देश भर में जलायी गईं कृषि कानूनों की प्रतियां, गणतंत्र दिवस परेड की तैयारी तेज: AIKSCC


बुधवार, 13 जनवरी को लोहड़ी के अवसर पर विवादित नये कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे किसानों ने नये कृषि कानूनों की हजारों प्रतियां जलाई और आंदोलन को तेज करने का आह्वान किया है। एआईकेएससीसी द्वारा जारी मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि इस आंदोलन को मजबूत करने के लिए इससे जुड़ने के लिए देश वासियों का आह्वान किया गया है।


कानून की प्रतियां जलाई गईं। कानून नकारते हुए उन्हें रद्द करने का देश भर के किसानों ने पुनः जोर दिया।

  • किसान आन्दोलन के सभी पहलुओं को तेज करने की तैयारी में।
  • दिल्ली के पास के सभी जिलों से दिल्ली में गणतंत्र दिवस किसान ट्रैक्टर परेड की तैयारी करने का आह्नान किया।
  • 18 जनवरी को महिला किसान दिवस के आयोजन की तैयारी। कई राज्यों में महामहिम के समक्ष महापड़ाव।
  • एआईकेएससीसी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने किसानों की कानून रद्द करने की मांग पर गलत तथ्य पेश किये, उनके दिये तर्क नहीं बताए।

तीन खेती के कानून और बिजली बिल 2020 को रद्द करने की किसानों की मांग पर सरकार के अड़ियल रवैये के विरुद्ध अभियान तेज करते हुए आज देश भर में 20 हजार से ज्यादा स्थानों पर कानून की प्रतियां जलाई गईं। सभी स्थानों पर किसानों ने एकत्र होकर कानून की प्रतियां जलाईं और उन्हें रद्द करने के नारे लगाए।

एआईकेएससीसी ने दिल्ली के आसपास 300 किमी के सभी जिलों में किसानों से अपील की है कि वे दिल्ली में गणतंत्र दिवस ट्रैक्टर परेड की तैयारी में जुटें और सीमाओं पर एकत्र हों। जहां 18 जनवरी को सभी जिलों में महिला किसान दिवस मनाया जाएगा, बंगाल में 20 से 22 जनवरी, महाराष्ट्र में 24 से 26 जनवरी, केरल, तेलंगाना, आंध्रा में 23 से 25 जनवरी और ओडिशा में 23 जनवरी को महामहिम के कार्यालय के समक्ष महापड़ाव आयोजित किया जाएगा।

एआईकेएससीसी ने कहा है कि

भारत सरकार ने पिछले 50 दिनों से लगातार देश की जनता और किसान नेताओं के सामने इस बात की कोई सच्चाई पेश नहीं की है कि ये कानून कैसे किसानों को लाभ पहँुचाएंगे। उसका ये तर्क कि तकनीकी विकास होगा, पूंजी का निवेश होगा, मूल्य वृद्धि होगी और कुल मिलाकर विकास बढ़ेगा, इन कानूनों के बनने से पूरी तरह स्वतः ही खारिज हो जाएगा, क्योंकि ये कानून इस काम की जिम्मेदारी बड़े कारपोरेट को देते हैं और इनमें यह बात भी जुड़ी हुई है कि देश की सरकार इन कारपोरेट घरानों को बढ़ावा दे रही है। इसी तर्क के अनुसार सरकार ने निजी निवेशकों को मदद देने के लिए एक लाख करोड़ रूपये आवंटित किये हैं। पर तकनीकी विकास, पूंजीगत निवेश और मूल्य वृद्धि के लिए आश्वस्त बाजार के विकास हेतु अपनी जिम्मेदारियों के निर्वाह में इस धन को नहीं लगाना चाहती। कारपोरेट जब यह निवेश करेगा तो उसका लक्ष्य ऊँचा मुनाफा कमाना और भूमि व जल स्रोतों पर कब्जा करना होगा।

माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पढ़ने के बाद यह बात स्पष्ट है कि भारत सरकार ने किसान नेताओं पर यह गलत आरोप लगाया है कि उन्होंने अपने हितों के नुकसान के सबूत के तौर पर एक भी धारा को चिन्हित नहीं किया है। लिखित में तथा वार्ता के दौरान मौखिक रूप से किसान नेताओं ने हर धारा तथा कुल मिलाकर इन कानूनों द्वारा किसानों के अधिकारों के छिनने का हवाला दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इनसे किसानों के लिए उनके बाजार पर और जमीन की सुरक्षा पर हमला होगा, लागत व सेवाओं के दाम बढ़ेंगे, उपज के दाम घटेंगे, किसानों पर कर्ज व आत्महत्याएं बढ़ेंगी, राशन व्यवस्था भंग होगी, खाने के दाम बढ़ेंगे, भूख व भुखमरी बढ़ेगी।

भारत सरकार ने न केवल किसानों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में विफल रही है उसने देश के सर्वोच्च न्यायालय के सामने सही तथ्यों को पेश नहीं किया है।


मीडिया सेल
आशुतोष
99991 50812


About जनपथ

जनपथ हिंदी जगत के शुरुआती ब्लॉगों में है जिसे 2006 में शुरू किया गया था। शुरुआत में निजी ब्लॉग के रूप में इसकी शक्ल थी, जिसे बाद में चुनिंदा लेखों, ख़बरों, संस्मरणों और साक्षात्कारों तक विस्तृत किया गया। अपने दस साल इस ब्लॉग ने 2016 में पूरे किए, लेकिन संयोग से कुछ तकनीकी दिक्कत के चलते इसके डोमेन का नवीनीकरण नहीं हो सका। जनपथ को मौजूदा पता दोबारा 2019 में मिला, जिसके बाद कुछ समानधर्मा लेखकों और पत्रकारों के सुझाव से इसे एक वेबसाइट में तब्दील करने की दिशा में प्रयास किया गया। इसके पीछे सोच वही रही जो बरसों पहले ब्लॉग शुरू करते वक्त थी, कि स्वतंत्र रूप से लिखने वालों के लिए अखबारों में स्पेस कम हो रही है। ऐसी सूरत में जनपथ की कोशिश है कि वैचारिक टिप्पणियों, संस्मरणों, विश्लेषणों, अनूदित लेखों और साक्षात्कारों के माध्यम से एक दबावमुक्त सामुदायिक मंच का निर्माण किया जाए जहां किसी के छपने पर, कुछ भी छपने पर, पाबंदी न हो। शर्त बस एक हैः जो भी छपे, वह जन-हित में हो। व्यापक जन-सरोकारों से प्रेरित हो। व्यावसायिक लालसा से मुक्त हो क्योंकि जनपथ विशुद्ध अव्यावसायिक मंच है और कहीं किसी भी रूप में किसी संस्थान के तौर पर पंजीकृत नहीं है।

View all posts by जनपथ →

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *