कोविड -19 के बाद की दुनिया को कोविड-19 के पहले की दुनिया से बेहतर बनाएं: एस. पी. शुक्ला

वेबिनार की शुरुआत विनीत तिवारी द्वारा दिए गए लेनिन के एक संक्षिप्त जीवन परिचय से हुई। जिसमें उन्होंने लेनिन के लेनिन बनने की प्रक्रिया को उनके परिवार की पृष्ठभूमि, उनके क्रांतिकारी भाई अलेकज़ान्द्र के फाँसी पर चढ़ाए जाने, प्लेखानोव, बाकुनिन, वेरा जासुलिश, टॉलस्टाय, गोर्की, क्रुप्सकाया आदि के सन्दर्भों के ज़रिए प्रस्तुत किया।

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पत्रकारों की छंटनी और वेतन कटौती पर सुप्रीम कोर्ट में PIL मंजूर, केंद्र सहित INS-NBA को नोटिस

इस संयुक्त याचिका में कम से कम नौ मामलों का उदाहरण दिया गया है जिनमें वेतन कटौती, अनिश्चित काल तक कर्मचारियों को छुट्टी पर भेजे जाने और नौकरी से निकाले जाने के मामले शामिल हैं।

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बहराइच का दोहरा हत्याकांड: मॉब लिंचिंग मानना तो दूर, एक में FIR नदारद तो दूसरे में धारा 302 गायब

बहराइच के नानपारा से पिछले दिनों मॉब लिंचिंग की एक खबर आयी थी। सामाजिक संगठन रिहाई मंच ने इस घटना की तफ्तीश की है। साथ ही कुछ दिन पहले हैदर अली नाम के मारे गये युवक के मामले में भी संगठन ने पड़ताल की है जो दिल दहलाने वाली है।

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रमज़ान में मस्जिद से ऐलान पर ‘मौखिक’ पाबंदी पर कांग्रेस ने DM पर लगाया भाजपा के दबाव का आरोप

शनिवार की दोपहर में मुस्लिम समाज के साथ बैठक के बाद डीएम ओम प्रकाश आर्य ने सेहरी और अफ्तार के वक़्त मस्जिद से माइक द्वारा ऐलान की बात मान ली थी, लेकिन शाम होते-होते वो फिर अपने वादे से मुकर गए

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ओडिशा: सरकार ने कहा घर में रहो, वन विभाग ने आदिवासियों के सर से छत भी छीन ली

आदिवासी अपने बच्चों के साथ बिना खाना और पानी के आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं। इस घटना के विरोध में लोकशक्ति अभियान के प्रफुल्ल सामंतरा ने ओडिशा के मुख्य सचिव को पत्र लिख कर न्याय और पुनर्वसन की मांग की है।

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उत्तराखण्ड की उलटबांसी: घर बैठे भूख हड़ताल की तो धारा 144 तोड़ने और संक्रमण फैलाने के आरोप में केस

उत्तराखण्ड पुलिस की मानें तो भारतीय दंड संहिता यानी आइपीसी की धारा 188, 269, 270 और आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा 51 उन लोगों पर लागू होती है जो घर बैठे भूख हड़ताल करते हैं। यह मामला उत्तराखण्ड के एक युवा सामाजिक कार्यकर्ता महेश पर लगाये गये मुकदमे में सामने आया है।

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गुजरात में अटके मध्य प्रदेश के सैकड़ों मजदूरों को शासन से कोई राहत नहीं!

मध्य प्रदेश शासन के उच्चस्तरीय हस्तक्षेप के बिना आने वाले और 10 दिन 3 मई तक ही लॉकडाउन मानकर बच्चों–बहनों के साथ मजदूर आदिवासी समूहों को काटना भी मुश्किल है!

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“एलीट के विद्रोह को जनता अपनी बग़ावत समझ बैठी है”!

इस बग़ावती एलीट के बीच कोई वर्ग एकता जैसी चीज़ नहीं है, सिवाय इसके कि इसकी पकड़ उन राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक साधनों पर है जिसके सहारे वे दंडमुक्त रह सकते हैं।

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