गाहे-बगाहे: वो फ़िराक़ और वो विसाल कहाँ…


बहुत दिनों से मेरे दिमाग में एक बात उमड़-घुमड़ रही है लेकिन संशोधनवादी हो जाने के डर के मारे कह नहीं पा रहा हूं. वह बात यह, कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय तमाम सारे लोगों को मिलाकर कोई ऐसा नागरिक मंच बनाया जाना चाहिए जो सामाजिक-राजनीतिक उत्पीडन, मानवाधिकार, जनता के मुद्दों, किसानों के सवालों, मजदूरों के सवालों और लोकतांत्रिक राजनीति आदि को लेकर इतनी बड़ी संख्या में सड़क पर उतरे कि बहरी से बहरी और बर्बर से बर्बर सरकारें भी चौकस होकर उसकी बात सुनने के लिए मजबूर हों. उसके पास इस देश की व्यापक आबादी से जुड़े मुद्दे हों और उनको लेकर सतत संघर्ष करने का माद्दा हो. वह उन संकीर्णताओं से ऊपर हो जिससे अमूमन धर्मनिरपेक्ष और वामपंथी संगठन भरे रहे और एक समय ऐसा आया कि वे जनता से बहुत दूर होते गए और उनकी कतारें कन्फ्यूजन का शिकार होकर प्रतिगामी ताकतों के झांसे में चली गईं.

वह मंच ऐसा हो जिसके पास जन समाजों की वास्तविक तकलीफों का ब्यौरा हो और उनकी ज़िन्दगी और हालात के अधिकतम सही डाटा हों. उसके पास लोक का वैभव हो और प्रतिरोध की संस्कृति और इतिहास की समझ हो. जाति और धर्म की जटिलताओं की इतनी गहरी समझ हो कि वह इस मामले में प्रगतिशीलता का एक नया छद्म रचने की जगह इसकी वास्तविकताओं को समझे. उनसे भिड़े और विवादों-संवादों के उठान तक जा सके. वह उन बेईमानियों और मुँहचोरियों की बेबाक आलोचना कर सके जो पहले से होती आई हैं. उसके पास ऐसी व्यापक समझ हो कि वह किसी भी तरह के तुष्टिकरण और अवसरवाद को पहचान सके. सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक संघर्षों के उन व्यक्तियों को उचित सम्मान दे सके जिन्होंने पूरा जीवन लगा देने के बावजूद इतिहास से बहिष्कार के सिवा कुछ नहीं पाया. यह मंच जनता के संघर्षों और अधिकारों के साथ ही अपने दौर के राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक योद्धाओं के जीवन और सम्मान के प्रति भी सचेत और सक्रिय हो जिससे प्रतिरोध की परम्परा अतीत न बन जाए.

हाल के दिनों में सबसे अधिक ह्रदय-विदारक मुद्दा कॉमरेड वरवर राव के स्वास्थ्य को लेकर उठा है और उनके जीवन को लेकर एक बेचैनी और आशंका तमाम साथियों के मन में है कि पता नहीं उनके साथ क्या हो. उनके बारे में सूचना के लिए एकमात्र सक्रिय साधन सोशल मीडिया है जिसके माध्यम से वरवर राव के बारे में लगातार डरावनी खबरें आ रही हैं. वे स्मृतिभ्रंश के शिकार हो रहे हैं और अवचेतन में पैठी घटनाओं का ज़िक्र कर रहे हैं. अपनी दैनिक क्रियाएं– नहाना-धोना और खाना भी उनकी चेतना से छूट रहा है. वे कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं. जेल में उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है. अंततः जेल प्रशासन ने उन्हें मुंबई के जे जे अस्पताल में भर्ती कराया है लेकिन जब उनसे मिलने घर के लोग अस्पताल पहुंचे तो वहां का दृश्य बहुत भयावह था. वे अकेले आइसोलेशन में अपने बिस्तर पर अचेत पड़े थे लेकिन उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था. उठने-बैठने में असमर्थ वरवर राव को पेशाब की हाज़त के समय किसी ने मदद नहीं की. वे पेशाब में भींगे हुए अपने बिस्तर पर थे. यह दृश्य जिन्होंने साक्षात् देखा उनके दिल पर क्या बीती होगी इसका तो सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है लेकिन यह सूचना पढ़कर मैं दुःख, ग्लानि और गुस्से से भर गया.

वरवर राव कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हैं बल्कि वे एक असाधारण कवि हैं. उनकी कविताओं में इंसानी आज़ादी की वह आवाज और सपना है जो उन्हें तेलुगु भाषा के एक महान कवि के रूप में प्रतिष्ठित करती है, लेकिन वे केवल धारदार शब्दों और बेधक बिम्बों के किताबी कवि भर नहीं हैं बल्कि सडकों पर उतरने वाले लड़ाकू कवि हैं. उनके पास विश्वविद्यालय की एक आरामदेह नौकरी थी और वे अपने दौर के लोकप्रिय शिक्षक रहे हैं लेकिन उन्होंने जनसंघर्षों की सड़क को हमेशा तरजीह दी. बेशक इसका एकमात्र परिणाम जेल था जिससे उन्होंने कभी भी मुंह नहीं मोड़ा. जेल जाने के मामले में वरवर राव नाजिम हिकमत, अर्नेस्ट जोन्स, बेंजामिन मोलाइस, फैज़ अहमद फैज़, अहमद फराज़, चेराबन्डा राजू जैसे कवियों की कतार में अन्यतम हैं. उनकी एक कविता ‘वेताल शव’ पुलिस उत्पीडन, थर्ड डिग्री और हिरासत में मौत का जीता-जागता दस्तावेज है. ज़ाहिर है वरवर राव बिना झुके इन हालात का सामना करने वाले कवि हैं. उनकी देह के घाव चेतना से क्रांति की चिंगारी बनकर कविता में उतरते रहे हैं.

इसीलिए दो साल पहले जब भीमा-कोरेगांव की सालगिरह पर हुए जनजुटान पर हिंसा भड़काने के फर्जी मुक़दमे लादकर उन्हें गिरफ्तार किया गया तब भी अपनी सदाबहार मुस्कान के साथ ही वे जेल गए. उनकी ज़मानत की अर्जी बार-बार ख़ारिज की गई.

वरवर राव एक क्रांतिकारी हैं. कविता उनके लिए क्रांति का हथियार है. 1973 से लेकर आज तक वे अनेक मामलों में जेल गए हैं. उनके ऊपर कई संगीन धाराएँ लगीं इसके बावजूद उनका मानवाधिकार ख़त्म नहीं हो जाता. वे एक सम्मानित शिक्षक और इस देश के वरिष्ठ नागरिक हैं. उनकी बीमारी में भी उनको जेल में रखने और मानसिक प्रताड़ना देने का कोई तर्क नहीं है. वे कोई आर्थिक अपराधी, तड़ीपार और दंगाई नहीं हैं और न ही उन्होंने किसी प्रकार से इस देश की साधारण जनता के बीच कोई झूठी बात की. न उन्होंने किसी जनविरोधी सरकार का समर्थन किया और न ही किसी प्रकार की सत्तालोलुपता को बढ़ावा दिया. वे तेलुगु साहित्य के अत्यंत प्रखर आलोचक और सामाजिक–राजनीतिक कार्यकर्ता हैं. देश भर में बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में उनका सम्मान है. बहुत बड़े कवि तो वे हैं ही. वे एक राजनीतिक बंदी हैं और गंभीर रूप से बीमार हैं इस नाते उनकी देखभाल का जिम्मा अधिक बड़ा हो जाता है. जबकि इसके उलट सचाई यह है कि हालात को अधिक जटिल बनाकर उनकी हत्या की कोशिश की जा रही है. लगता है भारत की वर्तमान सरकार और न्याय व्यवस्था इस बूढ़े और अशक्त कवि से इस कदर खौफ खाते हैं कि यदि इसकी रिहाई हो गई तो यह उनका तख्ता पलट देगा.

क्या मामला सिर्फ वरवर राव का ही है? वह तो उनकी तबियत ख़राब होने के कारण सामने बात आ गई लेकिन न जाने कितने ऐसे मुद्दे हैं जिनपर हमारी निगाह ही नहीं जाती. जिनको लेकर हमारे विचारों और दृष्टिकोण में कोई साफगोई ही नहीं होती. घटनाएँ घटती हैं और हम खामोश बने रहते हैं क्योंकि कोई न कोई ऐसा नैरेटिव हमारे दिमाग में भर चुका होता है कि ऐन सामने बहता हुआ खून हमारे लिए एक रंग से ज्यादा कोई महत्त्व नहीं रखता. कोरोना फैलने के बाद पिछले दिनों मजदूरों की पलायन की भयानक त्रासदी ऐसे ही गुजर गई और आमतौर पर इसे वोट की राजनीति से अधिक महत्त्व नहीं मिला. सड़क पर प्रसव करने के बाद साठ किलोमीटर की पैदल यात्रा करती हुई स्त्री या जनधन खाते में से पांच सौ रुपया निकालने के लिए पचास किलोमीटर पैदल जाने पर खाते में पैसा न आने की सूचना पाकर फिर पचास किलोमीटर पैदल लौटने वाली स्त्री की तस्वीर और कहानी कितनी देर तक हमारे मन में जगह बना सकी?

शायद यह सब तेजी से घटती घटनाओं के बीच मनुष्य के लगातार असहाय बनते जाने की घटनाओं में से एक छोटा सा हिस्सा था जिनकी व्यापक नोटिस ली जाती तब तक दृश्य पटल पर दूसरी घटनाएँ चली आईं. सर पर गठरी-मोटरी लादे मजदूरों का काफिला अभी ओझल भी नहीं हुआ था कि अच्छे-खासे मध्यवर्गीय कोरोना के इलाज के लिए अस्पताल दर अस्पताल चक्कर काटते और बिना किसी चिकित्सकीय सहायता के दम तोड़ते दिखे. असली दृश्य यह था और आने वाले दिनों में इसका सामना करना पड़ सकता है. इस सचाई ने हमारी संवेदनाओं को सोख लिया. हम राजनीतिक रूप से रोज़-ब-रोज़ बोले जाने वाले झूठ और सफलता की फैलाई जा रही बदहवासी को दिनचर्या में शामिल मान लेते हैं और उसके खिलाफ कोई मोर्चा नहीं खोलते. चुटकुलों और हँसी ही ही ठी ठी में अपनी भड़ास को निकालते हुए दिन गुजारते हैं. यह हमारे ख्याल में नहीं आता कि हमारे खिलाफ आज क्या एजेंडा सेट किया गया और कल हमारे जीवन से क्या छीन लिया जाने वाला है?   

इसलिए मुझे लगता है कि हमारी चुरा ली गई संवेदना और हड़प ली गई आज़ादी ने हमें इतना पंगु तो बनाया ही है कि विज्ञान और गणित के बावजूद और टेक्नोलाजी के भयंकर विस्तार के बाद भी हमारा कोई मूल्यवान तत्व खो गया है. हम वास्तव में चुप हो गए हैं. जैसे सामूहिकता गायब हुई तो आवाज भी गायब हो गई और बोलने का औचित्य भी. मुट्ठी भर लोग रह गए और बहुत सीमित चुने हुए मुद्दे बचे. और आवाज कहीं दूर से आ रही है.

शायद इसीलिए अपनी एक कविता ‘यथार्थ इन दिनों’ में मंगलेश डबराल कहते हैं कि– ‘एक मरा हुआ मनुष्य इस समय / जीवित मनुष्य की तुलना में कहीं ज्यादा कह रहा है / उसके शरीर से बहता हुआ रक्त /शरीर के भीतर बहते हुए रक्त से कहीं ज्यादा आवाज़ कर रहा है’।



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