बात बोलेगी: बिजली, पानी और बजटीय मद में 45 करोड़ की देशभक्ति भी मुफ़्त, मुफ़्त, मुफ़्त!


राष्ट्रवादी सरकार, राष्ट्रवादी चैनलों और खबरों, राष्ट्रवादी व्यापार और वाणिज्य, राष्ट्रवादी योगा और आयुर्वेद और तमाम ज़रूरी गैर-ज़रूरी, चर्चा में रहीं और चर्चा से बाहर चली गयीं तमाम राष्ट्रवादी बातों की घनघोर सफलता के बाद लीजिए पेश है राष्ट्रवाद का नया शाहकार -देशभक्ति के तेज़ जज्बे से बना, 24 कैरेट के देशभक्तों द्वारा बनाया गया, देशभक्ति की आक्रामक भावना से बना -शुद्ध देशभक्ति बजट।

वैसे तो भक्ति एक मूल्य है, एक भावना है और यह दिल दिमाग का खेला है और इसको मोनेटाइज़ यानी इसका मौद्रीकरण नहीं किया जा सकता है। अब तक ज्ञात अर्थशास्त्र के सिद्धांतों में बजट की ऐसी किसी मद के बारे में अल्प ही पढ़ा-सुना गया है, लेकिन राष्ट्रवादी नज़रिये से देखें तो यह गर्व का विषय है कि भारतवर्ष जैसे देश ने इस मूल्य या भाव का बाजाफ़्ता मदीकरण करने में सफलता अर्जित कर ली है। कोई महान देश एक दिन में ही तो विश्व गुरु नहीं बन जाता। बड़ी यात्रा की शुरूआत एक छोटा कदम उठाने से ही होती है। 2014 के बाद से ऐसे तमाम छोटे-छोटे कदम उठाए जा चुके हैं और एक आकलन के मुताबिक देश अब विश्व गुरु होने के मार्ग पर काफी दूर तक निकल चुका है। कम से कम इतना दूर तो निकल ही चुका है जहां से किसी यात्री के लौटने की संभावना कम हो जाती है। जितना वक़्त और श्रम लौटने में लगेगा और उतना ही मंज़िल पर पहुँचने में, तो क़ायदा यही कहता है कि पथिक मंज़िल की तरफ बढ़ना चाहेगा। यात्रा जारी है।

इस विषय पर हालांकि समकालीन इतिहाकारों और विद्वानों का ध्यान बहुत कम गया है या उनकी बौद्धिक मेधा से बाहर का यह मामला है, निश्चित तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन ऐसा कोई महत्वपूर्ण शोध अभी तक आँखों से नहीं गुज़रा कि 2014 के बाद देश में देशभक्ति की भावना का अचानक जो ह्रास हुआ है वह किन कारणों से हुआ। संभव है ह्रास न हुआ हो, बल्कि आने वाले समय की चुनौतियों को देखते हुए जिस तीव्रता की देशभक्ति की ज़रूरत देश को थी वो देश के खाते में थी नहीं और उसे बढ़ाने की ज़रूरत शिद्दत से महसूस की गयी हो।

अगर ऐसा न होता तो अमूमन हर सरकार इस पर इतना बल न देती। राजनयिक भाषा में कहें तो ‘दिल्ली’ की प्राथमिकता में देशभक्ति एक महत्वपूर्ण सरकारी मद के रूप में अपनायी जा चुकी है और यह शेष दुनिया के लिए एक कड़ा संदेश है।

450,000,000 अंकों में लिखी इस संख्या का शब्दों में कुल जोड़ 45 करोड़ होता है। इस रकम से 500 तिरंगे अर्द्ध-राज्य दिल्ली की प्रशासनिक सीमा के अंदर कुल 500 स्थानों पर लगाए जाएंगे। यानी एक तिरंगे का लागत मूल्य = 4,500,000,000/500= 900,000 रुपए। एक तिरंगे का लागत मूल्य 9 लाख रुपए। 500 ऐसे चुनिन्दा स्थान जहां से ये तिरंगे सभी को दिखायी दें। इन तिरंगों को देखकर दिल्ली की आधिकारिक-अनधिकारिक कुल आबादी के अंत:करण में देशभक्ति की भावना का प्रस्फुटन होगा।

इसमें 270 मीटर ऊंचाई के उन झंडों के प्रभाव को भी जोड़ा जाना चाहिए जो भारतीय जनता पार्टी के पहले कार्यकाल में मानव संसाधन विकास मंत्रालय की काबिल मंत्री स्मृति ईरानी ने राजधानी में अवस्थित तमाम केंद्रीय विश्वविद्यालयों व सार्वजनिक महत्व के स्थलों पर लगवाये थे। यह पुनीत कार्य हालांकि ‘हेल्थ इमरजेंसी’ की तर्ज़ पर जेएनयू में कथित तौर पर लगे नारों से हुई देशभक्ति की भावना की क्षतिपूर्ति के लिए आपात कार्यवाही के रूप में किया गया था। फिर भी उसका कुछ तो प्रभाव पड़ा ही होगा। संभाव है दिल्ली सरकार ने इस मामले पर वैज्ञानिक दृष्टि से सम्पन्न कोई शोध कराया हो (भाई पढ़े-लिखे लोग हैं सरकार में) और तत्पश्चात 500 ही स्थानों पर तिरंगा लगाने की ज़रूरत महसूस की हो। आखिर निश्चित तौर पर किसी संख्या तक पहुँचने के पीछे एक व्यवस्थित अध्ययन व शोध ज़रूरी होता है। दिल्ली सरकार को यह अध्ययन भी सार्वजनिक करना चाहिए। बहरहाल…

इसमें उन झंडों के प्रभाव को भी जोड़ा जाना चाहिए जो केंद्र-शासित प्रदेश दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में मौजूद तमाम सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले पूरी स्क्रीन पर लहराये जाते रहे हैं और झंडे के सम्मान में खड़ा होने की कसौटी पर खरा उतरते रहे हैं बल्कि कई ने तो उन दर्शकों को भी खड़ा होने पर मजबूर किया जो किसी शारीरिक बाधा के नाते खड़े नहीं हो सकते। इन बढ़े दर्शक समूह के ऊपर हालांकि कोई व्यवस्थित अध्ययन नहीं हुआ है लेकिन किया जा सकता है बल्कि किया ही जाना चाहिए कि उनकी देशभक्ति में कितनी गुणात्मक वृद्धि हुई।

यह अध्ययन अगर कोई करना चाहे तो सोदाहरण करे। मसलन, जब दर्शक ‘दबंग’ फिल्म में करीना कपूर को ‘चिपका ले सैयां फेविकोल से’ पर थिरकते देखते हैं और जब इस गीत का खास हिस्सा ‘मैं तो तंदूरी मुर्गी हूँ यार गटकाले सैयां एल्कोहाल से…’ आता है, तब उन पर क्या बीतती है और कैसे फिल्म शुरू होने से पहले तिरंगे के सम्मान में देशभक्ति का मुजाहिरा कर चुके देशभक्त के रूप में इस दृश्‍य-श्रव्य का सम्मिलित प्रभाव उसके मन-मस्‍तिष्क पर पड़ता है। एक प्रयोग भी किया जा सकता है, जैसे एक बार इसी गाने को बिना तिरंगे के सुनवा दिया जाये फिर उसके मनोविज्ञान को रिकॉर्ड किया जाए और एक बार तिरंगे की छाया में इसी महान गीत को सुनाया जाए और उसके प्रभावों को भी रिकॉर्ड किया जाए। इस तुलनात्मक अध्ययन को सार्वजनिक किया जाए।

अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है कि जब तिरंगे के उद्दीपन प्रभाव में इस गीत का रसास्वादन किया गया होगा तब कई देशभक्तों को स्क्रीन पर थिरकती करीना कपूर और कान में ऐसे महान गीत के बोल से दिल-दिमाग में किसकी छवि बन रही होगी। इसका भरपूर प्रचार प्रसार किया जाये। चीन, पाकिस्तान के बाद वैसे भी जापान से अपना कुछ खास बिगाड़ हुआ नहीं है। सात साल हो गए। नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार, भूटान सब तो ठिकाने लगा दिए। जापान के लिए खास पैकेज यही देशभक्ति हो सकती है। लगे हाथों उसकी भी वाट लग जाए तो क्या बुरा। और आखिर देशभक्ति या राष्ट्रवाद कहते किसे हैं। पड़ोसियों से खुद को श्रेष्ठ बताने का सबसे सस्ता रास्ता इसी देशभक्ति से जाता है।

केजरीवाल जी को देशभक्ति की भावना का मदीकरण करने के लिए बधाई तो खैर बनती ही है, लेकिन इस काम से ‘दिल्ली’ और ‘नई दिल्ली’ के बीच राजनैतिक रिश्तों में निकटता आएगी जिससे दिल्लीवासियों का अलग तरह से कल्याण होगा।

बिजली-पानी के साथ साथ अब देशभक्ति की मुफ्त डोज़। दिल्ली को देशभक्त होने से अब कोई नहीं रोक पाएगा। उम्मीद है जब इस महान कार्यक्रम का उल्लंघन दिल्ली के नागरिक करेंगे तो केजरीवाल जी की सरकार के कहने पर उनके नियंत्रण से बहरा बतलायी जाने वाली दिल्ली पुलिस उनके इशारों पर काम करेगी क्योंकि उसे ऐसा करने का अनुमोदन नई दिल्ली से एडवांस में प्राप्त होगा।

आज के बाद तिरंगामय इस दिल्ली में भय, भूख से मुक्ति की गारंटी दी जा सकती है, हालांकि देशभक्ति के इस मदीकरण की खबर का महत्व इस तेज़ भागती दुनिया में महज़ एक या दो दिन का ही है लेकिन इसके सबक को ठीक से समझा जाना चाहिए। जिस तरह कभी गोरख पांडे ने समाजवाद के आगमन की सूचनाओं को एक कविता में पिरोकर हाथी से, घोड़ा से, अँग्रेजी बाजा बजाते हुए, गांधी से, आंधी से, कांग्रेस से, जनता से, डॉलर से, रूबल से, लाठी से, गोली से इसके आने की बात कही थी, उसी तर्ज़ पर अब यह कहने का वक़्त आ पहुंचा है कि घनघोर, विकट और निकृष्टतम पूंजीवाद अन्य रास्तों या माध्यमों से कहीं ज़्यादा तिरंगे के रास्ते देश में आ चुका है।

कोई शक? (ताज़ा-ताज़ा कोबरा हुए एक नामचीन कलाकार का कालजीवी संवाद…!)



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