देश की जनता को नाचने वाला मोर बना दिया गया है…


बीते दो सप्ताह से केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ़ विरोध में कुछ तेज़ी महसूस होने लगी, किन्तु यह विरोध उतना व्यापक या बड़ा नहीं जो इस सरकार का कुछ बिगाड़ सके. यह बात हम हताशा में नहीं कह रहे हैं. इस कथन के पीछे मजबूत तथ्य हैं. इसके लिए हमें 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले जाना होगा जब लगभग पूरा देश सरकार के खिलाफ़ सड़कों पर था.

पुणे से मुंबई तक किसानों की ऐतिहासिक पदयात्रा के साथ देश के कई प्रान्तों में किसानों का व्यापक प्रदर्शन; देश के तमाम विश्वविद्यालयों में छात्रों का आन्दोलन; नागरिक कानून और सीएए-एनआरसी के खिलाफ़ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन और सरकारी दमन; जामिया, जेएनयू, अलीगढ़ विश्वविद्यालय में पुलिस और सरकारी गुंडों के हमले हम सबको याद हैं. सीएए और एनआरसी के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शनों में केंद्र सहित भाजपा शासित राज्य सरकारों द्वारा दमन में कई लोगों की मौत, फ़र्ज़ी मुक़दमे, पुलिसिया गुंडागर्दी के बावजूद सुप्रीम कोर्ट सहित तमाम न्यायालयों की ख़ामोशी को याद करना ज़रूरी है. पश्चिम बंगाल राज्य के बीजेपी प्रभारी दिलीप घोष द्वारा प्रदर्शनकारियों को ‘’कुत्ते की तरह गोली मारने’’ वाली बात पर भी किसी अदालत ने कोई संज्ञान न लेते हुए लगभग हर जगह सरकारी भाषा में सरकार के ही समर्थन में अपनी बात कही.

साल 2014 में सत्ता परिवर्तन के बाद से मोदी सरकार द्वारा तमाम जनविरोधी नीतियों, आसमान छूती महंगाई और सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थाओं के निजीकरण की नीति के बाद भी 2019 के आम चुनाव में पहले से अधिक बहुमत मिलना बताता है कि देश की जनता में धार्मिक और जातिगत ध्रुवीकरण हो चुका है और शिक्षा, रोजगार आदि मुद्दों पर राष्ट्रवाद हावी हो चुका है, वरना ऐसा परिणाम नहीं आता.

धार्मिक उन्माद और ध्रुवीकरण की बात से यदि आप असहमत हैं तो भोपाल से प्रज्ञा सिंह ठाकुर का दिग्विजय सिंह को हराना आप कैसे देखते हैं फिर? जबकि उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान कई विवादास्पद बयान भी दिये थे.

यह बात इसलिए भी याद रखना जरूरी है कि ये सभी आंदोलन आम जनता, छात्र, किसान और मजदूरों के आन्दोलन थे. किसी राजनीतिक दल विशेष के नहीं. हां, इन आंदोलनों को कांग्रेस सहित सुविधानुसार कुछ अन्य राष्ट्रीय और प्रांतीय दलों का समर्थन जरूर मिला था.

एक बात तय है कि जब तक इस सत्ता को अडानी-अम्बानी जैसे पूंजीपतियों का साथ रहेगा यह सत्ता बनी रहेगी. वरना क्या कारण है कि जिस देश में प्याज और पेट्रोल के दाम बढ़ने पर सरकारें गिरा करती थीं अब वहां रफाल कांड होने पर, रूपया कमज़ोर होने और पेट्रोल-डीजल के दाम लगातर बढ़ने के बाद देशव्यापी प्रदर्शनों के बाद भी उस सरकार को पहले से अधिक सीटें मिलती हैं?

अब जब सुप्रीम कोर्ट सहित तमाम न्यायालय, जज, चुनाव आयोग आदि सत्ता की भाषा में ही बात करने लगे हैं, ऐसे में सोशल मीडिया और इक्का दुक्का छिटपुट प्रदर्शनों का कोई असर पड़ेगा?

आर्टिकल 19 पर आर्टिकल 370 भारी हो गया. अदालत के जरिये सरकार ने अपने मेनिफेस्टो को क़ानूनी जामा पहनाने की नीति अपना ली है. वरना 48,000 झुग्गियों को उजाड़ने का फैसला यूं नहीं देता कोई जज. बीते कुछ वषों में अदालतों के जो फैसले आये हैं, उन पर एक नज़र घुमा कर देखिए, आपको अहसास हो जाएगा.

वे सभी लोग आज जेल में बंद हैं जिनसे इस सत्ता को ख़तरा महसूस होता है. तमाम सामाजिक और नागरिक कार्यकर्ता, जिनसे इस सरकार को ख़तरे का अहसास हुआ सबको उठा लिया गया और अदालत ने भी उनकी नहीं सुनी. जजों ने उनकी सुनवाई से खुद को अलग करना शुरू कर दिया. क्यों?

वरवर राव, गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, शारीरिक तौर पर अक्षम जीएन साईबाबा आदि आज भी जेल में बंद हैं. बार-बार गुहार के बाद भी अदालतों से उन्हें कोई राहत नहीं मिली है अब तक.

हाल ही में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों पर एक नज़र मार कर देखिए, कितने किसानों और युवाओं ने आत्महत्या की है बीते साल. आपके होश शायद न उड़ें क्योंकि होश पर तो राष्ट्रवाद, धर्म और जातिवाद के साथ अंधभक्ति ने कब्ज़ा कर रखा है.

ऐसे में मोदी को मोदी की भाषा में जवाब देने की ग़लतफ़हमी में ताली-थाली बजाकर और दीया मोमबत्ती जलाकर ट्विटर पर उसे ट्रेंड होता देख या यूट्यूब पर डिसलाइक की संख्या देख कर यदि आप कोई उम्मीद पाल रहे हैं तो ऐसे में ग़ालिब याद आते हैं– दिल बहलाने को ये ख्याल अच्छा है!

दरअसल, हम भूल रहे हैं कि ग्रामीण भारत में, जहां मोबाइल में इन्टरनेट भले न हो वहां डिश जरूर लगा है. जहां डिश है वहां अर्नब, सुधीर, अंजना आदि की टीम मने मोदी की टीम पहुंची हुई है. वहां भी लोगों को बताया गया है कि रिया ने एक राजपूत एक्टर को ड्रग्स दिया है, वहां लोगों को बताया गया है कि हिन्दू खतरे में हैं और कंगना के साथ ज़ुल्म हो रहा है. उन्हें याद नहीं कि लॉकडाउन ने उनको सड़कों पर खड़ा कर दिया, उनके परिजनों के बच्चों की हत्या कर दी गयी. वहां भी बताया गया कि भव्य मंदिर का निर्माण आरंभ हो चुका है. देश लाशों की ढेर पर बैठा है यह उनको नहीं बताया जा रहा. उनको नहीं पता कि चीनी सेना ने लेह में जमीन पर कब्ज़ा किया है. उनको सर्जिकल स्ट्राइक याद है. उनको दिखाया जा रहा है कि एक दाढ़ी वाला संत किस तरह से मोरनी को दाना खिलाता है और मोर उस ख़ुशी में उसके सामने पंख उठाकर नाचने लगता है.

देश की जनता को नाचने वाला मोर बना दिया गया है. रेल बिक चुकी है, बैंक लुट चुके हैं, यह बात उन्‍हें कौन बताएगा? बता भी दे, तो कौन सुनेगा?

हो सकता है कि मेरी ये बातें आपको हतोत्साहित करें, पर सच को स्वीकार करना ही होगा. सच कड़वा ही नहीं, आग की तरह भी होता है, भीतर से जला देता है कई बार. सच यह है कि अब विपक्षी दलों के नेता भी खुद को बचाने के लिए सत्ता के फैसलों के समर्थन में वक्तव्य देने लगे हैं. केवल मायावती ही नहीं, अन्य दलों की भी यही दशा है.

कोरोना काल में ही असम बाढ़ में डूबा रहा, बिहार भी. कोई असर पड़ा किसी पर? सरकार बेचने में लगी रही. उसे किसी की परवाह नहीं. जीडीपी की समझ आधी से अधिक आबादी को नहीं जबकि अम्बानी का खजाना भरता चला गया. आप तो पांच किलो गेहूं और एक किलो चना से काम चलाइए. छह साल पहले गोद लिए गांवों की ख़बर किसी को है?


नित्‍यानंद गायेन पत्रकार और कवि हैं


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