तन मन जन: लॉकडाउन-अनलॉक के चक्‍कर में ‘जात भी गयी और भात भी नहीं खाया’!


लॉकडाउन के कई चरण के बाद ‘‘अनलॉक’’ की रणनीति देश पर भारी पड़ रही है। अब भारत दुनिया के उन 15 देशों में प्रमुख है जहां पर सबसे ज्यादा कोरोना वायरस संक्रमण फैलने का खतरा है। आंकड़े और अनुमान बता रहे हैं कि देश के अनलॉक होने से संक्रमण के मामले तेजी से बढ़ेंगे और यदि पुनः लॉकडाउन नहीं किया गया तो स्थिति विस्फोटक होगी। यह चेतावनी जापान की रिसर्च संस्था ‘‘नोमुरा सिक्योरिटीज’’ ने भी अपनी ताजा रिपोर्ट में दी है।

नोमुरा का यह अध्ययन दुनिया की 45 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में कोरोना वायरस संक्रमण की स्थिति तथा लॉकडाउन खुलने के बाद उत्पन्न हुई परिस्थितियों के आधार पर तैयार किया गया है। रिपोर्ट में 45 देशों को तीन अलग अलग जोन में बांटा गया है। धीरे-धीरे सामान्य होते देशों को ‘‘ऑनट्रैक जोन’’, पहले से और खतरनाक होते देशों को ‘‘डेंजर जोन’’ तथा चेतावनी वाली स्थिति के देशों को ‘‘अलर्ट जोन’’ में रखा गया है। इनमें भारत का नाम उन 15 देशों में शामिल है जो ‘‘डेंजर जोन’’ में आते हैं। ‘‘डेंजर जोन’’ में भारत के अलावा पाकिस्तान, चिली, इन्डोनेशिया, ब्राजील, मेक्सिको, कनाडा, अर्जेन्टीना, दक्षिण अफ्रीका, कोलंबिया, इक्वाडोर, पेरू आदि शामिल हैं। इनमें 17 देश तो धीरे-धीरे पटरी पर लौट रहे हैं लेकिन 13 देश तो चेतावनी वाले ‘‘अलर्ट जोन’’ में हैं।

लॉकडाउन को लेकर नोमुरा की रिपोर्ट जिस खतरे की तरफ इशारा कर रही है इससे भारत की स्थिति चिन्ताजनक बनी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार यदि लॉकडाउन में ढील या अनलॉक ऐसे ही चलता रहा तो निश्चित तौर पर संक्रमण बढ़ेगा, वहीं यदि दुबारा ‘‘लॉकडाउन’’ को बढ़ाया गया तो देश में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था बर्बाद हो जाएगी। नोमुरा की रिपोर्ट स्पष्ट बताती है कि लॉकडाउन हटने से कई देशों में गतिविधियां बढ़ी हैं और कारोबार भी धीरे-धीरे पटरी पर लौट रहे हैं लेकिन जहां लॉकडाउन हटाने से संक्रमितों के आंकड़े बढ़ रहे हैं वहां जनता में डर का माहौल भर जाना और अवसाद का शिकार हो जाना प्रमुख है। कयास लगाए जा रहे हैं कि लॉकडाउन देश में दोबारा लागू हो सकता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि फ्रांस, इटली, दक्षिण कोरिया ऐसे देश हैं जहां लॉकडाउन में ढील के बावजूद संक्रमण में फैलाव नहीं हुआ है और वहां अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही है जबकि अमरीका, जर्मनी, यू.के. आदि देशों में मामले बढ़ने से स्थिति बिगड़ गई है।

‘लॉकडाउन’ पर मेरे एक ग्रामीण मित्र टिप्पणी करते हैं, ‘‘जात भी गई और भात भी नहीं खाया।’’ बहरहाल यह लॉकडाउन, कोरोना वायरस के इलाज के लिए कम जबकि राजनीति के लिए ज्यादा कारगर सिद्ध हो रहा है। लॉकडाउन की राजनीति का असर साफ दिख रहा है। लॉकडाउन अवधि में सरकार ने सीएए/एनआरसी के विरोधियों के खिलाफ मुकदमे बनाकर जो गुपचुप गिरफ्तारियां कीं उसमें ज्यादातर मुस्लिम युवा पुरुष व स्त्रियों को अजीब तरीके से गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस ने गर्भवती महिलाओं को भी नहीं छोड़ा। लॉकडाउन में देश कितना लॉक था और कौन इसका पालन कर रहे थे, यह भी इसी गिरफ्तारी से पता चलता है। पुलिस ने ज्यादातर सीएए/एनआरसी विरोधियों को उत्तरी दिल्ली में हुई हिंसा में शामिल बताकर गिरफ्तार किया और वो भी लॉकडाउन की आड़ में।

अब मैं जन स्वास्थ्य की किताबों में लॉकडाउन को तलाशता हूं, तो मुझे 125 वर्ष पुराना ‘‘महामारी अधिनियम 1897’’ याद आता है। यह अधिनियम पूरे देश पर लागू होता है। सरकार इसका इस्तेमाल किसी संकट या बीमारी की अवस्था में करती है। इस अधिनियम की धारा 2 के तहत राज्य और केन्द्र सरकार को अधिकार है कि बीमारी या महामारी को रोकने के नाम पर देश में लॉकडाउन लागू करे, साथ ही इसके लिए वह कोई भी अस्थायी नियम बना सकती है। लॉकडाउन एक सरकारी आदेश होता है, जिसमें सज़ा का प्रावधान कोई ज़रूरी नहीं। एक तरह से लॉकडाउन को कर्फ्यू भी कहा जा सकता है। इसमें पुलिस को इतनी शक्ति होती है कि वह व्यक्ति को लॉकडाउन तोड़ने के एवज में गिरफ्तार कर सकती है और उस व्यक्ति पर जुर्माना भी लगा सकती है। भारत में सियायत ने पुलिस का इस्तेमाल कर अपनी राजनीति को खूब आगे बढ़ाया। बीते कुछ महीनों में विश्वविद्यालयों के कई छात्र नेता सरकार के लिए सिरदर्द रहे। उन्हें इस लॉकडाउन में गिरफ्तार कर सरकार ने ‘‘अपने विरोध’’ का बदला ले लिया।

अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की शिकायत रही कि अस्पतालों ने मुस्लिम मरीजों को देखने से मना कर दिया। यह सब तब हुआ जब गोदी मीडिया गैर-जिम्मेदारी से धर्म में बीमारी तलाशने लगा। दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, झारखण्ड आदि में पुलिस के साथ-साथ सत्ता समर्थित दबंग लोगों ने कानून हाथ में लेकर भरपूर हिंसा और नफरत फैलाई। लॉकडाउन के ही दौरान भारत में मुसलमानों के द्वारा मनाया जाने वाला खुशियों, प्रेम और भाईचारे का त्यौहार ईद भी बेरौनक रहा। दहशत में जी रहे मुसलमानों ने शान्ति से इस कहर को भी झेल लिया।

लॉकडाउन के सबसे खौफनाक शिकार रहे देश के मेहनतकश मजदूर। अचानक लॉकडाउन की घोषणा ने सबसे पहले अपने गांव से हजारों मील दूर जाकर रोजगार करने वाले मजदूरों और छोटे-मझौले कर्मचारियों को प्रभावित किया। उस दौरान तो मानों श्रम शक्ति को सरकार ने घुटनों पर ला दिया। ऐसा नहीं कि सरकार ने यह बिना सोचे समझे किया हो। इस दहशत की घोषणा का मोदी सरकार को अच्छा खासा तर्जुबा है। नोटबन्दी, जीएसटी आदि प्रक्रियाओं में भी सरकार ने इसी तरीके का इस्तेमाल किया था, हालांकि सरकार की अचानक लॉकडाउन की घोषणा से न तो मजदूर रुके और न ही कोरोना रुका। रोजगार गंवाने की शर्त पर मजदूरों ने जान बचाने के लिए हजारों मील का सफर पैदल ही तय करना मुनासिब समझा। इसमें सैकड़ों मजदूरों की जान गई और कोरोना वायरस एक राज्य से दूसरे राज्य में चलता पसरता रहा। इसमें शक नहीं कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के अलावा मुम्बई, चैन्नै, अहमदाबाद सब लॉकडाउन में थे लेकिन कोरोना वायरस संक्रमण को फैलने से नहीं रोक पाए और आज कोरोना वायरस संक्रमण का आंकड़ा सियासत को आंख दिखा रहा है।

लॉकडाउन ने भारत के जन, मन को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया है। पूरे देश में प्रवासी मजदूर और हुनर के कारीगर अपनी ही चुनी हुई सरकार की बेरहमी का शिकार हैं। इस दौरान वे सरकार और प्रशासन के अमानवीय व्यवहार, कोर्ट कचहरी के संवेदनशून्य रवैये तथा औसत समाज की उपेक्षा और संवेदनहीनता को झेलते हुए किसी तरह अपने गांव लौट जाना चाहते थे। मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान का प्रमुख अपनी अन्तर्राष्ट्रीय छवि बनाने में मशगूल रहा और देश के आम जन लॉकडाउन का साइड इफेक्ट झेलते रहे। अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 30-35 करोड़ लोग सीधे तौर पर इस लॉकडाउन के शिकार बने या अपनी नौकरी गंवा बैठै या पगार घटा लिये। कुल मिलाकर लॉकडाउन ने मेहनतकश लोगों के जीवन में परेशानियों का पहाड़ खड़ा कर दिया। दुनिया के कुछ आत्ममुग्ध नेताओं की नकल कर भारतीय नेतृत्य ने भी एक कथित बड़े आर्थिक पैकेज को अपने द्वारा पोषित मीडिया में तारीफ तो दिला दी लेकिन आम जनमानस में कोई भरोसा पैदा नहीं किया।

कभी लॉकडाउन को कोरोना वायरस संक्रमण की रामबाण दवा बताने वाला डब्लूएचओ भी अब खुल कर कह रहा है कि कोरोना वायरस संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए शहरों और देशों को लॉकडाउन करने से ही काम नहीं चलेगा। बीमारी या महामारी को रोकने के लिए जन स्वास्थ्य के समुचित कदम उठाने होंगे नहीं तो यह महामारी समय समय पर पनपती रहेगी और मानव स्वास्थ्य को तबाह करती रहेगी। डब्लूएचओ के वरिष्ठ इमरजेन्सी एक्सपर्ट माइक रायन ने पिछले दिनों साफ कर दिया था कि कोरोना वायरस संक्रमण को केवल लॉकडाउन से नहीं रोका जा सकता। भारत में कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए लॉकडाउन कितना कारगर रहा ऐसा कोई अध्ययन अभी तो उपलब्ध नहीं है लेकिन यह तो पता है कि लॉकडाउन की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था और यहां के आम लोगों को कितना नुकसान उठाना पड़ा।

वैसे भी भारत में जन स्वास्थ्य कभी मुख्य एजेन्डा रहा नहीं। यहां हर साल लाखों लोग दस्त, दिमागी बुखार, मलेरिया, टीबी, कैंसर, सांप काटने आदि से मर रहे हैं। अब तो कुपोषण और बीमारी के कारण आत्महत्या से मरने वाले भारतीयों का आंकड़ा भी साल दर साल बढ़ रहा है। ऐसे में लॉकडाउन लोगों को बीमारी से पहले ही मार देगा?

एक गैर-सरकारी रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉकडाउन की अवधि के दौरान अन्य गम्भीर रोगों से ग्रस्त लोगों का समय पर इलाज न हो पाने के कारण देश में दस हजार से ज्यादा लोगों की असमय मौत हो चुकी है। सबसे ज्यादा परेशानी कैंसर एवं किडनी के रोगियों को उठानी पड़ी। हृदयाघात के कई मामले तो अस्पताल पहुंचकर उसके परिसर में ही मौत में इसलिए तब्दील हो गए क्योंकि कोरोना वायरस संक्रमण के उपचार के लिए अस्पताल को एक्सक्लूसिव घोषित कर दिया गया था। कई मरीजों की मौत दो राज्यों के बीच की सीमा पर प्रवेश नहीं मिलने की वजह से हो गई। कई मरीजों ने आक्सीजन के अभाव में दम तोड़ दिया तो कई को चिकित्सक ने कोरोना वायरस संक्रमण के सन्देह में हाथ लगाने से इनकार कर दिया। बुखार के लगभग सभी मामले कोरोना भय की भेंट चढ़ गए।

मैंने अपने ही एक अध्ययन में पाया कि मेरे क्लीनिक में बुखार के दस आने वाले मरीजों में छह मरीज तो कोरोना वायरस संक्रमण से सम्बन्धित ही नहीं थे लेकिन बुखार को कोरोना वायरस संक्रमण का मुख्य लक्षण बता दिए जाने के बाद हर बुखार को कोरोना वायरस संक्रमण मान लेना लोगों और चिकित्सकों की एक तरह से नियति बन गई। किसी भी रहस्यमय रोग में देखा यह गया है कि ज्ञान के अभाव में जहां आम लोग अफवाहों को ही सच मानने लगते हैं, वहीं चिकित्सक समुदाय भी ज्यादातर सुनी सुनाई बातों को ही प्रचारित करता रहता है।

कोरोना वायरस संक्रमण के मामले में शुरू से ही डब्लूएचओ सन्देह के घेरे में है और समय-समय पर दिए डब्लूएचओ के बयान तथा जारी दिशानिर्देशों के परस्पर विरोधाभासी बिन्दु और संदेह फैलाते रहे। मसलन लॉकडाउन से बीमारी के प्रसार को रोकने में जहां कोई खास सफलता नहीं मिली, वहीं कई देशों की तानाशाह सरकारों ने इसे अपनी मनमानी और जनता को परेशान करने में इस्तेमाल किया।

लॉकडाउन से अनलॉक तक के पूरे दो महीने का लेखा जोखा वैसे तो कोई करेगा नहीं फिर भी अपनी समझ के लिए यह जान लें कि भारत और न्यूजीलैंड ने एक साथ लॉकडाउन किया था और अब न्यूजीलैंड में कोरोना वायरस संक्रमण पूरी तरह से काबू में है जबकि भारत में यह संक्रमण अब रफ्तार पकड़ रहा है। हां, आप कह सकते हैं कि न्यूजीलैंड एक छोटा देश है लेकिन उसने जो रणनीति अपनाई और अपनी जनता के साथ जो जिम्मेदार व्यवहार किया और साथ ही अपनी अर्थव्यवस्था भी बचाई, तारीफ उसकी है। भारत में यदि राजनीतिक नेतृत्व अपनी बुद्धिमत्ता दिखाता, विपक्ष को भरोसे में लेकर कदम उठाता और जनता के दुखों का ख्याल रखता तो यहां भी सूरत अलग होती।

लॉकडाउन से अनलॉक तक भारत सरकार ने भौतिक व राजनीतिक रूप से भले ही कुछ हासिल कर लिया हो, अपने विरोधियों को जेलों में भर दिया हो मगर न तो वह कोरोना वायरस संक्रमण को नियंत्रित कर पाई और न ही जनता का दुख कम कर पाई। इस महामारी ने देश के लोगों की जिन्दगी को लॉकडाउन में बर्बाद कर दिया जिसे अनलॉक कर अब भारत सरकार तबाह करने जा रही है। लॉकडाउन, अनलॉक की इस उपचार तकनीक से जन स्वास्थ्य की समस्या तो और विकराल बन गई, ऊपर से महामारी ने अपने को और मजबूत कर लिया। इस लॉकडाउन ने पहले से ही भेदभाव वाले भारतीय समाज में सम्बन्धों की खाई और चौड़ी कर दी और उसे ‘‘सोशल डिस्टेंसिंग’’ कहकर यह समझाना चाहा कि इससे कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने में मदद मिलेगी।


लेखक जन स्वास्थ्य वैज्ञानिक एवं राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त होमियोपैथिक चिकित्सक हैं


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8 Comments on “तन मन जन: लॉकडाउन-अनलॉक के चक्‍कर में ‘जात भी गयी और भात भी नहीं खाया’!”

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