कोरोना के बाद क्या ‘विश्वग्राम’ की परिकल्पना यथावत बनी रहेगी? ललित सुरजन का अनुत्तरित सवाल


देशबंधु अखबार के प्रधान संपादक और हिंदी की आंचलिक पत्रकारिता में पुरानी पीढ़ी के सबसे सम्‍मानित व्‍यक्तित्‍वों में एक ललित सुरजन नहीं रहे। दिल्‍ली में सोमवार को हुए ब्रेन हैमरेज के बाद बुधवार शाम उनका निधन हो गया। इस बीच लंबे समय से वे दिल्‍ली में ही थे जहां उनका कैंसर का इलाज चल रहा था। रायपुर में आज उनका अंतिम संस्‍कार राजकीय सम्‍मान के साथ किया जाएगा। प्रेस और सत्तातंत्र के जटिल संबंधों पर देशबंधु से निकले अपने अनुभवों पर वे जून से ही एक श्रृंखला लिख रहे थे जिसका शीर्षक था: ‘’चौथा खंभा बनने से इनकार’’। इसकी 21वीं कड़ी उन्‍होंने 29 अक्‍टूबर को लिखी थी। इस श्रृंखला के पहले उनका आखिरी संपादकीय 9 अप्रैल, 2020 को कोरोना पर आया था। इस संपादकीय में उन्‍होंने कोरोना के बाद बनने वाली दुनिया को लेकर कुछ गंभीर सवाल उठाये थे। ये सवाल अब भी अनुत्‍तरित हैं। जनपथ अपने समय के इस महान संपादक प्रकाशक को श्रद्धांजलि देते हुए उनके सम्‍मान में उनका 9 अप्रैल को छपा संपादकीय पुनर्प्रकाशित कर रहा है।  

संपादक

मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. महातिर मोहम्मद ने सन् 1991 में मलय भाषा में ”वावासन 2020” अर्थात विज़न 2020 की अवधारणा पेश की थी। उस समय और उसके कई सालों बाद तक सारी दुनिया में इसे लेकर खूब बौद्धिक चर्चाएं हुईं। गो कि डॉ. मोहम्मद का विचार मुख्यत: अपने देश पर ही केंद्रित था। उनका सोचना था कि अगले तीस साल में याने सन् 2020 तक मलेशिया एक समृद्ध, सुखी देश के रूप में विश्व बिरादरी में अपनी जगह बना लेगा।

आंशिक रूप से भारतीय मूल (उनके दादा भारत से गए थे) के डॉ. मोहम्मद स्वयं एक नामी चिकित्सक थे और अपनी अवधारणा सामने रखते हुए उन्होंने नेत्रोपचार में प्रयुक्त 20:20 के पैमाने का इस्तेमाल किया था। 20:20 याने उत्तम नेत्र ज्योति याने आपकी आंखें बिलकुल ठीक हैं। एक प्रतिष्ठित राजनेता द्वारा दिए गए इस आइडिया को कुछ ही सालों बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्वास्थ्य क्षेत्र में लागू किया। उसने सन् 2020 तक पूरी दुनिया में शल्य चिकित्सा या उपचार से संभव नेत्र विकार दूर करने का लक्ष्य अपनाया। उसे भी विज़न 2020 नाम दिया गया। भारत भी इस मुहिम का हिस्सा बना।

यहां तक तो बात ठीक चली, लेकिन फिर क्या हुआ? डॉ. महातिर मोहम्मद 1980 से 2003 तक कोई तेईस साल मलयेशिया के प्रधानमंत्री रहे। उन्होंने 2018 में तेरानवे साल की उम्र में एक बार फिर देश की कमान सम्हाली। यह एक अभूतपूर्व राजनैतिक घटना थी। लेकिन क्या डॉ. मोहम्मद को स्वयं इस बात का कोई इल्म रहा होगा कि 2020 में उन्हें विपरीत परिस्थितियों में प्रधानमंत्री पद छोड़ने पर मजबूर होना पड़ेगा? खैर, इस नितांत व्यक्तिगत प्रसंग को छोड़ दें तो क्या दुनिया में कहीं भी, किसी को भी कोई अनुमान था कि सन् 2020 में इस तरह की परिस्थिति बन जाएगी, जिसकी अतिरंजित तुलना कुछ लोगों ने महाप्रलय तक से कर दी है?

कतिपय टीकाकारों ने कुछ वर्ष पूर्व बनी अंग्रेजी फिल्म ”कांटेजियन” का उल्लेख किया है कि उसमें ऐसी मानवीय त्रासदी घटित होने का पूर्वानुमान है। क्या सचमुच? मैंने चूंकि वह फिल्म नहीं देखी, इसलिए कोई टिप्पणी करना उचित नहीं है। किंतु मैं जानना चाहूंगा कि फिल्मकार ने किन्हीं विज्ञान-सम्मत सूचनाओं के आधार पर थीम विकसित की थी, या यह एक रचनाशील मस्तिष्क की कल्पना की उड़ान मात्र थी?

आखिरकार, कल्पना हमेशा सत्य से आगे चलती है। जैसा कि सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक जयंत नार्लीकर ने कभी लिखा था कि मनुष्य के हवा में उड़ने की कल्पना पहले आई और वायुयान बाद में बना। जूल्स वर्न ने भी तो अंतरिक्ष में जाने या समुद्र की अतल गहराइयों को नापने की कल्पना आज से दो सौ साल पहले कर ली थी। मुझे याद आता है कि 56-57 में सातवीं-आठवीं कक्षा में पढ़ते हुए ऐसी विज्ञान कथा पढ़ी थी कि एक दिन टेलीफोन पर बात करते हुए मनुष्य एक-दूसरे को देख सकेंगे। एक अन्य कथा में मैंने रोबो (रोबोट नहीं) या यंत्र मानव का वर्णन उन्हीं दिनों पढ़ा था। यह विषयांतर हो गया।

दरअसल मैं कहना चाहता था कि अपने जीवनकाल में ऐसी भीषण विपत्ति का सामना करना पड़ेगा, ऐसा ख्याल सपने में भी नहीं आया था। एक ओर नई सदी के प्रारंभ में सहस्राब्दि‍ लक्ष्य (एमडीजी) निर्धारित कर पंद्रह वर्षों के भीतर दुनिया के हर देश में उत्तम स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का संकल्प होता है, उसमें कमी रहने पर सतत् विकास लक्ष्य (एसडीजी) में उस संकल्प को दोहराया जाता है और दूसरी ओर अचानक नॉवल कोरोना वायरस या कोविड-19 आकर समूची मानवता पर राहु-केतू की तरह छा जाता है।

सवाल उठता है कि आगे क्या होगा? जैसा कि आज एक बच्चा भी जानता है कि कोरोना वायरस की कोई दवाई नहीं है और सिवाय ”सोशल डिस्टेंसिंग” याने सामाजिक दूरी बनाए रखने के अलावा इस वैश्विक महामारी से बचने का कोई उपाय नहीं है। हमारे शब्दकोश में कुछ नए शब्द जुड़ गए हैं।  कुछ लोगों का कहना है कि ”सोशल डिस्टेंसिंग” का प्रयोग उचित नहीं है। इसकी जगह ”फिजिकल डिस्टेंसिंग” का इस्तेमाल होना चाहिए। रोहित वेमुला की मां राधिका वेमुला ने भी यह राय सोशल मीडिया पर जाहिर की। उनकी बात एकबारगी ठीक लगती है।

बीमारी के भय से दो लोग आपस में दूरी बनाकर चलें तो यह ”फिजिकल डिस्टेंसिंग” याने शारीरिक दूरी बनाना ही है। सामाजिक दूरी से समाज में अलगाव का बोध होता है। यूरोप-अमेरिका में जिस किसी ने ”सोशल डिस्टेंसिंग” का इस्तेमाल किया उसने शायद अपने परिवेश को देखकर यह किया होगा, किंतु भारत की बात ही निराली है। यह पीड़़ादायी सच इस कठिन वक्त में भी दिन-ब-दिन प्रकट हो रहा है कि ”सोशल डिस्टेंसिंग” का ज़हर किस कदर हमारी सोच में घुला हुआ है!

कोरोना वायरस दुनिया पर कब तक कहर ढाता रहेगा, इस बारे में कुछ भी कहना मुश्किल है। इससे बचाव के लिए स्वास्थ्य विशेषज्ञों और नागरिक प्रशासन द्वारा हरसंभव प्रयत्न किए जा रहे हैं। प्रतिदिन परामर्श जारी हो रहे हैं। इनका पालन करना हर व्यक्ति के लिए श्रेयस्कर है। इतनी बड़ी दुनिया में कुछ अधिक बुद्धिमान लोग यदि टोने-टोटके भी प्रस्तावित करते हैं और आस्थावान लोग मन की शांति के लिए उनका पालन करते हैं तो इसमें भी कोई बुराई नहीं है।

यद्यपि विशेषज्ञों द्वारा जारी परामर्श का कोई विकल्प नहीं है। यह बात सब पर लागू होती है। गोमूत्र पीने वाले और गोबर से स्नान करने वालों पर, तबलीगी जमात में शामिल होने वालों पर, इजरायल के अतिरूढ़िवादी यहूदियों पर, द. कोरिया व सिंगापुर के चर्चों में ईशवंदना करने वालों पर, ऑस्ट्रेलिया के सागर तट पर मस्ती करने वालों पर, जापान में साकुरा उत्सव या चेरी ब्लॉसम के लिए इकट्ठा जनता पर भी। ब्राजील के बोल्सेनारो या अमेरिका के ट्रंप जैसे अदूरदर्शी, अहंकारी राजनेता ने इस साधारण सच्चाई को न समझने की आपराधिक लापरवाही बरती है।

सभ्यता के ज्ञात इतिहास में जब भी संकट के दौर आए हैं, उनसे उबरने के उपाय विवेक, बुद्धि, अनुभव और विज्ञान इन सबका सम्यक उपयोग करके निकाले गए हैं। प्लेग हो या चेचक, फ्लू हो या पोलियो, देर-अबेर इनकी काट वैज्ञानिकों ने ढूंढी है। नई दवाएं और टीके ईजाद हुए हैं। कल और आज में बड़ा फर्क यह है कि परिवहन व संचार साधनों में प्रगति के चलते दुनिया के देश-समाज एक-दूसरे के निकट आए हैं। उसके अनुकूल परिणाम देखने मिले हैं तो प्रतिकूल नतीजे आना भी अप्रत्याशित नहीं है। लेकिन हमें आश्वस्त होना चाहिए कि प्रयोगशालाओं में दिन-रात काम करने वाले शोधकर्ता, वैज्ञानिक, चिकित्सक कोविड-19 का मुकाबला करने में समर्थ दवा या टीका बनाने में अवश्य सफल होंगे।

इस बीच हमें बहुत सी बातों पर विचार और पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। क्या कोरोना वायरस से मुक्ति पाने के बाद ”विश्व ग्राम” की परिकल्पना यथावत बनी रहेगी या हम कूपमंडूक बन जाने की दिशा में लौटेंगे? क्या इसके बाद भी हथियारों की होड़ कायम रहेगी? क्या युद्ध के बादल मंडराते रहेंगे या एक बेहतर दुनिया का निर्माण करने के लिए समाज आगे बढ़ेगा? क्या 20:20 का फार्मूला सिर्फ नेत्र ज्योति तक सीमित रहेगा या मनुष्य हृदय को भी उसी तर्ज पर सर्वांग सुंदर बनाने का कोई उपाय खोजा जाएगा? 2020 के साल में कोरोना वायरस ने हमारे सामने एक चुनौती फेंकी है। क्या हम उसके लिए तैयार हैं?


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