति का ही यह परिणाम था कि आने वाली आधी शताब्दी तक मुसलमानों की भागीदारी उत्तर प्रदेश की सरकारी सेवाओं और पुलिस में लगातार कम होती चली गयी.

राजसत्ता की परेशानी यह है कि सांप्रदायिकता के आधार पर हिन्दुओं की गोलबंदी करने में वह इतना मशगूल है कि वह समझ नहीं पा रही है कि अगर अल्पसंख्यकों का विश्वास पूरी तरह से उससे उठ जाएगा तो क्या-क्या अनहोनी हो सकती है! ज्यों-ज्यों सरकार ‘रूल ऑफ लॉ’ से दूर हट रही है, वह देश को अलग तरह की मुसीबत में धकेल रही है.


लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं


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8 Comments on “राग दरबारीः पंत से लेकर अंत तक राजसत्ता की मज़हबी जंग के सात दशक”

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