किसकी आपदा? किसका अवसर?


12 मई 2020 की शाम में जब प्रधानमन्त्री अपने मनपसन्द प्राइम टाइम स्लॉट में देश के सामने नमूदार हुए तो उनसे देश ने काफ़ी उम्मीदें लगा रखी थी। करीबन 30 मिनट के अपने संबोधन में उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज में अपनी बात रखी। जो लोग प्रधानमन्त्री कीवक्तृत्व कला से परिचित हैं उन्हें पता होगा कि वे अपने संबोधनों में अक्सर ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं जो तत्काल सुनने में तो अच्छे लगते हैं पर उनके दूरगामी परिणाम अक्सर आम आदमी को परेशान करने वाले ही होते हैं। स्वदेशी, 20 लाख करोड़ के पैकेज के साथ-साथ उन्होंने आपदा में अवसर तलाशने की भी बात कही।

प्रधानमंत्री ने अपनी भुवन मोहिनी मुस्कान के साथ थोड़ी दृढ़ता की मिलावट करते हुए देशवासियों से कहा कि उन्हें आपदा में अवसर देखना चाहिए। आपदा में अवसर सुनने में कितना अच्छा लगता है न? मानो स्वेट मार्डेन या शिव खेड़ा की किसी किताब से  आप जिन्दगी जीने की तरतीब सीख रहे हो। आम आदमी जो उनके टीवी पर आने के 10 मिनट पहले से ही साँस खींचे, थोड़ा डरा-सहमा,थोड़ी उम्मीद लिए बैठा था उसे मन्त्र मिला कि आपदा में अवसर तलाशो। तबसे आज कुल तीन दिन हो गए मैं समझ नहीं पा रहा कि हमारे प्रिय प्रधानमन्त्री ने आखिर आपदा में अवसर तलाशने की जिम्मेदारी किसे दी है। क्या अवसर तलाश का यह आवाहन उस  आम आदमी के लिए है जो भूख-प्यास से बेहाल होकर नंगे पाँव घर की तरफ निकल पड़ा है या उन धनकुबेरों के लिए जो ऐसी आपदाओं की तलाश में रहते हैं।

मेरे ख्याल से आपदा भी ठीक सत्य या धर्म की तरह ही है। मसलन एक तथ्य जो आपके लिए सत्य हो सकता है या एक कोई क्रियाकलाप जो आपके लिए धार्मिक हो सकती है वही दूसरे के लिए असत्य या अधार्मिक हो सकती है। ठीक उसी तरह से एक घटना जो किसी के लिए आपदा हो सकती है वही किसी अन्य के लिए अवसर का पर्याय। प्रधानमन्त्री के वक्तव्य के बाद लगने लगा कि उन्होंने उसी दूसरे वर्ग के लोगों का आवाहन किया है जिनके लिए हर आपदा एक अवसर होती है क्योंकि आपदा में ग्रसित व्यक्ति सबसे पहले उससे उबरना चाहता है न कि उसमें अवसर देखने की कोशिश करता है।

मुझे मेरे बचपन के दिन याद आ रहे हैं। गांव से थोड़ी दूरी पर एक नदी बहती है, हालाँकि वह लोगों के अतिक्रमण और कुकर्मों के चलते लगभग नाले में तब्दील हो गयी है पर सरकारी कागज़ में नदी है तो नदी ही सही। गांव की नदी अक्सर मानसून में उफना जाती है तब उसके बेसिन में बसे लोगों के लिए जीवन-मरण का संकट खड़ा हो जाता है। अक्सर बाढ़ के समय वह नदी कुछ लोगों के लिए आपदा लेकर आती थी तो कुछ के लिए अवसर। जब उसके बाँध बचाने के ठेके दिए जाते, बाढ़-पीड़ितों को राहत सामग्री का वितरण करना होता तो तमाम सक्षम लोग अपने लिए उसमें अवसर देखते।

केदारनाथ बाढ़ की आपदा के समय की बातें भी आप लोगों को याद ही होंगी जब हजारों लोग मर रहे थे, बेघर हो रहे थे तो कैसे कुछ लोगों ने उस आपदा को अवसर में बदल दिया था और अचानक से दूध,पेट्रोल,खाना आदि अपनी मूल लागत से सैकड़ों गुना ज्यादा दाम पर बिकने लगे थे।  

बाढ़, भूकम्प, युद्ध, दंगे, आदि आपदाएं हमेशा से कुछ लोगों के लिए अवसर लेकर आती हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध को ही लें, जब मानवता क्रन्दन कर रही थी और निरीह मारे जा रहे थे तो पूंजीपति वर्ग युद्धक सामग्री बनाने में लगा हुआ था,। बेरहम लोगों ने उस मानव निर्मित आपदा को अवसर में बदल दिया। संयुक्त राज्य अमेरिका आज जहां खड़ा है उसमें उस युद्ध को अवसर में तब्दील करने की कला की बड़ी भूमिका है। द्वितीय विश्वयुद्ध दुनिया के ज्यादातर लोगों के लिए भले ही आपदा रहा हो पर संयुक्त राज्य अमेरिका और तमाम पूंजीपतियों के लिये वह किसी अवसर से कम नहीं था।

अपने पहले कार्यकाल में जब नवम्बर की एक शाम में अपने पसंदीदा समय पर टीवी द्वारा प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की घोषणा की थी तो वह भी एक बड़े वर्ग के लिए किसी आपदा से कम सिद्ध नहीं हुआ था। न जाने कितनी नौकरियां चली गयीं, कितने बेरोजगार हो गए, कितने उद्योगों की कमर टूट गयी जो आज तलक सही ना हो सकी पर उस आपदा में भी पेटीएएम जैसी कम्पनियों ने अवसर तलाश लिया और अपनी नेट वैल्यू न जाने कितने गुना बढ़ा ली।

प्रधानमन्त्री भी मन ही मन जानते हैं कि कोरोना का यह आपद समय कुछ लोगों के लिए अवसर लेकर आया है। दवा कम्पनियां, सेनेटाइज़र और मास्क बनाने वाली कम्पनियां, ऑनलाइन मीटिंग के लिए मंच देने वाली कम्पनियां, 20 लाख करोड़ की राहत सामग्री पर गिद्ध दृष्टि लगाए नेता और ब्यूरोक्रेट, लोकल स्तर पर 2 किलो आटा देकर 20 सेल्फी लेने वाले स्थानीय समाज सेवक सबके सब अवसर को भांप चुके हैं और उसे भुनाने में लग गए हैं। प्रधानमन्त्री के इस आवाहन से उन्हें प्रेरणा ही मिलेगी कि वे अपने काम को और तत्परता के साथ कर पाएं वरना न जाने ऐसा सुनहरा अवसर फिर कब आये।

ऐसे में अगर आप प्रधानमंत्री के वक्तव्य से खुश हैं और सोच रहे हैं कि अब देश का भला होगा और आम आदमी की दुर्दशा रुक जायेगी तो दोस्त जरा रुकिए, रूह अफ़ज़ा का ठंडा शर्बत लेकर आप यूट्यूब पर ‘मन की बात’ का रिपीट टेलीकास्ट देखिये क्योंकि आप ऐसी खुशफहमी के शिकार हैं जिसका कोई इलाज ही नहीं।


About बिपिन पांडेय

पढ़ाई लिखाई गोरखपुर विश्वविद्यालय से, देश के अलग-अलग शैक्षिक संगठनों के साथ काम करने का अनुभव, यायावरी का शौक, देखना,समझना,लिखना-पढ़ना मुख्य काम । रहनवारी लखनऊ में...

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One Comment on “किसकी आपदा? किसका अवसर?”

  1. बहुत ही मार्मिक दशा को उजागर किया हैं । काश ये आवाज सरकार तक भी पहुँचे ।

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